दूर शिक्षा की शिक्षण विधियाँ - Distance Education Methods of Teaching

 दूर शिक्षा की शिक्षण विधियाँ - Distance Education Methods of Teaching


दूर शिक्षा की प्रणाली, परंपरागत शिक्षा प्रणाली से कई अर्थों में भिन्न है। दूर शिक्षा के उद्देश्य, प्रक्रिया स्वरूप, व्यवस्था, प्रशासन तथा मूल्यांकन प्रणाली परंपरागत प्रणाली से बिल्कुल भिन्न प्रकार की है। इसे परंपरागत प्रणाली का विकल्प नहीं कहा जा सकता है क्योकि इस प्रणाली के अंतर्गत ऐसे छात्रों का अध्ययन का अवसर दिया जाता है जो परंपरागत शिक्षा के माध्ययम से शिक्षा ग्रहण करने से वंचित रहते हैं। इस प्रकार शिक्षा प्रणाली का नवीन आयाम ही माना जाता है, जिसका उपयोग विश्व के सभी विकासशील देशों में किया जाने लगा है। परंपरागत शिक्षक की भूमिका से दूरवर्ती शिक्षक की भूमिका तथा उततरदायित्व भी अधिक होते है। दूर शिक्षा को शिक्षण तथा अनुदेशन के साथ अनेक कार्यों की व्यवस्था भी करनी होती है। वह शिक्षक की अपेकषा प्रबन्धक अधिक होता है। दूर शिक्षा प्रणाली में शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया का आयोजन दो अवस्थाओं में करना होता है -


1 अनुदेशन प्रक्रिया


2 संपर्क कार्यक्रम की व्यवस्था


इन अवस्थाओं के लिए शिक्षक को अनेक प्रकार की शिक्षण विधियाँ तथा प्रविधियों को प्रयुक्त करना होता है। दूरवर्ती शिक्षक को शिक्षण विधियों एवं प्रविधियों की उपयोगिता के साथ उनके अर्थ प्रकार तथा स्वरूप का ज्ञान होना भी आवश्यक है तभी वे इनकी सार्थकता तथा व्यावहारिकता का अनुभव कर सकते हैं।


दूर शिक्षा की प्रमुख शिक्षण विधियों का वर्णन क्रमबद्ध अवस्थाओं के रूप में किया गया है -


1 अनुदेशन प्रक्रिया - दूर शिक्षा में मुद्रित माध्यम महत्वपूर्ण होता है,

परंतु अनुदेशन सामाग्री की रचना विषय के शिक्षकों द्वारा की जाती है। यह अनुदेशन सामाग्री पुस्तकों की रचना से भिन्न होती है। अनुदेशन सामग्री की रचना में नवीन आयामों का प्रयोग किया जाता है जिससे छात्र स्वाध्याय से ही पाठ्य वस्तु को समझ लें। अभिक्रमित अनुदेशन का ज्ञान तथा कौशल होना आवश्यक होता है। अनुदेशन सामग्री को छात्रों की आवश्यकताओं और उनकी विषमताओं को ध्यान में रखना होता है। सभी शिक्षक उत्तम प्रकार की अनुदेशन सामाग्री नहीं तैयार कर सकते हैं। दूरवर्ती शिक्षकों को यह एक चुनौती का सामना करना होता है।


अनुदेशन सामग्री या अध्ययन सामग्री में दूरवर्ती छात्र के लिए अभ्यास हेतु गृहकार्य भी दिये जाते हैं। इन गृह कार्यों का छात्रों की अधिगम की दृष्टि से अधिक महत्व होता है इसमें संपर्क कार्य तथा सहायक प्रणाली मुख्य है।

इसके साथ-साथ गृहकार्य के अर्थ, प्रकार स्वरूप, विशेषताओं तथा सीमाओं पर ध्यान दिया जाता है। इस प्रकार शिक्षण को प्रथम अवस्था में पाठ्य सामाग्री की रचना करना और उनमें अध्ययन के अभ्यास हेतु गृहकार्य को देना है।


2 संपर्क कार्यक्रम में शिक्षण प्रक्रिया की व्यवस्था दूर शिक्षा प्रणाली के संबंध में यह धारणा है तथा अनुभव भी है कि अनुदेशन पाठ्य सामाग्री से छात्रों की कठिनाइयों तथा समस्याओं का समाधान है। छात्र एवं शिक्षकों के मध्य अन्तः प्रक्रिया हेतु संपर्क कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। अनुदेशानात्मक शिक्षण प्रक्रिया से ज्ञानात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है। भावात्मक तथा क्रियात्मक उद्देश्य की प्राप्ति वास्तविक शिक्षण प्रक्रिया से ही संभव होता है।

संपर्क कार्यक्रम के शिक्षकों को कई क्रियाएँ करनी होती हैं-


I. अनुवर्ग शिक्षण (Tutorial Teaching


II. स्वामित्व अधिगम शिक्षण (Mastery Teaching Strategies )


III.निदान एवं अधिगम संबंधी कठिनाइयों का समाधान करना (Diagnosis and Remedy for Learning difficulties)


(क) शाखीय अभिक्रमित (Branching Programming )


(ख) समायोजन प्रविधियाँ (Adjustive Devices)


4 निर्देशन एवं परामर्श देना तथा


5 विचार गोष्ठी प्रविधि तथा समूहिक वाद-विवाद प्रविधि


संपर्क कार्यक्रमों के शिक्षण की व्यवस्था अध्ययन केन्द्रों पर की जाती है। शिक्षण के कार्य हेतु स्थानीय शिक्षा संस्थाओं से शिक्षकों को लिया जाता है। यह अपने परंपरागत ढंग से शिक्षण करते है, जिससे संपर्क कार्यक्रमों का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है। यदि इन्हें कुछ प्रक्षीक्षण दिया जाए तब वे दूरवर्ती छात्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेंगे। संपर्क कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य होता है कि उनके अध्ययन संबंधी कठिनाइयों तथा समस्याओं के लिए भी परामर्श दिया जाना चाहिए। गृहकार्य पर जो टिप्पणी दी गयी है उनके अर्थ को समझना होता है। परीक्षा समबन्धी तैयारी हेतु भी ठोस निर्देशन दिया जाता है। आज कि शिक्षा परीक्षा केन्द्रित है एसलिए दूरवर्ती छत्रों का लक्ष्य परीक्षा कि तैयारी करके अच्छे अंक प्राप्त करना होता है। संपर्क कार्यक्रम में शिक्षण प्रक्रिया अधिक जटिल होती है, इसलिए दूरवर्ती शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था अलग से होनी आवश्यक है।