वर्ण व्यवस्था के दोष - defects of the alphabet
वर्ण व्यवस्था के दोष - defects of the alphabet
भारतीय मनीषियों ने समाजिक संस्तरण की जिस व्यवस्था का निर्माण किया था उसे वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। वर्ण व्यवस्था अपने प्रकार की अनोखी व्यवस्था थी तथा इसका निर्माण सामाजिक संघर्षों को समाप्त करने और समाज के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर किया गया था। तत्कालीन भारतीय सामाजिक जीवन में भले ही वर्ण व्यवस्था अनेक लाभ रहे हो किंतु आज की बदलती हुई परिस्थितियों के संदर्भ में जब वर्ण व्यवस्था को जानने का प्रयास किया गया है तो यह पता चलता है कि इस व्यवस्था के अनेक दोष थे। यहां वर्ण व्यवस्था के उन्हीं दोषों की विवेचना की जाएगी जो निम्नलिखित है-
(1) जन्मगत विशेषताओं पर आधारित: वर्ण व्यवस्था का सिद्धांत जन्मदिन विशेषताओं पर आधारित है और इसे कोई व्यक्ति न्याय को नहीं कह सकता कि जन्म के आधार पर कुछ व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अधिक मूर्ख, अज्ञानी, बुद्धिमान, अपवित्र सुस्त, दुर्गुण हो सकते हैं। शास्त्रों में यह तर्क दिया गया है कि स्वभाव संबंधी विशेषताएं जन्मगत होती है
और इसी लिए विभिन्न वर्गों के अधिकार व कर्तव्य एक दूसरे से भिन्न होना उचित है। लेकिन शस्त्रकारों ने जानबूझकर इस तथ्य की अवहेलना की है कि यह तर्क संपूर्ण तरीके से असत्य व वैज्ञानिक है।
(2) संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचायक:- वर्णसंकर शब्द इस व्यवस्था की संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचायक है। दूसरा कारण यह है कि वर्णसंकर को अपवित्र तथा समाज बहिष्कृत व्यक्ति की संज्ञा दी गई है। वर्तमान समाजवादी और प्रजातांत्रिक समाज में यह अत्यंत ही अवैज्ञानिक है।
(3) मानवीय मूल्यों की उपेक्षा:- आज सभी विद्वान स्वीकार करते हैं की स्वतंत्रता, समानता, न्याय मातृत्व सभी आधुनिक समाज व्यवस्था के मानव मूल्य हैं परंतु वर्ण व्यवस्था में इन सभी मुद्दों की उपेक्षा की गई है फिर इस व्यवस्था को कल्याणकारी व लोकतांत्रिक कैसे कहा जा सकता है।
(4) एकाधिकार की सामाजिक नीति:- आरंभ में शक्ति संपन्न व्यक्तियों ने सबसे अधिक अधिकार स्वयं ही प्राप्त कर लिए और बाद में किसी भी दूसरे समूह पर उच्च स्थिति में जाने पर पूर्ण नियंत्रण लगा दिया। सामाजिक प्रगति में अत्यंत बाधक सिद्ध हुई।
(5) शोषण का अधिकार:- वर्ण व्यवस्था में समाज के एक बड़े वर्ग को शूद्र या अंत्यज कह कर इसका जो अमानवीय शोषण हुआ है यह न्याय के सभी सिद्धांतों का नृशंस हनन है। इसके पश्चात भी इस व्यवस्था को धर्म का अंग मानकर इसके आधार पर वर्ण धर्म का प्रतिपादन करना स्वयं हिंदू धर्म को भी कलुषित करना था।
इस प्रकार प्राप्त होता है कि वर्ण व्यवस्था को किसी प्रकार भी एक न्याय पूर्ण व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। यह केवल एक अन्याय पूर्ण नीति रही है। जिसे अलौकिकता, धर्म और सिद्धांत का जाया पहनकर प्रभावपूर्ण बनाने का प्रयत्न किया गया। वर्ण व्यवस्था के इन दोषों की गंभीरता को देखने के बाद तत्काल एक दूसरा प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तव में यह व्यवस्था इतनी दोषपूर्ण है तो यह इतनी दीर्घजीवी कैसे रह सकी? इसकी उत्तर को अनेक सामाजिक मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक कारणों के आधार पर समझा जा सकता है.
वार्तालाप में शामिल हों