निदानात्मक अनुसंधान अभिकल्प के चरण - Diagnostic Research Design Stages

 निदानात्मक अनुसंधान अभिकल्प के चरण - Diagnostic Research Design Stages


अनुसंधानकर्ता द्वारा निदानात्मक अनुसंधान अभिकल्प के तहत निम्न वैज्ञानिक चरणों को अपनाया जाता है 


1- चारों की पहचान


निदानात्मक अनुसंधान अभिकल्प में सर्वप्रथम चरों की पहचान की जाती है तथा यह निश्चित कर लिया जाता है कि संबंधित अध्ययन हेतु कौन सा चर आश्रित है तथा कौन सा चर स्वतंत्र है। इनके पहचान के आधार पर ही समस्या तथा शोध की अगली प्रक्रिया पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। 


2- चारों के मापन हेतु प्रविधियों का निर्धारण


चरों की प्रकृति तथा प्रकार की पहचान कर लेने के पश्चात यह निर्धारित कर लेना आवश्यक रहता है कि उन चरों के मापन हेतु कौन सी वैज्ञानिक तकनीकों तथा यंत्रो का प्रयोग किया जाएगा।

निदानात्मक अनुसंधान अभिकल्प के मुख्य चरों के बारे में सटीक और विस्तृत जानकारीप्राप्त करने के लिए आवश्यक रहता है कि अनुसंधान में सही वैज्ञानिक तकनीक व यंत्र का चयन किया जाय। 


3- चरों के मध्य के संबंध को जानना


निदानात्मक अनुसंधान अभिकल्प के अगले चरण में इन्हीं तकनीकों तथा यंत्रों की सहायता से चरों के मध्य के संबंध को ज्ञान किया जाता है। चरों के मध्य के संबंध के आधार पर ही समस्या की गहराई को समझा जा सकता है।


4 हस्तक्षेप की रणनीतियों का निर्माण


इसके पश्चात हस्तक्षेप (इंटर्वेशन) के लिए कुछ आवश्यक रणनीतियाँ निर्मित की जाती हैं। इसके लिए निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए


• इसमें अध्ययन क्षेत्र तथा उत्तरदाताओं के बारे में यथासंभव ऐतिहासिक और व्यावहारिक जानकारी संकलित कर ली जाती है। 


• मानवशास्त्रीय अथवा नैदानिक तकनीकों की सहाता से उत्तरदाताओं के बारे में व्यवस्थित और तुलनात्मक जानकारी भी प्राप्त कर लेनी चाहिए।


• इसके बाद संकलित किए गए तथ्यों को नैदानिक तरीके से परिष्कृत कर जांच लेना चाहिए। 


5- तथ्यों का विश्लेषण


तथ्यों के संकलन के पश्चात उनका विश्लेषण उचित वैज्ञानिक प्रविधि से किया जाता है तथा इस विश्लेषण के साथ ही कुछ सुझावों को भी प्रस्तावित किया जाता है। ये सुझाव ही इस सम्पूर्ण अनुसंधान की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक परिणति को साकार करने में सहायता करता है।