समूह मनोबल के निर्धारक - Determinants of group morale
समूह मनोबल के निर्धारक - Determinants of group morale
समाज मनोवैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे कारणों का विशेष वर्णन किया है जिनके द्वारा किसी समूह का मनोबल प्रभावित होता है इन कारकों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है -
1- सकारात्मक निर्धारक (positive determinants )
2 - नकारात्मक निर्धारक (negative determinants )
1. सकारात्मक निर्धारक - मनोबल के कुछ सकारात्मक निर्धारक हैं. सकारात्मक निर्धारक का के संबंध सदस्यों के धनात्मक उद्देश्य से होता है धन की प्राप्ति करने के लिए समूह का प्रत्येक सदस्य प्रेरणात्मक, संवेगात्मक तथा संज्ञानात्मक प्रयास करता है. प्रमुख सकारात्मक कारकों का वर्णन निम्नलिखित है
i: धनात्मक लक्ष्य- किसी समूह में ऊंचा मनोबल होने के लिए यह अति आवश्यक है कि समूह के सदस्यों के सामने एक धनात्मक एवं स्पष्ट लक्ष्य हो. समाज मनोवैज्ञानिकों का मत है कि जब समूह का लक्ष्य स्पष्ट एवं धनात्मक होता है अर्थात ऐसा होता है जो सदस्यों में आकर्षण प्रदान करता है, तो उस समूह का मनोबल अच्छा एवं ऊंचा होता है. धनात्मक लक्ष्य सदस्यों में एकता पैदा करके उन्हें अपनी और आकर्षित कर लेता है. अतः धनात्मक लक्ष्य एक तरह का चुंबकीय बल्ला के रूप में कार्य करता है जो सदस्यों में एकात्मता का भाव उत्पन्न करके उन्हें संगठित करता है और समूह का मनोबल ऊंचा करता है.
II: सहायक आवश्यकताओं की संतुष्टि समूह सदस्यता का मूल उद्देश्य मां ने लक्ष्य की प्राप्ति होती है इस मुल्ले उद्देश्य के अलावा भी एक और लक्ष्य होता है जो समूह सदस्यता को प्रेरित करता है,वह लक्ष्य है- सहायक आवश्यकताओं की संतुष्टि प्रत्येक सदस्य की कुछ सहायक आवश्यकता जैसे सहभागिता की आवश्यकता, आत्म अभिव्यक्ति की आवश्यकता तथा आदर एवं सम्मान की आवश्यकता आदि होती है,
जिनकी संतुष्टि समूह में होती है. जिस समूह में उन सहायक आवश्यकताओं की संतुष्टि जितने ही अधिक होती है, उस समूह का मनोबल उतना ही ऊंचा होता है. फिशर 1983 तथा मेयर 1987 के अनुसार- समूह में जिस सीमा तक इन सहायक आवश्यकताओं की संतुष्टि होती है, उस सीमा तक समूह में संयोगिता उत्पन्न होती है और समूह का मनोबल ऊंचा होता है
iii: लक्ष्य की प्रगति की भावना - समूह मनोबल को ऊंचा बनाए रखने के लिए सिर्फ यही आवश्यक नहीं है कि समूह लक्ष्य धनात्मक हो तथा उसे प्राप्त करने के लिए स्पष्ट प्रविधियां मौजूद हो बल्कि यह भी आवश्यक है कि सदस्यों में इस बात का ज्ञान हो कि वह प्रगति की ओर अग्रसर हो रहे हैं. ऐसी भावना से उनका हौसला बुलंद होता है और समूह का मनोबल ऊंचा होता है. कारण है कि युद्ध के समय सैनिकों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए बार-बार यह घोषणा की जाती है कि हम लोग मैदान में आगे बढ़ रहे हैं तथा दुश्मन पीछे की ओर हटते जा रहे हैं.
iv: समय परिप्रेक्ष्य किसी समूह का मनोबल समय परिप्रेक्ष्य द्वारा भी प्रभावित होता है. समय परिप्रेक्ष्य का संबंध समूह में अतीत की घटनाओं तथा भविष्य में समूह लक्ष्य की प्राप्ति के संबंध में बनाए जाने वाली नीतियों योजनाओं से है. इसके अलावा समय परिप्रेक्ष्य का संबंध इस बात से भी होता है कि कहां तक समूह के सदस्य समूह की वर्तमान क्रियाओं का संबंध समूह लक्ष्य से जोड़ पाते हैं. अगर समूह ऐसा है जिसके सदस्य समूह लक्ष्य के लिए समूह की वर्तमान क्रियाओं की महत्ता को सही सही समझता है, तो उस समूह का मनोबल ऊंचा हो जाता है,
क्रैच तथा क्लच क्रशफिल्ड 1948 के अनुसार जब समूह के सदस्य को समूह के लक्ष्य तथा उससे संबंधित भविष्य निधि एवं योजनाओं के बारे में कुछ नहीं बताया जाता है तथा समूह की क्रमिक क्रियाएं सदस्यों के दृष्टिकोण से पृथक एवं असंबंधित होती हैं, तो समूह का मनोबल नीचा हो जाता है. इन लोगों ने विशेषकर इस बात पर बल डाला है कि जब सदस्यों को भविष्य की योजनाओं एवं नीतियों के बारे में अंधेरे में रखा जाता है.
तो इससे सदस्यों में और सुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है एवं साथ ही साथ उन में कुंठा भी उत्पन्न होती है जो समूह मनोबल को गिरा देती है,
लेविन 1942 बताया कि उच्च मनोबल तथा लंबा समय परिपेक्ष में संबंध पारस्परिक होता है।
v: आकांक्षा स्तर तथा उपलब्धि स्तर समूह के मनोबल को ऊंचा रखने के लिए आवश्यक है कि सदस्यों का आकांक्षा स्तर तथा उपलब्धि स्तर मैं एक ऐसा तालमेल हो कि दोनों में एक निश्चित संतुलन बना रहे, सदस्य अपनी उपलब्धि स्तर के आधार पर ही आकाक्षा स्तर का निर्माण करते हैं.
लेविन 1942 ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह बताया कि यदि समूह का आकांक्षा स्तर पहले की उपलब्धि स्तर से काफी ऊंचा होता है, तो इससे समूह में कुंठा तथा संघर्ष की भावना बढ़ती है क्योंकि आकांक्षा के उस बड़े हुए स्तर पर पहुंचना समूह के लिए नाकों चने चबाने के समान होता है ऐसी परिस्थिति में समूह का मनोबल गिर जाता है. दूसरी तरफ यदि समूह के आकांक्षा स्तर का निर्धारण पहले के उपलब्धि स्तर को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे बिंदु पर किया जाता है के सदस्य आसानी से पहुंच सकते हैं तो ऐसी परिस्थिति में समूह के सदस्यों में लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सहयोग की भावना तीव्र हो जाती है और समूह का मनोबल ऊंचा हो जाता है.
vi: समूह के अंतर्गत त्याग या लाभ में समानता समूह में ऊंचा मनोबल के लिए यह आवश्यक है कि समूह के सभी सदस्यों में भावना हो कि उन्हें सामान लाभ हो रहा है या यदि समूह को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए कुछ त्याग करना पड़ रहा है तो सभी सदस्य समान रूप से त्याग कर रहे हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि सदस्यों में सामान लाभ या त्याग की भावना का होना उनका मनोबल के लिए आवश्यक है. यदि किसी कारण से सदस्यों में यह भावना उत्पन्न हो जाती है कि उन्हें समूह में दूसरे सदस्यों की अपेक्षा कम लाभ हो रहा है परंतु उसे त्याग अधिक करना पड़ रहा है तो ऐसी परिस्थिति में समूह के नेतृत्व में सदस्यों का विश्वास समाप्त हो जाता है और समूह के भीतर अनेक उप समूह कायम हो जाते हैं और आपस में बैर भाव अधिक बढ़ जाता है. जिसके कारण समूह का मनोबल नीचा हो जाता है.
vii: एकात्मकता तथा तादात्म्य की भावना समूह का मनोबल सदस्यों में एकता तथा तादात्म्य की भावना द्वारा भी प्रभावित होता है मनोबल का यह एक संवेगात्मक निर्धारक है संवेगात्मक कारको का प्रभाव मनोबल पर सीधा पड़ता है।
वाटसन (1942) के अध्ययनों के अनुसार सदस्यों में जब एकात्मक ताकि भावना तीव्र होती है तो ऐसी परिस्थिति में उन्हें एकजुट होकर समूह लक्ष्य और कार्य करने की प्रेरणा अधिक मिलती है . इससे समूह का मनोबल ऊंचा हो जाता है.
तदात्म्य का भी प्रभाव समूह मनोबल पर पड़ता है. समूह तदात्म्य से तात्पर्य सदस्यों द्वारा समूह को अपना समूह समूह कल्याण को अपना कल्याण तथा मो की उपलब्धियों को अपनी उपलब्धि समझने की प्रवृत्ति से होता है. मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि अन्य बातों के सामान रहने पर, सदस्य समूह के साथ जितना ही अधिक तादाद में स्थापित करते हैं, समूह मनोबल उतना ही अधिक ऊंचा होता है.
viii: नेतृत्व- समूह का मनोबल नेतृत्व पर भी निर्भर करता है क्योंकि समूह के लिए नेता एक महत्वपूर्ण शक्ति होता है. समाजवाद वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि सत्ता वादी नेता की अपेक्षा प्रजातंत्र आत्मक नेता के होने पर समूह का मनोबल अधिक ऊंचा होता है क्योंकि इस प्रकार के नेतृत्व में सदस्यों द्वारा समूह कार्य में सहयोग, एकता की भावना, विचारों की स्वतंत्रता तथा अन्य प्रेरणात्मक बल अधिक होते हैं. फिशर 1983 तथा ऑलपोर्ट 1980 के अनुसार प्रजातंत्र आत्मक नेतृत्व में सत्ता वादी नेतृत्व की अपेक्षा मनोबल ऊंचा होने का बढ़िया है
कि इस तरह के समूह में आपसी संघर्ष कम तथा हम का भाव अधिक होता है जिसका सीधा प्रभाव मनोबल पर पड़ता है अर्थात मनोबल ऊंचा हो जाता है.
ix: सामाजिक एवं आर्थिक कारक- समूह का मनोबल सामाजिक व्यवस्था सदस्य की आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करता है. यदि सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जिसमें सभी योग्य व्यक्तियों को उचित स्थान दिया जाता है, तो वैसे समूह या समाज में अधिक से अधिक व्यक्ति शामिल होना चाहते हैं और प्रायः ऐसे समूह का मनोबल ऊंचा होता है.
हिल्टन तथा डैनली 1985 द्वारा किए गए अध्ययनों से भी यह स्पष्ट होता है. सदस्यों की आर्थिक स्थिति का भी प्रभाव समूह मनोबल पर पड़ता है. यदि समूह के लोगों को धन कमाने का स्पष्ट स्रोत है और साथ ही साथ और में बेरोजगारी नहीं है तो ऐसी परिस्थिति में सदस्यों का मनोबल ऊंचा होता है. परंतु यदि सदस्यों में गरीबी एवं भुखमरी व्याप्त है तो इससे समूह के सदस्यों का मनोबल नीचा होता है.
2- नकारात्मक निर्धारक
ऊपर वर्णन किए गए सकारात्मक निर्धारकों के अलावा कुछ नकारात्मक निर्धारक भी है
जिनका प्रभाव समूह मनोबल पर पड़ता है. नकारात्मक निर्धारक में चिंता, खतरा, भय आदि प्रमुख हैं. अनेक ऐसे उदाहरण हमें मिलते हैं जिनमें या देखा गया है कि जब जब समूह के सदस्यों में बाहर के समूहों से खतरा या डर उत्पन्न हो जाता है, वे आपसी भेदभाव को भुला कर तुरंत संगठित हो जाते हैं तथा काफी एकता एवं सहयोग दिखलाते हैं. इससे समूह का मनोबल ऊंचा होता है. कुछ समाज मनोवैज्ञानिकों ने धनात्मक निर्धारक तथा नकारात्मक निर्धारक द्वारा उत्पन्न समूह मनोबल की तुलना किया है और बताया कि नकारात्मक निर्धारण से निम्नांकित दो अर्थों में भिन्न हैं-
a: नकारात्मक निर्धारक जैसे- भय, चिंता आदि समूह के मनोबल को ऊंचा करने में उतना प्रभाव कारी नहीं होते हैं जितना कि धनात्मक निर्धारक होते हैं.
b: नकारात्मक निर्धारक द्वारा उत्पन्न मनोबल सकारात्मक या धनात्मक निर्धारक द्वारा उत्पन्न मनोबल की अपेक्षा कम स्थाई होता है.
गोल्डन (1940) ने अपने अध्ययन में पाया कि धनात्मक निर्धारकों के आधार पर बना समूह नकारात्मक निर्धारकों के आधार पर बने समूह की अपेक्षा प्रयोग करता द्वारा उत्पन्न किए गए भेद भाव से लगभग ना के बराबर प्रभावित हुआ क्योंकि पहले तरह के समूह का मनोबल दूसरे तरह के मनोबल की अपेक्षा ऊंचा एवं स्थिरता.
लेविन, लिपिट तथा वाइट (1939) ने अपने अध्ययन में पाया कि नकारात्मक निर्धारकों के आधार पर बने समूह में संघर्ष तथा आपसी भेदभाव धनात्मक निर्धारकों के आधार पर समूह का अपेक्षा अधिक था. परिणाम स्वरूप पहले तरह के समूह का मनोबल थोड़े समय के लिए अवश्य ही ऊंचा हो जाता था परंतु बाद में वैसे समूह का मनोबल बिल्कुल ही रसातल में चला जाता था।
निष्कर्ष के रूप में हम यह कह सकते हैं कि समूह का मनोबल सकारात्मक या धनात्मक कारको तथा नकारात्मक कारको दोनों से ही प्रभावित होता है. सकारात्मक कारकों का प्रभाव मनोबल को ऊंचा तथा स्थिर बनाना होता है।
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