पैरेटो के चक्रीय सिद्धांत द्वारा चक्रिय सामाजिक परिवर्तन - Cyclic Social Change by Pareto's Cyclic Theory
पैरेटो के चक्रीय सिद्धांत द्वारा चक्रिय सामाजिक परिवर्तन - Cyclic Social Change by Pareto's Cyclic Theory
पैरेटो ने प्रत्येक समाज में अभिजात वर्गों के परिभ्रमण की प्रक्रिया को अनिवार्य दशा के रूप में स्वीकार किया है। इनका कथन है कि एक स्थायी सामाजिक व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि सर्वोच्च श्रेणी के अभिजनों में समूह के स्थायित्व के अवशिष्ट चालाकों तथा संयोजन के विशिष्ट चालकों का एक समुचित सन्तुलन बना रहे। इसका तात्पर्य हैं कि राजनीति क्षेत्र में जहाँ एक ओर शेर और लोमड़ियों का एक न्यायिक सम्मिश्रण जरूरी है वहीं दूसरी ओर आर्थिक न आदर्शात्मक क्षेत्रों में सट्टेदारों व पूँजीभोगियों तथा अविश्वास व विश्वास के बीच इस तरह का सन्तुलन होना चाहिए जिससे सामाजिक व्यवस्था पर वांछित नियन्त्रण रखा जा सके। लेकिन व्यवहार में इस तरह सम्मिश्रण नहीं हो पाता। अभिजन वर्गों के बीच होने वाला परिभ्रमण इसी दशा का परिणाम है। इस प्रकार पैरेटो का विश्वास है
कि परिवर्तन न तो उद्विकास अथवा प्रगति के समान एक सीधी दिशा में होता है और न ही परिवर्तन की विवेचना किसी एक आर्थिक या सांस्कृतिक कारक के आधार पर की जा सकती है। बुनियादी तौर पर परिवर्तन का कारण विशिष्ट चालकों से प्रभावित व्यवहारों में परिवर्तन होना है तथा ऐसे परिवर्तन की गति “चक्रिय" होती है। इनका मानना था कि मानव समाज में इस चक्र की पुनरावृत्ति अनिवार्य है कि, “जो शासन शेरों द्वारा आरम्भ होता है, वह लोमड़ियों के शासन में बदलकर पुनः कुछ दूसरे शेरों के अधिकार में आ जाता है।" इस प्रकार समाज में कुछ नया नहीं होता बल्कि राजनीतिक आर्थिक व मूल्यात्मक सन्तुलन एवं चक्रीय रूप में बनता -बिगड़ता रहता है।
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