आश्रमों का विभाजन - division of ashrams

आश्रमों का विभाजन - division of ashrams


आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति की आयु को फॉरवर्ड मानकर उसके संपूर्ण जीवन को पश्चिम 25 वर्ष के चार आश्रमों ब्रम्हचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ सन्यास आश्रम में बांटा गया है। इन चारों आश्रमों में कम से रहता हुआ व्यक्ति धर्म अर्थ काम मोक्ष नाम चार पुरुषार्थों की प्राप्ति करता है। इन चारों उद्यमों का एक दूसरे के साथ इतना निकट का संबंध है कि एक आश्रम के कर्तव्यों को निभाएं बिना व्यक्ति दूसरे आश्रम में संबंधित दायित्वों को ठीक से पूरा नहीं कर सकता। प्रत्येक आश्रम में धर्म की मर्यादा के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करने के पश्चात ही व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनता है। इन चारों आश्रमों की विवेचना निम्नलिखित है


आश्रम व्यवस्था


1 ब्रह्मचर्य


2 गृहस्थ


3 वानप्रस्थ


4 सन्यास आश्रम


1.ब्रह्मचर्य आश्रम:- मनु के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र सभी मूलतः रुद्र के रूप में जन्म लेते हैं। उसके पश्चात संस्कार द्वीप उच्यते अर्थात धार्मिक संस्कारों द्वारा यह दिलीप बनाता है अर्थात जब ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कुछ संस्कारों को पूरा करते हैं तभी वह द्विज कहलाते हैं इन संस्कारों में उपनयन संस्कार सबसे महत्वपूर्ण है इस संस्कार के बाद बालक शिक्षा प्राप्त करने योग्य बन जाता है जिसका उपनयन संस्कार नहीं होता वह द्विज जाति के नहीं कहे जाते थे। इसके अलावा शूद्रों का कभी भी उपनयन संस्कार नहीं होता था इस संस्कार के संपादन विषय विभिन्न वर्गों में अलग-अलग बताया गया। यही कारण है कि इस आश्रम में प्रवेश की आयु ब्राह्मण बालक के लिए 8 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 11 वर्ष वैश्य के लिए 12 वर्ष बताई गई है।


ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'ब्रम्ह' व चर" ब्रम्ह" का तात्पर्य महान और चार्य का अर्थ है अनुकरण करना। इस प्रकार ब्रम्हचर्य का अर्थ है

महानता के मार्ग पर चलना अर्थात महान आत्माओं का अनुकरण करना। ब्रम्हचर्य का तात्पर्य स्वयं से भी है लेकिन यहां ब्रह्मचर्य को केवल एक पक्ष है। डॉ. प्रातदत्त द्विवेदी के अनुसार ब्रम्हचर्य का तात्पर्य केवल इंद्री विग्रह से नहीं था अपितु इंद्रियनिग्रह पूर्वक वेदाध्ययन से था क्योंकि ब्रह्मा और वेद यह दोनों पर्यायवाची शब्द है। ब्रह्मचारी तब के माध्यम से अपनी साधना करता था तथा अपने अंदर अनेक गुणों का विकास करता था।


ब्रह्मचर्य आश्रम में बालक को गुरुकुल में रहना पड़ता था और यही से वेदों का अध्ययन प्रारंभ होता था। परंतु उपनयन संस्कार के बाद बालक तुरंत अध्ययन प्रारंभ नहीं करता था गुरु उसे बहुत से कार्य जैसे ईंधन लाने पशुओं की देखभाल दान प्राप्त करना इत्यादि देता था। जब गुरु बालक के कार्यों से प्रसन्न हो जाता और यह समझ लेता कि बालक में वास्तव में अध्ययन की इच्छा व जिज्ञासा है

तभी उसे वेदों के अध्ययन की आज्ञा दी जाती थी। वेदों के अध्ययन का सांस्कृतिक परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने, ऋषि ऋण से छुटकारा प्राप्त करने और ऋषि यों के प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्त करने की दृष्टि से विशेष था। धर्म शास्त्रों में विद्यार्थी की दिनचर्या से संबंधित बहुत से नियम बताए गए हैं। उनका कर्तव्य से था कि वह प्रातः सूर्योदय के पूर्व उठे दिन में केवल दो बार भोजन करें, शहद नमक मीठी बब्बू मानगंज जूता छतरी इत्यादि का प्रयोग न करें। नृत्य जुआ झूठ हिंसा इत्यादि वर्जित था। ब्रह्मचारी के लिए विभिन्न कर्तव्यों का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि वह अपना शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास कर सके। इस आश्रम में वह अपने शारीरिक व मानसिक क्षमताओं का विकास करता है तथा अनेक विधाओं से स्वयं को परिपूर्ण तथा अपनी आस्था को पवित्र बनाता है।


ऐसा करने के लिए योगिक सयम, यथार्थ आचरण, सत्य प्रयोग एवं सत्य की खोज करता था तथा आध्यात्मिक विकास हेतु अनेक यम निकायों का पालन करना था।


ब्रह्मचर्य आश्रम के सभी दायित्वों को पूरा कर लेने के बाद ब्रह्मचारी को स्नातक कहा जाता था। सपना तक के बाद ब्रहमचारी एक विशेष संस्कार के द्वारा गुरु का आशीर्वाद लेकर अपने घर को जाता था। इस संस्कार को समावर्तन संस्कार कहा जाता है। यहीं से ब्रह्मचर्याश्रम की समाप्ति मानी जाती थी। 


ब्रह्मचर्य आश्रम का महत्व


• बालक के शारीरिक मानसिक व आध्यात्मिक विकास में अत्यंत महत्व है।


• यह आश्रम समाज की ऐतिहासिक परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने में विशेष रूप से सहायक रहा है।


• यहां बालक अपने संपूर्ण कर्तव्यों से परिचित होता है।


• युवावस्था का संतुलित विकास करने में सहायक होता है 


2. गृहस्थ आश्रम:- ब्रह्मचर्य आश्रम में अध्ययन कार्य पूर्ण करने के पश्चात विवाह संस्कार संपन्न होने पर व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है जहां वह 26 से 50 वर्ष की आयु तक रहता है यह आश्रम कि वह महान कार्यक्रम स्थल है जहां व्यक्ति ब्रम्हचर्य आश्रम में प्राप्त शिक्षकों को मूर्त रूप देता है इस आश्रम में व्यक्ति धार्मिक एवं सामाजिक दायित्वों को पूरा करने की ओर आगे बढ़ता है यहां मर्यादा में रहता हुआ व्यक्ति धर्म अर्थ काम नामक पुरुषार्थों को प्राप्त करता है इस आश्रम में रहकर ही वह स्वयं परिवार एवं समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता हुआ अपने को आगे के आश्रम में योग्य बनाता है.


पंच महा यज्ञ में है ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नितयज्ञ एंव अति ब्रह्मयज्ञ, रामऋषियज्ञ ऋषियों के ऋण से मुक्त होने के लिए किया जाता था। गृहस्थ को वेदों का अध्ययन अध्यापन करना पड़ता था।

देवयज्ञ, पितृयज्ञ, देव की पूजा अर्चना व संतान की उत्पत्ति का पितृऋण से मुक्त होते थे। भूतयज्ञ में बुरे प्रकोप से बचने के लिए बलि दे दिया जाता था। नृयज्ञ से अतिथि सत्कार श्री गोखले ने गृहस्थ धर्म के संबंध में बताया है कि इस आश्रम के अंतर्गत एक गृहस्थ का धर्म है कि वह जीव हत्या असंयम तथा असत्य से दूर रहें। पक्षपात, शत्रु, निर्बुद्धिता, तथा डर को पास न आने दे। मादक द्रव्यों का सेवन, कुशल, अकर्मण्यता और चाटुकारों पर धन व्यय न करे। माता-पिता आचार्य और बड़ों का आदर करें पत्नी के प्रति उत्तम व्यवहार धर्म अर्थ तथा काम की मर्यादाओं के अनुसार हो इस प्रकार परिवार के सदस्यों में पारस्परिक आदर तथा एक दूसरे के कल्याण का ध्यान ही कुल धर्म का सार है। गृहस्थ के इन सभी दायित्वों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि गृहस्थ आश्रम व्यक्ति के लिए भोग-विलास का काल ना होकर यज्ञ में जीवन कर्म एवं साधन का महान स्थल है।


गृहस्थ आश्रम के सारे दायित्वों को यज्ञ दान और तप के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है एक गृहस्थ कर्तव्य है कि वह देवताओं ऋषियों, माता-पिता, अतिथियों तथा अन्य प्राणियों के प्रति अपने दायित्वों को निभाएं तथा देवता, ब्राम्हण, गुरु व विद्वतजनों का पूजन करें।

इसके अलावा गृहस्थ के लिए प्रतिदिन धर्म पूर्ति के लिए पंच महायज्ञ का विधान किया गया है इन सभी का उद्देश्य विभिन्न प्रकार की हिंसा से अपने आप को मुक्त करना इन लड़कियों के द्वारा गृहस्थ रिसीव माता पिता अतिथियों और विभिन्न प्राणियों के प्रति दायित्वों का निर्वाह करता था इन यज्ञों का लक्ष्य व्यक्ति में ईश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करना उसे वैदिक साहित्य की ओर लगाना समाज की संस्कृति एवं परंपराओं की रक्षा करना ऋषि-मुनियों, गुरुजनों, माता-पिता एवं अथितियों के प्रति दायित्व निर्वाह और उसे प्रेरित करना रहा है। पंचमहायज्ञ के माध्यम से गृहत्याग में जीवन व्यतीत करता करता हुआ अपने और समाज के जीवन को उन्नत बनाने में महत्वपूर्ण योग देता रहा है देव ऋण वितरण ऋषि ऋण से छुटकारा प्राप्त करने के लिए भी विभिन्न विधियों का संपादन आवश्यक बताया गया है। गृहस्थ आश्रम का महत्व सबसे अधिक है?


उपनिषदों महाभारत कथा समितियों में अस्पष्टता बताया गया है कि गृहस्थ आश्रम में जीवन व्यतीत किए बिना व्यक्ति के लिए मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं है इस आचरण की महत्ता इस दृष्टिकोण से विशेष है कि गृहस्थ जीवन के साथ उन्हें एक सामाजिक धार्मिक और नैतिक कर्तव्यों से जुड़े हुए हैं अन्य तीनों आश्रमों के लोग अपने भरण पोषण के लिए गृहस्थ पर ही निर्भर हैं।


अर्थात सब आश्रमों के व्यक्ति गृहस्थ के हाथों में ही सुरक्षा एवं स्थायित्व प्राप्त करते हैं गृहस्थ आश्रम को अन्य आश्रमों की तुलना में सबसे अधिक महत्व दिया जाने के कुछ विशेष कारण है जिनका यह संक्षेप में उल्लेख करेंगे।


1- पुरुषार्थों की पूर्ति का स्थल गृहस्थ आश्रम एक ऐसा स्थान है जहां अर्थ नामक पुरुषार्थ को उपार्जित किया जाता है और काम का उपयोग किया जाता है अन्य तीनों आश्रमों में हिंदू पुरुषार्थों की कोई व्यवस्था नहीं है यहां व्यक्ति धर्म के अनुसार विभिन्न दायित्वों को निभाते है धर्म नामक पुरुषार्थ को उपार्जित करना है इस आश्रम में इन तीनों पुरुषार्थों को प्राप्त करता हुआ व्यक्ति अपने को चौथे पुरुषार्थ मोक्ष प्राप्ति के लिए तैयार करता है या संभोग और और त्याग दोनों के महत्व पर समान रूप से प्रकाश डालता है।


2- यज्ञ का संपादन- सभी प्रकार के ऋण से मुक्त होने के लिए यज्ञ की पूर्ति आवश्यक बताई गई है यह यज्ञ पांच माने गए हैं ब्रह्म यज्ञ देव यज्ञ पितृयज्ञ भूत यज्ञ तथा अतिथि यज्ञ यज्ञ इन पांचों महायज्ञ का निर्वाह गृहस्थ आश्रम में ही सुगमता पूर्वक किया जा सकता है इन यज्ञ का महत्व इसी दृष्टि से है

कि इन के माध्यम से गृहस्थ समाज के विभिन्न लोगों के प्रति अपने दायित्वों को पूर्ण करता है हिंदू जीवन दर्शन के अनुसार व्यक्ति केवल अपने लिए ही नहीं जीता है वह समाज का एक घटक है समाज से बहुत कुछ ग्रहण करता है अतः समाज के प्रति उसका कुछ दायित्व भी है। इसी दायित्व को व विभिन्न वर्गों के संपादन द्वारा निभाता है।


3- समाज के सामान्य कल्याण में योगदान आश्रमों की अपेक्षा गृहस्थाश्रम का समाज के सामान्य कल्याण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्व है एक गृहस्थ ही अन्य तीनों आश्रमों के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सामूहिक कल्याण में योग दे सका है।


गृहस्थ के सहयोग के बिना अन्य तीनों आश्रम के लोगों के लिए अपने कर्तव्य को निभाना किसी भी रूप में संभव नहीं था अतः गृहस्थ ही संपूर्ण समाज के हित में विशेष योगदान दे पाता था। 4- ऋणों से मुक्ति- गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति जीवन के निम्न 3 दिनों से मुक्ति पाने के लिए निम्न कार्यों को संपादित करता है।


ऋणों के नाम          मुक्ति के उपाय


देव ऋण                 यज्ञ, हवन


ऋषि ऋण               अध्ययन अध्यापन


पितृ ऋण                 संतान, उत्पादन


5- आर्थिक क्रियाओं का संपादन- गृहस्थ आश्रम में रकर व्यक्ति की आर्थिक क्रियाओं का संपादन करता है इन क्रियाओं का संपादन करके वह समाज के भरण पोषण की व्यवस्था करता है इसमें वह कृषि व्यवसाय तथा अन्य उत्पादन कार्यों को संपादित करके समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयास करता है।


6- अन्य आश्रमों का आधार गृहस्थ आश्रम अन्य तीनों आश्रमों के लिए आधार प्रस्तुत करता है अगर गुहस्थ आश्रम ना हो तो व्यक्ति विवाह न करें और संतानों संतानोत्पत्ति न करें तो ब्रम्हचर्य आश्रम की कल्पना भी नहीं की जा सकती ज्ञान प्रश्न और सन्यास आश्रम का महत्व भी गृहस्थ आश्रम पर ही आधारित है इस आश्रम के उपयुक्त महत्व को ध्यान में रखकर ही यह कहा गया है कि गृहस्थ आश्रम में अधूरी है जिस पर संपूर्ण आश्रम व्यवस्था का अस्तित्व बना हुआ है।


3- वानप्रस्थ आश्रम- शास्त्रकारों के अनुसार 50 वर्ष की आयु पूरी कर लेने पर व्यक्ति को वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए मनुस्मृति के अनुसार जब गृहस्थ यह देखें कि उसके शरीर की त्वचा शिथिल व झुर्रीदार हो गई है. बाल पक गए हैं, पुत्र को भी पुत्र हो गया है, सब विषयों से मुक्त होकर वन का आश्रय ले लिया हो। डॉ. काणे ने लिखा है कि 50 वर्ष की अवस्था हो जाने पर व्यक्ति संसार के सुख और वासनाओं से ऊब जाता है, तथा वन की राह पकड़ लेता है। जहां वह आत्मा निग्रह तपस्वी निअपराध जीवन व्यतीत करता है। शाब्दिक दृष्टि से वानप्रस्थ का अर्थ है "वन की ओर प्रस्थान करना" स्पष्ट है कि 50 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति अपने परिवार नाते रिश्तेदारों और समाज को छोड़कर जंगल में चला जाता है और मानव व प्राणी सेवा में अपना ध्यान लगाता है वानप्रस्थ के लिए यह निर्देश है कि वह जंगल में कुटिया बनाकर रहे। वह जंगल में अकेला भी जा सकता है या पत्नी के साथ भी। जंगल में वह सेवा, त्याग व तपस्या में जीवन व्यतीत करता है। सांसारिक मोह माया से विरक्त होने का प्रयास करता है। वानप्रस्थी निष्काम भाव से कर्म करता है तथा विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ मित्र निर्माण एवं विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।


इस आश्रम का एक लक्ष्य व्यक्ति में सन्यास आश्रम के लिए तैयार करना भी है इस तथ्य को ध्यान देते हुए वानप्रस्थी के कर्तव्यों का निर्धारण किया गया है। वह सांसारिक सुखों से अलग होकर भोजन के रूप में फल-फूल कंद-मूल का सेवन करता है। पेड़ों की छाल इस्तेमाल करता है।

लुक भट्ट ने इंद्रिय संयम संसार से विरक्ति क्षमता का अभाव जीवो पर दया जीवन निर्वहन बिछा द्वारा इत्यादि वानप्रस्थी के मुख्य धर्म बताए हैं। यहां पर भी वह पंच महा यज्ञ को करना जारी रखता है। वानप्रस्थ आश्रम का महत्व:- निम्न कारणों से वानप्रस्थ महत्वपूर्ण है।


1- निशुल्क शिक्षा:- वानप्रस्थी सत्य की खोज और आध्यात्मिक ज्ञान के प्राप्त करने का निरंतर प्रयास करता है। वह सत्य की खोज करके ब्रह्मचारियों में इसका निशुल्क वितरण करता है। इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षा दीक्षा दी जाती थी जो बिना किसी मूल्य के वितरित किया जाता था।


2- शिक्षा का प्रचार प्रसार:- निशुल्क शिक्षा के माध्यम से वानप्रस्थी सब को शिक्षित करने व ज्ञान देने


का प्रयास करते थे इस प्रकार समाज में बिना किसी विरोध व संस्कृत शिक्षा का प्रचार प्रसार होता था।


3- समाज सेवा:- वानप्रस्थ परिवार का सदस्य न रहकर समाज और राष्ट्र का वह हो जाता है वह समाज का विकास और उन्नति का निरंतर प्रयास करता है। इस प्रकार समाज कल्याण व समाज सेवा के कार्यों का संपादन स्वतः होता रहता है। 


4- संघर्षों से मुक्ति:- आज समाज में जो संघर्ष है, वह पीढ़ियों का संघर्ष है नई व पुरानी विचारधारा के टकराव का संघर्ष है। यह टकराव इसलिए है कि युवा पीढ़ी को उचित समय पर परिवार के अधिकार नहीं मिल पाते हैं। वानप्रस्थ आश्रम युवकों को समय पर अधिकार प्रदान करके पारिवारिक और सामाजिक संघर्षों से व्यक्ति और समाज को मुक्ति दिलाता है।


4- सन्यास आश्रम:- मनुस्मृति में बताया गया है कि आयु के तीसरे भाग को वन में व्यतीत करने के बाद, आयु के चौथे भाग अर्थात 75 वर्ष की आयु के पश्चात वानप्रस्थी जब संसार को छोड़कर सन्यास आश्रम में प्रवेश करता था. वह सामाजिक व सांसारिक संबंधों से पूर्णतया विरक्त हो जाता है। तब वह पूर्णतया सन्यासी माना जाता था।


सन्यास आश्रम में प्रवेश करने पर सन्यासी अपना पुराना नाम त्यागकर नया नाम ग्रहण करता है। उसके सगे-संबंधी वानप्रस्थ आश्रम से निकलने के बाद सन्यासी का प्रतीकात्मक दाह संस्कार कर देते थे। अब वह इस आश्रम में अपनी पत्नी को अपने साथ नहीं रख सकता था, और ना ही एक जगह पर निवास कर सकता था। उसे हमेशा भ्रमण करना होता है।

वह कहां है इसकी जानकारी उसके परिवार को भी नहीं होती थी। अर्थात पूर्णतः सांसारिक संबंधों का पूरी तरह से त्याग। इस आश्रम में सन्यासी के लिए एक ही पुरुषार्थ प्राप्त करना शेष रहता है, वह है मोक्ष। इसकी प्राप्ति के लिए उसे सब कुछ त्यागना पड़ता है। वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए लोगों को उपदेश देता है। सन्यासी को अपने पास कुछ भी रखने की अनुमति नहीं थी। जीवन मृत्यु की चिंता से परे उसे दिन में एक बार भिक्षा मांगकर भोजन की अनुमति थी।


वायु पुराण के अध्याय 8 में सन्यासी के 10 कर्तव्य बताए गए हैं-


1. भिक्षावृत्ति से भोजन प्राप्त करना


2. चोरी न करना


3. वाह्य तथा आंतरिक पवित्रता बनाए रखना


4. प्रमादी न होना


5. ब्रम्हचर्य का पालन करना


6. दया भावना


7. क्षमावान होना


8. क्रोध न करना


9. गुरु सेवा


10. सत्य बोलना


अतः स्पष्ट है कि सन्यासी संसार में रहते हुए परलौकिक जीवन में प्रवेश करता है। आश्रम व्यवस्था के अनुसार सामान्य नियम तो यही है कि व्यक्ति ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ के दायित्वों को पूरा करने के पश्चात ही सन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता है। लेकिन मनु, याज्ञवल्क्य और जांबली का मत है कि यदि व्यक्ति ने गृहस्थ आश्रम में ही अपनी इंद्रियों पर पूर्णतया नियंत्रण कर लिया हो तो वानप्रस्थ आश्रम के बिना वह सीधे सन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता है।


सन्यास आश्रम का महत्व


सन्यास आश्रम के निम्नलिखित महत्व इस प्रकार हैं- 


1- विश्व कल्याण:- यह आश्रम व्यक्ति को विश्व कल्याण का चिंतन करने की प्रेरणा प्रदान करता है। इस अवस्था में व्यक्ति सब कुछ त्याग देता है। परमात्मा में लीन हो जाता है। 


2- सामाजिक संतुलन:- सन्यासी सब कुछ त्याग देता है। वह अपने को इस प्रकार ढालता है, जिससे उसके जीवन में काम, क्रोध, मद और लोग को कोई स्थान न मिले। किसी प्रकार के संघर्ष की कोई गुंजाइश नहीं रहती। संघर्ष ना होने की स्थिति में संतुलन बना रहता है और सामाजिक व्यवस्था संगठित रहती है।


3- आश्रम में सन्यासी में परोपकार की भावना विकसित होती है।


4- धर्म पालन ही सन्यासी की मुख्य दिनचर्या होती है जिससे धर्मगत व्यवहार से सन्यासी खुद निर्देशित होता है वह दूसरों को भी निर्देशित करता है। 


5- व्यक्ति का पूर्णरूपेण अर्थात शारीरिक व मानसिक विकास होता।