वर्ण व्यवस्था के स्थायित्व के कारण - Due to the stability of the caste system
वर्ण व्यवस्था के स्थायित्व के कारण - Due to the stability of the caste system
वर्ण व्यवस्था की स्थिरता का एक कारण यह था कि इसके अंतर्गत समाज के सर्वोच्च वर्ण ने केवल सामाजिक व धार्मिक अधिकारों पर ही एकाधिकार किया. राजनैतिक वह आर्थिक अधिकारों पर नहीं। यद्यपि यह सच है कि हमारा समाज धर्म प्रधान रहा है इसलिए सामाजिक व धार्मिक अधिकारों का ही महत्वपूर्ण था लेकिन राजनीतिक व्यक्ति और धार्मिक अधिकार कर्मचारियों तथा पक्षियों के पास रहने से आरंभ में यह व्यवस्था इन्हें अपने लिए उपयोगी प्रतीत हुई जिसके कारण उन्होंने इस व्यवस्था का विरोध नहीं किया। सुद्रों को तीनों वर्णों के सेवा का आदेश मिला। ऐसा नहीं था कि शूद्रों ने कभी इसका विरोध नहीं किया रहा होगा लेकिन उनके पास शिक्षा, धर्म, प्रशासन और संपत्ति के अधिकार न होने से उन्हें विरोध का कोई मूल्य नहीं था। इस प्रकार यह विभाजन लंबे समय तक अस्थाई बना रहा।
(2) इस व्यवस्था की स्थिरता का दूसरा प्रमुख कारण ईसा से 600 वर्ष पूर्व जैन तथा बौद्ध धर्म का विकास होना था।
यह धर्म स्वयं वर्ण व्यवस्था के विरोध से उत्पन्न हुए थे लेकिन इन्हीं के कारण वर्ण व्यवस्था की इस पीड़िता को और अधिक प्रोत्साहन किया इसका कारण यह था कि इस समय तक वर्ण व्यवस्था को पूर्व तथा एक धार्मिक व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जा चुका था। इस प्रकार व्यक्तियों को यह विश्वास दिलाया गया कि वर्ण व्यवस्था के किसी भी विरोध से हिंदू धर्म का पतन हो जाएगा।
(3) वर्ण व्यवस्था की स्थिरता का एक अन्य कारण उच्च वर्णों के हाथों में ही धर्म तथा शासन के अधिकार का होना था। एक धर्म प्रधान समाज में राजा सदैव धर्मवीर होता था। इस स्थिति के फलस्वरुप राज्य की वास्तविक शक्ति ब्राह्मणों के हाथों में सुरक्षित रहें क्योंकि ब्राह्मण पुरोहित ही शासक वर्ग के सलाहकार रहे और उन्हीं ने व्यवहार के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसके अतिरिक्त धर्म के राजा के अलौकिक अधिकारों की व्याख्या होने पर क्षत्रियों भी इस व्यवस्था को अपने हित में देखते रहे। इससे स्पष्ट है कि धर्म व राजनीति के बीच एक निंदनीय समझौता होने से भी वर्ण व्यवस्था की अन्यायपूर्ण नीति इतने लंबे समय तक प्रभावपूर्ण बनी रही।
(4) कर्मवाद, भाग्यवाद, पुनर्जन्म और मोक्ष के विश्वास ने इस व्यवस्था को सबसे अधिक स्थायित्व प्रदान किया। व्यक्ति का यह विश्वास था कि पूर्व जन्म के बुरे कार्यों के कारण उन्हें निम्न वर्ग की सदस्यता मिलती है तब वह इस व्यवस्था का विरोध करके यह अपने आगामी जीवन को क्यों बिगाड़ता। सामाजिक चेतना का अभाव वह व्यक्ति की भाग्यवादी प्रवृत्ति ने उसे निष्क्रिय बना दिया। मोक्ष भी धारणा व धार्मिकता के कारण वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध कोई प्रश्न नहीं उठा।
इस प्रकार होता है कि वर्ण व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में किसी अलौकिक शक्ति का नहीं बल्कि सामाजिक धार्मिक की संयुक्त प्रभाव के कारण यह व्यवस्था स्थापित रही। सामाजिक उपयोगिता के आधार पर नहीं बल्कि असमर्थता चेतनाशून्य सामाजिक संगठन के आधार पर किया जाना चाहिए।
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