जाति व्यवस्था के दोष - defects of caste system

जाति व्यवस्था के दोष - defects of caste system


जाति व्यवस्था में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं -


1. जाति व्यवस्था के प्रमुख दोषों अथवा यह कहा जाए कि अभिशाप के रूप में समाज पर थोपी गयी कुप्रथा अस्पृश्यता है। इसके अलावा बाल विवाह, पर्दा प्रथा, दहेज तथा जातिवाद भी उल्लेखनीय हैं।


2. जाति व्यवस्था में व्यवसाय पहले से ही निर्धारित रहते हैं तथा इस कारण से व्यक्ति को विवश होकर व्यवसाय को करना पड़ता है, चाहे इच्छा हो अथवा न हो। इसके अलावा एक ही व्यवसाय में लगे रहने के कारण यह व्यक्ति की रचनात्मकता व नवाचार को मार देता है। इस प्रकार से जाति व्यवस्था श्रम की गतिशीलता के मार्ग में बाधक सिद्ध होती है।


3. एक ओर तो यह एक जाति के लोगों में एकता और सद्भावना को पैदा करता है परंतु दूसरी ओर अन्य जातियों से उन्हें पृथक करने का दोष भी जाति व्यवस्था में पाया जाता है।

इससे राष्ट्रीय एकता भी प्रभावित होती है, जिसके कारण जातियों में द्वेष और घृणा की भावना घर कर जाती है और राष्ट्रीय चेतना को पनपने से रोकती है।


4. यह राष्ट्र की सामाजिक व आर्थिक प्रगति के मार्ग को बाधित करती है। जाति व्यवस्था लोगों को कर्म के सिद्धांत के प्रति आस्थावान बनाती है और इस कारणवश लोग धीरे-धीरे परंपरावादी हो जाते हैं। इसका परिणाम यह मिलता है कि लोगों में आर्थिक विकास और गतिशीलता के प्रति उदासीनता आने लगती है।


5. इसने जातिवाद जैसी विराट तथा विकृत समस्या को पैदा किया है। जाति विशेष के लोगों में प्रेम,

सहयोग, भातृत्व, न्याय आदि समतामूलक भावनाएं अपनी ही जाति विशेष के प्रति प्रकट होती है। 

सामान्य शब्दों में, नाना प्रकार के सामाजिक मानकों की अवहेलना करते हुए अपनी ही जाति के प्रति अंधभक्ति की भावना ही जातिवाद है। 6. जाति व्यवस्था समता व समानता की भावना को तोड़ने का काम करती है। इसमें रंग, जाति अथवा विश्वास आदि के आधार पर भेदभाव पाया जाता है। अतः जाति व्यवस्था को अप्रजातांत्रिक व्यवस्था भी माना जा सकता है।