सामूहिकता ह्रास और समूह हीनता - De-grouping and group lessness
सामूहिकता ह्रास और समूह हीनता - De-grouping and group lessness
व्यक्ति जिस मात्रा में अपने समूह से अपने संबंध तोड़ता है। उसी भाषा में उसका समूह हास होता है। प्रसंग-समूह तक पहुँचने की प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग यह भी है कि व्यक्ति के अपने समूह से संबंधों का हास हो जाना। देहात के स्कूल से पढ़ा हुआ बालक जब नए शहरों वातावरण में विश्व विद्यालय के छात्रावास में प्रवेश पा लेता है, तो यह समूहहीनता की स्थिति में होता है। अपने पूराने समूह से वह कट जाता है और शहर में नए समूह का सदस्य जब तक नहीं बना रहता, तब तक वह समूहहीनता की दुःखद स्थिति में रहता है। उसकी स्थिति सीमांत व्यक्ति की होती है। वह कभी अपने पुरानी देहाती मित्र-मण्डली की तरफ भागना चाहता है तथा कभी शहरी मित्रों की मंडली की ओर आकर्षित होता है। धीरे-धीरे पुराने सामूहिक संबंध टूटने लगते हैं और वह शहरी जीवन के प्रसंग-समूह में प्रवेश करने लगता है।
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