दलित पितृसत्ता - Dalit Patriarchy
दलित पितृसत्ता - Dalit Patriarchy
दलितों का मुखर होना समकालीन भारतीय राजनीति का अहम पहलू है। इस मुखरता का एक आयाम दलित स्त्रियों का अपनी अधीनता की विशिष्टता के प्रति सजग होना और उससे मुक्ति के लिए लामबंद होना है। दलित स्त्रीवाद इसी लामबंदी का नतीजा है। दलित स्त्रीवादियों के मुताबिक, दलित स्त्रियों को एक साथ त्रि-स्तरीय शोषण झेलना पड़ता है:
1) ऊँची जातियों के पुरुषों का जाति आधारित शोषण;
2) श्रमिक के रूप में भू-स्वामियों (जो प्रायः ऊँची या मध्य जातियों के होते हैं) का वर्ग आधारित शोषण; और
3) स्त्री के रूप में दलित पुरुषों और अन्यान्य ऊँची जातियों के पुरुषों का पितृसत्तात्मक शोषण। गौरतलब है कि दलित स्त्रियों के बारे में यह यूटोपियाई धारणा व्याप्त रही है कि वे उच्च जातियों की स्त्रियों की तुलना में अपेक्षाकृत स्वायत्त हैं।
ऐसा माना जाता रहा है कि उच्च जातियों की स्त्रियों के जीवन में उनके पुरुषों का जितना हस्तक्षेप रहता है, उतना दलित स्त्रियों के जीवन में दलित पुरुषों का हस्तक्षेप नहीं रहता; दलित स्त्रियों को उच्च जातियों की स्त्रियों की भाँति वर्जनाओं और निषेधों का सामना नहीं करना पड़ता; दलित पति पितृसत्तात्मक आग्रहों से मुक्त होता है। लेकिन दलित स्त्रियों के मुखर होने तथा आत्मकथाओं और अन्य माध्यमों के जरिए उनके जीवनानुभवों के उजागर होने के बाद उपर्युक्त मिथक टूट गया। दलित स्त्रियाँ यह सच सामने लायी कि दलित पुरुष भी अपनी स्त्रियों के प्रति पितृसत्तात्मक आग्रहों से ग्रस्त होते हैं। दूसरे शब्दों में, दलित स्त्रियों ने अब तक अदृश्य रही दलित पितृसत्ता' को दृश्य किया।
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