संयुक्त परिवार के दोष - defects of joint family

संयुक्त परिवार के दोष - defects of joint family


विविध क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तनों एक समुचित प्रभाव भारतीय परिवार पर पड़ा है। वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी और औद्योगीकरण के कारण आर्थिक व्यवस्था में कई क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं, खियों को अधिकार प्राप्त हुए हैं, लोगों की धार्मिक विश्वासों में अंतर आया है, विकसित एवं विकासशील देश आधुनिकीकरण की ओर बढ़े हैं. विवाह और पारिवारिक जीवन के संबंध में विचारों और अभिवृत्तियों में भी परिवर्तन आया है। पुराने आदर्श प्रतिमान और नियंत्रण का प्रभाव कम होता जा रहा है परंतु उनके स्थान पर जो नवीन प्रतिमान का विकास हुआ है वह संतोषजनक नहीं है। वर्तमान युग में संयुक्त परिवार का परंपरागत संगठन बदलती हुई परिस्थितियों से अनुकूलन करने में धीरे-धीरे असफल सिद्ध हो रहा है। भारत में जैसे-जैसे रूढ़ियों का प्रभाव बढ़ा और अशिक्षा में वृद्धि हुई. संयुक्त परिवार के परंपरागत आदर्श एक संकीर्ण विचारधारा में परिवर्तित होने लगे। संयुक्त परिवार की जिस व्यवस्था का निर्माण सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक स्थायित्व के लिए हुआ था उसी व्यवस्था में रूढ़ियों और कर्मकांडों में अभूतपूर्व वृद्धि करके एक जटिल समस्या का रूप ले लिया है।

पणिक्कर का कथन है कि भारत में अनेक बुद्धिजीवी आज भी संयुक्त परिवार को इस आधार पर उपयोगी मानते हैं कि इसने व्यक्तिगत स्वार्थों का दमन करने और वृद्धों. बेरोजगारों तथा असहायों का सामाजिक बीमा करने में महत्वपूर्ण योग दिया है परंतु वास्तविकता यह है कि संयुक्त परिवार का प्रेरणा स्रोत मात्र अपने ही परिवार के कल्याण में ही वृद्धि करता है देश और समाज के नहीं। अतः यह माना जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों में संयुक्त परिवार व्यवस्था समाज के लिए उपयोगी न रहकर अनेक दोषों से युक्त एक विघटित संस्था बन चुकी है। संक्षिप्त रूप में इसके कुछ दोष है -


1. अकर्मण्य व्यक्तियों की वृद्धि


2. कुशलता में बाधक


3. गतिशीलता में बाधक


4. व्यक्तित्व के विकास में बाधक


5. द्वेष और कलह का केंद्र 


6. अत्यधिक संतानोत्पत्ति


7. स्त्रियों की दुर्दशा के लिए उत्तरदाई


8. गोपनीय स्थान का अभाव


9. सामाजिक समस्याओं को प्रोत्साहन


10. शुष्क एवं नीरस वातावरण 


11. कर्ता की स्वेच्छाचारिता