बीमारियों का रोकथाम, उपचार एवं स्वास्थ्य उन्नति - Disease prevention, treatment and health promotion

बीमारियों का रोकथाम, उपचार एवं स्वास्थ्य उन्नति - Disease prevention, treatment and health promotion


समाज मनोविज्ञान में रोकथाम का संप्रत्यय एक महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। रोकथाम से तात्पर्य जनसंख्या में किसी उत्पन्न होने एवं उसे प्रचलित होने को रोकने से होता है तथा यह कार्य जन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं

द्वारा काफी किया जाता है।


जन स्वास्थ्य हस्तक्षेप निम्नांकित तीन रूपों में हो सकते हैं -


(i) व्यक्तियों में कुछ इस ढंग का परिवर्तन कर दिया जाए कि वे रोगात्मक एजेंटों से डटकर मुकाबला करें। इसके तहत किसी रोग से असंक्रमीकरण अभियान को रखा जाता है। 


(ii) रोगात्मक एजेंटों से संपर्क होने की संभावना को काम करके भी हस्तक्षेप कार्य संपन्न किया जा सकता है। इसके अंतर्गत कुछ विशेष तरह की पोशाक पहनना, प्रभावित अंगों को असंदूषित करना आदि को रखा जाता है।


(iii ) वातावरण को जिसमे रोगात्मक एजेंट परिपोषित होते हैं. कोई स्थान से परिवर्तित कर देना की वैसे एजेंट पूर्णता नष्ट हो जाए। इसमें जलजमाव पर दवा का छिड़काव, नाली एवं नालों की सफाई आदि आते हैं।


जन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तथा समाज मनोवैज्ञानिकों ने जिसमें एडोल्फ मेयर, लैंडमार्क तथा का प्लान नाम मशहूर है, ने रोकथाम के निम्नांकित तीन प्रकार बताए हैं-


1- प्राथमिक निवारण या रोकथाम


2- द्वितीयक निवारण या रोकथाम


3- तृतीयक निवारण या रोकथाम


इन तीनों का वर्णन निम्नांकित है-


1- प्राथमिक रोकथाम- प्राथमिक रोकथाम से तात्पर्य वैसे रोकथाम से होता है जिसका उद्देश्य वैसे जीव संख्या जनसंख्या में किसी बीमारी को उत्पन्न होने से रोकने से होता है

जिसमें उस बीमारी के होने की संभावना अधिक तीव्र होती है। काप्लान, (1964) के अनुसार, प्राथमिक रोकथाम से तात्पर्य उन दोषपूर्ण परिस्थितियों को बीमारी उत्पन्न करने के पहले ही इस पर नियंत्रण कर लेने से होता है। इन्होंने अपने 'निरोधक मनोरोग विज्ञान' में यह स्पष्ट किया है कि व्यक्ति के उपयुक्त विकास के लिए कुछ 'आपूर्ति' की जरूरत होती है । इन आपूर्ति में कमी होने से स्वास्थ्य मनोविज्ञान विकास अवरुद्ध हो जाता है। ऐसी आपूर्ति के तीन प्रकार बतलाए गए हैं- दैहीक आपूर्ति मनोसामाजिक तथा सामाजिक सांस्कृतिक आपूर्ति ।


2- द्वितीयक रोकथाम द्वितीयक रोकथाम से तात्पर्य वैसे रोकथाम से होता है जिसमें मानसिक समस्याओं की पहचान प्रारंभिक अवस्था में ही कर लिया जाता है तथा उसका उपचार उसी अवस्था में करके आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है। इस तरह की रोकथाम की एक महत्वपूर्ण पूर्व कल्पना यह है कि प्रारंभिक समस्याएं कुछ आरंभिक लक्षणों के आधार पर पहचाने जा सकती हैं और उस समय ही इनके साथ हस्तक्षेप किया जाए तो इसकी गंभीरता को भविष्य में बढ़ने से रोका जा सकता है। द्वितीयक रोकथाम की कई अध्ययनों जैसे- काप्लान (1961), सैनफोर्ड (1965) ग्लास (1963), आइसन वर्ग (1962) तथा फेयर्स (1984) द्वारा दी गई।


द्वितीयक रोकथाम कार्यक्रम की दो प्रमुख विशेषता होती है -


(i) द्वितीयक रोकथाम में वैसे सभी व्यक्तियों की जांच व्यक्तित्व परीक्षण जैसे MMPI या अन्य इसी तरह के परीक्षणों के आधार पर किया जाता है जिसमें उस समय किसी भी तरह के स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते हैं।


(ii) फिर ऐसे व्यक्तियों को उचित नैदानिक सेवाएं प्रदान की जाती है। ऊपर के वर्णन से स्पष्ट है कि द्वितीयक रोकथाम के दो पहलू होते हैं- जांच पड़ताल का कार्य तथा उसके बाद संभावित समस्याओं को के लिए किया गया उपचार हस्तक्षेप | समाज मनोवैज्ञानिकों तथा सामुदायिक मनोविज्ञान को दोनों का ही मत है कि जांच पड़ताल का काम कितना भी उत्तम ढंग से क्यों ना किया गया हो, यदि उसके बाद उचित उपचार हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो सफलता प्राप्त नहीं हो पाती है। इसीलिए यह आवश्यक है कि प्रभावित लोग उचित उपचार हस्तक्षेप प्राप्त करें। इसके लिए द्वितीयक रोकथाम में तीन संबंध उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जन सूचना कार्यक्रम चलाए जाते हैं-


(i) सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ को मानसिक समस्याओं के प्रारंभिक अवस्था के लक्षणों के बारे में लोगों को बतला देना चाहिए।


(ii) ऐसे विशेषज्ञों को इन समस्याओं को दूर करने के दिनों के बारे में बतला देना चाहिए। 


(iii) ऐसे विशेषज्ञों को उन पूर्वधारणाओं या पूर्वाग्रह से लड़ना चाहिए जिसके कारण प्रभावित लोगों में अपनी समस्याओं के निवारण के लिए किसी विशेषज्ञ की सहायता लेने में हिचकिचाहट होती है। कई अध्ययनों के आधार पर इस तथ्य की पुष्टि की गई है कि यदि उपचार हस्तक्षेप सफलतापूर्वक पूरा कर लिया जाता है. तो द्वितीयक रोकथाम का कार्यक्रम भी सफल हो जाता है।


3- तृतीयक रोकथाम तृतीयक रोकथाम में मानसिक रोग उत्पन्न हो जाने के बाद उसके प्रभावों को कम करने की कोशिश की जाती है। तृतीयक रोकथाम का मुख्य उद्देश्य रोग से प्रभावित हो जाने के बाद उसके नकारात्मक प्रभावों तथा उसकी अवधि को कम करना होता है।

इसमें रोगी को नया कौशल सिखाया जाता है ताकि वह अपने हीन भावना से लड़ सके तथा उसमें समायोजन एवं सामर्थ्यता कि नई शक्ति उत्पन्न हो सके इसी रोकथाम के तहत रोगियों का पुनर्वास, सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य सेवा के प्रति नई मनोवृति, आंशिक अस्पतालकरण तथा सामुदायिक लॉज चलाने आदि की व्यवस्था होती है। इन सभी साधनों का प्रयोग करके रोगियों से उत्पन्न नकारात्मक प्रभावों से लड़ने की क्षमता में वृद्धि की जाती है ताकि वह अपने भविष्य के साथ ठीक ढंग से समायोजन कर सके। स्वास्थ्य देखरेख में रंग की नई चेतना के फलस्वरूप टेलर, (1978) ने दो महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया है जिस पर समस्त मनोवैज्ञानिकों को गंभीरता पूर्वक सोचना होगा -


(i) अपने बीमारियों के सफल आत्म प्रबंधन में रोगियों को मिश्रित करने तथा अभी प्रेरित करने में डॉक्टर - रोगी संबंध का महत्व 


(ii) चीरकालिक बीमारियों के प्रति मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया को इस तरीके से समझ ना जिससे रोगी तथा उनके परिवार तनाव के साथ ठीक ढंग से निपट सके।


स्पष्ट है कि लक्षणों का नियंत्रण एवं उपचार की प्रतिक्रिया भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसमें समाज मनोवैज्ञानिक एक मजबूत योगदान कर सकते हैं। समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यक्तियों के स्वास्थ्य उन्नति के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख है -


(1) मेडिकल संगठनों अर्थात अस्पतालों में प्राधिकार की रेखा कई स्तरों पर ना होकर अगर सबसे ऊपरी सतह पर केंद्रित होता है, तो इससे ऐसे संगठनों द्वारा स्वास्थ्य उन्नति के बारे में उठाया गया कदम अधिक लाभकारी होता है।


(ii) रोगी तथा डॉक्टर के पारस्परिक कौशल को उन्नत बनाने से भी स्वास्थ्य उन्नति तेजी से होता है।


(iii) डॉक्टर का रोगी के ऊपर जितना ही सामाजिक प्रभाव तथा सामाजिक सप्ताह अधिक होता है, रोगी का स्वास्थ्य व्यवहार अधिक प्रबल होता है।


(iv) जिन रोगियों में आत्म सम्मान तथा आत्मविश्वास मजबूत होता है, उनका स्वास्थ्य व्यवहार उन रोगियों की तुलना में अधिक तेजी से उन्नत होता है जिनमें ऐसा आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास कमजोर होता है।


स्पष्ट हुआ कि आज मनोवैज्ञानिकों द्वारा लोगों के स्वास्थ्य व्यवहार को उन्नत बनाने के लिए कुछ प्रशंसनीय सुझाव दिए गए हैं।