विवाह-विच्छेद - divorce

विवाह-विच्छेद - divorce


ईसाई धर्म में विवाह-विच्छेद की मान्यता नहीं दी गई है। उनके धर्म ग्रंथ बाइबिल में विवाह विच्छेद के विरोध में कथन मिलते हैं। विवाह के दौरान चर्च का पादरी कहता है कि जिनको ईश्वर ने एक साथ जोड़ दिया, उन्हें कोई व्यक्ति अलग न करे। उसे अलग करना ईश्वर के आज्ञा की अवहेलना करना है। संत मेथ्यु ने ईसा के शब्दों का उल्लेख करते हुए बताया है कि जो व्यक्ति अपनी पत्नी को व्यभिचारिणी होने के किसी दूसरे मर्द के यहाँ छोड़ दे और स्वयं दूसरा विवाह कर ले वह भी व्यभिचारी है तथा वह व्यक्ति जो किसी छोड़ी हुई स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित करता है वह भी व्यभिचार ही करता है। उक्त बातों से यह स्पष्ट है कि इसाइयों में धार्मिक तौर पर विवाह-विच्छेद को गलत माना गया है।


बहरहाल, भारतीय इसाइयों के लिए समय-समय पर कुछ अधिनियम पारित किए गए तथा उनमें संशोधन भी किए गए। इन अधिनियमों में भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 और भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 प्रमुख हैं।


● भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 यह अधिनियम भारतीय इसाइयों पर लागू होता है तथा इसके लिए यह आवश्यक है कि एक पक्ष अनिवार्य रूप से ईसाई धर्म से संबंधित हो।

इस अधिनियम में कुल 14 भाग, 62 धाराएं और 14 अनुसूचियाँ हैं तथा इसमें विवाह-विच्छेद, न्यायिक पृथक्करण, सुरक्षा, वैवाहिक अधिकारों को पुनः लागू करना आदि शामिल है। विवाह विच्छेद के तौर पर यह अधिनियम उन कारणों से संबंधित है, जिनमें पति अथवा पत्नी विवाह-विच्छेद के लिए स्वयं प्रार्थना-पत्र देते हैं। पति यह प्रार्थना पत्र तब देता है जब पत्नी व्यभिचारिणी होती है तथा पत्नी को प्रार्थना पत्र देने के अन्य अधिकार भी प्रदान किए गए हैं, जैसे- पति व्यभिचारी हो, पति ने ईसाई धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म को अपना लिया हो, पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो अथवा बहु-विवाह का दोषी हो, पति बलात्कारी हो, पति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता हो, पति व्यभिचार के साथ-साथ दो वर्ष से अधिक स्त्री परित्याग का दोषी हो। यह प्रार्थना पत्र जिला न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय में दिया जाता है।


अधिनियम के अनुसार कोई भी पति अथवा पत्नी अपने विवाह को अवैध घोषित कराने के लिए प्रार्थना पत्र दे सकता है। इसके लिए निम्न आधार प्रमुख हो सकते हैं-


i. प्रतिवादी विवाह अथवा मुकदमे के समय नपुंसक हो ।


ii. दोनों ( पति-पत्नी) में से कोई भी एक पक्ष विवाह के समय मूर्ख / पागल हो


iii. पति-पत्नी दोनों ही आपस में निषेधात्मक रक्त विवाह संबंधी हों।


उक्त प्रस्तुत बिंदुओं के अलावा यदि विवाह के समय किसी भी पक्ष का पूर्वा पति/पत्नी जीवित हो और वह वैध विवाह संबंधी हों, तो भी विवाह अवैध घोषित करने के लिए प्रार्थना पत्र दिया जा सकता है। विवाह-विच्छेद के मुकदमे के दौरान पति-पत्नी में न्यायिक पृथक्करण रखा जाता है।


● भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872


यह भारतीय ईसाइयों के विवाह से संबंधित पहला अधिनियम है तथा इसमें अनेक संशोधन भी हुए हैं।

इसमें कुल 88 धाराएं तथा 5 अनुसूचियाँ शामिल हैं। ईसाइयों का विवाह पादरी तथा वे लोग करवा सकते हैं, जिन्हें सरकार द्वारा लाइसेंस प्रदान किया गया हो। केंद्र/राज्य सरकार द्वारा एक अथवा एक से अधिक ईसाई व्यक्ति को विवाह का रजिस्ट्रार नियुक्त किया जा सकता है। इन नियुक्त व्यक्तियों के अलावा जिले का मजिस्ट्रेट भी यह कार्य कर सकता है। विवाह का समय प्रातः काल 6 से 7 बजे तक का रखा जाता है और प्रायः विवाह का स्थान चर्च ही होता है। 5 मिल के आस-पास में चर्च न होने की दशा में किसी अन्य स्थान को विवाह हेतु चयनित किया जा सकता है।


विवाह कराने वाले पक्षों में से कोई एक पक्ष इसकी सूचना चर्च के पादरी को देता है और वह पादरी ही इस सूचना को संपूर्ण समाज तक पहुंचाने का काम करता है। यदि विवाह का स्थान चर्च के जगह पर कोई और है अथवा कोई पक्ष नाबालिग है तो दोनों ही दशाओं में इसकी सूचना मैरिज रजिस्ट्रार को दी जाती है। प्रत्येक विवाह का पंजीकरण होता है तथा मैरिज रजिस्ट्रार द्वारा कराए जाने वाले विवाह में दोनों पक्षों को यह सपथ लेनी होती है कि यह विवाह न कराए जाने की कोई वजह नहीं है। इसके पश्चात उन्हें एक प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है तथा उनकी शादी संपन्न हो जाती है।