वस्तुनिष्ठता को प्राप्त करने में कठिनाइयां - Difficulties in Getting Objectivity

 वस्तुनिष्ठता को प्राप्त करने में कठिनाइयां - Difficulties in Getting Objectivity


सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण है। किंतु इसे प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयां हैं। इन कठिनाइयों का उल्लेख निम्न प्रकार किया जा सकता है -


(1) भावात्मक प्रभाव:


सामाजिक शोध में, जिन सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है, वह भावात्मक प्रभाव से परिपूर्ण होती हैं। भौतिक विज्ञानों की भांति सामाजिक विज्ञानों में अनुसंधानकर्ता अपने को घटना के प्रभाव से वंचित नहीं कर सकता। भौतिक विज्ञानों की विषय वस्तु, भौतिक पदार्थ है। इन पदार्थों का अध्ययन, अनुसंधानकर्ता के हृदय में कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं करता।

लेकिन सामाजिक शोध में, मनुष्य की संस्कृति, सभ्यता, व्यवहार अथवा प्रवृत्ति का अध्ययन किया जाता है, जिसे शीघ्र ही अनुसंधानकर्ता इन से प्रभावित हो जाता है। इसके फलस्वरूप एक पक्षपातपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती हैं। अनुसंधानकर्ता इस प्रकार अपने निष्कर्ष को तटस्थ नहीं कर पाता। 


(2) विषय वस्तु की जटिलता :


सामाजिक शोध में, वस्तुनिष्ठता प्राप्त करने में द्वितीय कठिनाई अध्ययन की विषय वस्तु के कारण पैदा होती है। सामाजिक जीवन अत्यंत जटिल और उलझा हुआ है। सामाजिक जीवन के अधिकांश तत्व अस्थाई हैं। उनमें सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ अंतर उत्पन्न होता है। 


(3) एकरूपता का अभाव :


सामाजिक समस्याओं के बारे में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इनमें एकरूपता का नितांत अभाव है। एक प्रकार की समस्या का स्वरूप, विभिन्न काल में अलग-अलग होता है। लेकिन सामाजिक समस्याओं की प्रकृति बदलती रहती है। उनमें एकरूपता स्थिर नहीं रहती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता एकरूपता को उत्पन्न नहीं होने देती। 


(4) विषय वस्तु का गुणात्मक रूप :


वस्तुनिष्ठता प्राप्ति की कठिनाई के गुणात्मक रूप के कारण भी उत्पन्न होती है। गुणात्मक रूप का के तात्पर्य अमूर्तता से है, जिसे देख नहीं सकते. केवल अनुभव कर सकते हैं।

सामाजिक विश्वास, मान्यताए व धारणाओं इत्यादि का रूप गुणात्मक होता है। अतएव इनके अध्ययन में भौतिक विज्ञानों की भांति निश्चित मापदंडों का प्रयोग करना कठिन है।


(5) सामान्य ज्ञान द्वारा उत्पन्न भ्रम सामाजिक शोध में प्राय: 


हम अपने सामान्य ज्ञान के आधार पर किसी घटना या समस्या के संबंध में अपना निर्णय निश्चित करते हैं। जो सिद्धांत हमारे सामान्य ज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते उन्हें हम गलत मान लेते हैं। इसके विपरीत, अनेक गलत सिद्धांत जो हमारे सामान्य ज्ञान से मेल खाते हैं, उन्हें हम सही मान लेते हैं। इस प्रकार भ्रम के फलस्वरुप अनेक गलत सिद्धांतों को सही मान लिया जाता है और अनेक सही सिद्धांतों को गलत मान लिया जाता है। 


(6) अनुसंधानकर्ता का स्वार्थ :


पी.वी.यंग का मत है कि सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता प्राप्त करने की एक प्रमुख कठिनाई का कारण अनुसंधानकर्ता का निजी स्वार्थ भी है। कभी-कभी शोध के परिणाम में अनुसंधानकर्ता का निजी स्वार्थ निहित होता है। अतएव वह उन्हीं तथ्यों को खोजता है, जो उसके स्वार्थ की पूर्ति में सहायक सिद्ध हों। ऐसे अवसर पर वह स्वीकृत सिद्धांतों को अस्वीकार कर उस सिद्धांत को अपनाता है जो कि उसके विचारों के अनुकूल हों।


(7) नैतिक प्रभाव :


शोधकर्ता के नैतिक आदर्शों का प्रभाव भी वस्तुनिष्ठता प्राप्त करने में कठिनाई पैदा करता है।

लुंडबर्ग का मत है कि “सामाजिक शोध में अशुद्धता उत्पन्न होने का एक सामान्य कारण शोधकर्ता का नैतिक पक्षपात है।" शोधकर्ता तथ्यों के संकलन और विवेचन करने में नैतिक आदर्शों का भी ध्यान रखता है। इनका प्रभाव मनुष्य के हृदय में इतना दृढ़ होता है कि वह प्रायः इनके विपरीत किसी भी निष्ठता को स्वीकार नहीं करता। विज्ञान तभी तक शुद्ध है, जब तक कि वह शोधकर्ता के नैतिक प्रभाव से दूर हो लेकिन शोधकर्ता का नैतिक प्रभाव परिणाम को प्रभावित करता है तो इससे अशुद्धता पैदा हो जाती है। इसलिए शोधकर्ता के नैतिक प्रभाव वस्तुनिष्ठता प्राप्त करने में कठिनाई पैदा करता है। 


(8) अनुसंधान की शीघ्रता :


अनेक अवसर पर शोध कार्य बड़ी शीघ्रता से संपन्न किया जाता है।

इस शीघ्रता के कारण शोधकर्ता के अंदर प्रायः किसी भी निष्कर्ष को माल लेने की प्रवृत्ति होती है। इसी कारण सही परिणाम प्राप्त करना कठिन होता है। इसके अतिरिक्त सामाजिक शोध की विषय वस्तु इतनी जटिल होती है जिसके लिए दीर्घकालीन अध्ययन और धैर्य भी आवश्यक होता है। किंतु शोध कार्य की शीघ्रता के फलस्वरुप पूर्णतया सही निष्कर्ष प्राप्त नहीं होते हैं। केवल आंशिक रूप से सत्य परिणामों को ही पूर्णरूपेण सत्य मान लिया जाता है। अतः शीघ्र संपन्न किए गए शोध में वस्तुनिष्ठता का निर्वाह नहीं होता है। 


(9) सामाजिक दर्शन का प्रभाव :


भौतिक विज्ञान में शोधकर्ता का संबंध जड़ और अचेतन वस्तुओं से है।

लेकिन सामाजिक शोध में मानव समाज का अध्ययन किया जाता है। अतएव समाज का वर्तमान दर्शन भी शोधकर्ता को प्रभावित करता है। इस कारण वस्तुनिष्ठता प्राप्त करने में बाधा पैदा होती है। इसके अतिरिक्त शोधकर्ता स्वयं भी उसी समाज का एक सदस्य होता है जिसे वह अध्ययन के लिए खोजता है। उसके अंदर भी मानव स्वभाव की कमियों का होना स्वाभाविक है। उसके विचार, संस्कार, धारणाएं इत्यादि समाज के पर्यावरण द्वारा पहले से निश्चित रहती है। अतएव अपने पूर्व विचार, संस्कार व धारणाओं के अनुकूल, शोध के परिणामों के टालने का प्रयत्न करता है जिससे शोधकर्ता कि तटस्थता समाप्त हो जाती है और वह अपने शोध में वस्तुनिष्ठता का निर्वाह कर पाता है।


(10) निष्पक्ष निष्कर्ष की प्राप्ति :


शोधकर्ता को अपने अध्ययन के पश्चात ऐसे निष्कर्षों को वस्तुतः प्राप्त करना चाहिए जो वास्तविकता तथा प्रमाणिकता पर आधारित हो। जनसाधारण इन निष्कर्षों को तभी स्वीकार कर सकता है जब यह पक्षपात और स्वार्थपरता से रहित होंगे। अतः शोधकर्ता को पूरी तरह तटस्थ रहना चाहिए। 


(11) मौलिक तथ्यों पर प्रभाव:


शोधकर्ता का लक्ष्य निहित घटनाओं में मौलिक तत्वों का वर्णन करना है। यह मौलिक तथ्य अपने सजातीय तथ्यों का प्रतिनिधि होता है। अगर ऐसा नहीं होगा तो शोध सार्वभौमिक सत्य का आधार नहीं बन सकता। यदि वह अपनी ओर से अध्ययन में थोड़ा सा भी अपना निर्णय जोड़ता है तो तथ्यों की मौलिकता समाप्त हो जाती है। इसलिए तथ्यों को वास्तविक दशाओं में दर्शाने के लिए वस्तुनिष्ठता अत्यंत आवश्यक है।