संस्कृति का प्रसारवाद सिद्धांत - diffusionist theory of culture
संस्कृति का प्रसारवाद सिद्धांत - diffusionist theory of culture
मानवशास्त्र में प्रसारवादी संप्रदाय के अंतर्गत विभिन्न मानवशास्त्रियों ने संस्कृति को आधार बनाकर अपने शोधों एवं लेखों का विस्तृत वर्णन किया है। परंतु इनके लेखों में संस्कृति की व्याख्या प्रायः ऐतिहासिक दृष्टि से देखने को मिलती है। जहां तक जर्मन प्रसारवाद की बात है, जर्मन प्रसारवाद में सांस्कृतिक तत्व एवं संकुल के विभिन्न स्तरों का वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण किया गया है। उन्होंने बताया की सांस्कृतिक तत्व एवं संकुल प्रवासन तथा प्रसार के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर प्रसारित हुए हैं। इन्होंने इसके लिए सांस्कृतिक चक्र' की अवधारणा प्रस्तुत की है। उनके अनुसार प्रत्येक समाज में सांस्कृतिक वस्तुओं का एक क्षेत्र होता है, जिसमें उस विशेष सांस्कृतिक तत्व या संकुल का रूप मिलता है, जैसे-जैसे यह सांस्कृतिक तत्व आगे बढ़ते हैं, उनमें पारिस्थितिक के आधार पर परिवर्तन होता है और वह दूसरे समाज में थोड़ा भिन्न रूप में प्रदर्शित होता है। ग्रेबनर ने अपनी पुस्तक 'मेथडसर एथनोलॉ' (1911) में विभिन्न सांस्कृतिक स्तरों की व्याख्या की है।
इन्होंने छः क्रमिक सांस्कृतिक स्तरों की व्याख्या की है, जिसमें तस्मानियन संस्कृति को सबसे प्राचीन बताया, जबकि पोलिनेशियन पितृरेखीय संस्कृति को सबसे नवीन बताया। इसके साथ ही साथ उन्होंने संस्कृति के प्रसार को प्राथमिक तथा द्वितीय प्रसार के अंतर्गत विभाजित भी किया है। अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध मानवशास्त्री फ्रांज बॉआस ने समाज एवं संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया।
इसी तरह क्लार्क विसलर ने भी संस्कृति को अपना आधार बनाकर अपने शोध कार्य और पुस्तकों की रचना की और संस्कृति क्षेत्र की अवधारणा विकसित की। उनके अनुसार संस्कृति सीखी जाती है। अतः इसका कोई भी तत्व किसी व्यक्ति या समूह द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समीपवर्ती समूह एक दूसरे से तत्व का ग्रहण दूरस्थ संघ की तुलना में अधिक करते हैं। वह क्षेत्र जिसमें समान संस्कृति पाई जाती है, उसे संस्कृति क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। इसी तरह क्रोबर ने हड्डन द्वारा प्रतिपादित ने कला के उद्विकासीय क्रम को गलत ठहराया। हड्डन के अनुसार कला का उद्विकास क्रम यथार्थवादी, सांकेतिकवादी तथा रेखागणितीय था, जबकि क्रोबर ने अपनी शोध पुस्तिका में यह दर्शाया कि आरापाहो जनजातियों के मध्य अलंकारिक तथा सांस्कृतिक कला के स्वरूपों का विकास साथ-साथ हुआ है। क्रोबर ने कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में तत्व-सूची दृष्टिकोण' पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि संस्कृति अध्ययन में सिद्धांत का निर्माण तथ्य संग्रहण के आधार पर किया जाना चाहिए तथा उनके शिष्यों ने भी विस्तृत सूचना का भंडार स्थापित किया था। क्रोबर का यह अवलोकन था कि विभिन्नता के बावजूद संस्कृति क्षेत्रों में बहुत प्रकार की समानताएं पाई जाती है।
अतः उन्होंने सांख्यिकी सह-संबंध पर विशेष बल दिया, ताकि विशेष सांस्कृतिक तत्वों की समानता का पता लगाया जा सके तथा संस्कृति क्षेत्र को स्पष्ट किया जा सके। उनके अनुसार तत्व सबसे कम परिभाषा योग्य अवयव हैं, लेकिन सबसे कम किसे परिभाषित किया जाए? इस प्रश्न का जवाब कठिन था। जैसे नौका एक तत्व है, लेकिन इसके सभी अंग, सजावट, वस्तु प्रयोग तथा बनावट की विधि को तत्व के रूप में देखा जाना चाहिए। क्रोबर ने संस्कृति को अधिसावयवी तथा अधिवैयक्तिक कहा है। यह सत्य है कि व्यक्ति संस्कृति का वाहक है तथा संस्कृति का अस्तित्व उनके सोचे बिना विचार नहीं किया जाता, इसके बावजूद संस्कृति किसी व्यक्ति विशेष की देन नहीं है। कोई भी संस्कृति किसी व्यक्ति से अधिक है। संस्कृति की स्थिरता या निरंतरता किसी व्यक्ति विशेष पर आश्रित नहीं है, क्योंकि संस्कृति किसी व्यक्ति का व्यवहार नहीं है, बल्कि संस्कृति संपूर्ण समूह की आदत या व्यवहार का एक संरूपण है। किसी व्यक्ति विशेष का व्यवहार या आदत उस व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाती है, लेकिन समूह का व्यवहार पीढ़ी-दर-पीढ़ी अस्तित्व में बना रहता है, क्योंकि संस्कृति की रचना तथा निरंतरता किसी व्यक्ति विशेष पर आश्रित नहीं है। अतः क्रोबर ने संस्कृति को अधिवैयक्तिक कहा है। क्रोबर ने संस्कृति प्रतिमान पर भी अपने विचार रखने का प्रयास किया है। इन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि किसी समाज की कला उस समाज की संस्कृति प्रतिमान होते हैं, क्योंकि किसी कला का निर्माण विभिन्न संस्कृति तत्व एवं संकुलों के माध्यम से होता है, जो धीरे-धीरे उस समाज के संस्कृति के प्रतिमान बन जाते हैं।
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