दुर्खीम के नियमहीनता संबंधी विचार या सिद्धांत - Durkheim's thought or theory of lawlessness

दुर्खीम के नियमहीनता संबंधी विचार या सिद्धांत - Durkheim's thought or theory of lawlessness


( एनामी) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम दुर्खीम ने अपनी पुस्तक में "The Division of Labour in Society" किया। यह पुस्तक सन् 1893 में प्रकासित हुई थी। इस प्रत्यय का प्रयोग दुर्खीम ने उस स्थल पर किया है जहाँ पर उन्होंने श्रम विभाजन के सामान्य और व्याधिकीय परिणामों का विश्लेषण किया है। श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण के कारण सामाजिक एकता की समस्या उत्पन्न हो जाती है और सदस्य के बीच संबंधों का उचित नियमन एवं नियंत्रण कठिन हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप समाज के सदस्य सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने लगते हैं और नियमहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। दुर्खीम ने अपने दूसरे ग्रंथ (Le Suicide) में भी इस प्रत्यय पर प्रकाश डाला है। उसने आत्महत्या के प्रकारों में एक प्रकार (anomique suicide) भी बताया है। इस प्रकार की आत्महत्या व्यक्ति नियमहीनता के परिणामस्वरूप करता है।


दुर्खीम ने नियमहीनता का कारण स्वयं समाज या सामाजिक संरचना को माना है। उसके अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह इस रूप में समाज से संबंधित एवं आश्रित है। हर मनुष्य की कुद आवश्यकताएँ होती है

और समाज का उत्तरदायित्व है कि सामिजिक संरचना के द्वारा समाज के अधिकांश व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो। जब व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति सामाजिक नियमों से स्वीकृत साधनों द्वारा पूरी नहीं होती है, तो उसमें निराशा, असन्त ष, प्रतिशध, विद्रोह आदि की भावनाएँ विकसित होती है। ऐसी दशा में उसे सामाजिक आदर्श, मूल्य, नियम आदि थे लगते हैं और उसका उनके प्रति विश्वास डिग जाता है। व्यक्ति ऐसी स्थिति में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ढंग से, जो सामाजिक नियमों के अनुसार नहीं होते, करने लगता है। यह स्थिति नियमहीनता की है। इस स्थिति का उत्तरदायित्व भी सामाजिक संरचना या समाज पर ही है। इसीलिए दुर्खीम का कहना है कि नियमहीनता का कारण स्वयं समाज या सामाजिक संरचना है।


श्रम विभाजन के परिणामस्वरूप भी नियमहीनता हो दर्शाता है।

उनके अनुसार श्रम विभाजन के कारण समाज के सदस्य एक-दूसरे पर अत्यधिक आश्रित हो जाते हैं और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक-दूसरे पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं। इसका इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति तब दुसरों से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति होते नहीं देखता है. तो स्वयं मनमाने ढंग से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगता है। वह सामाजिक नियमों का भी उल्लंघन करने लगता है। इससे नियमहीनता बढ़ती है। दुर्खीम का कहना है कि कई बाद ऐसा भी होता है कि समाज के कुछ लक्ष्य या उद्देश्य या आदर्श ऐसे होते हैं जो अप्राप्य होते हैं। इन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके कारण भी व्यक्ति को निराशा ही निराशा मिलती है और वह मनमाने ढंग से व्यवहार करने लगता है। दुर्खीम ने लिखा है- “ऐसी लक्ष्यों, जो परिभाषा से ही अप्राप्य हैं, को प्राप्त करने का प्रयास करना अपने को निरंतर दुख की अवस्था का दंड देना है।" इस प्रकार के लक्ष्य के पीछे भागना दुःख एवं निराशा के अंधकार में फँसते जाना है और नियमहीनता की और बढ़ना है। जब नियमहीनता विकसित हो जाती है, तो उन्हें केवल सामाजिक नियमों के पुनर्स्थापन के द्वारा ही रोका जा सकता है।


दुर्खीम का विचार है कि नियमहीनता की स्थिति छूत की बीमारी के समान समाज में फैलती है। एक बाद यदि नियमहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो उसे रोकना कठिन हो जाता है और वह पूरे समाज को ग्रस्त कर लेती है। नियमहीनता की यह स्थिति उस समय तक बनी रहती है जब तक कि नियमों की व्यवस्था अपने को पुनः स्थापित नहीं कर लोती ।


दुर्खीम ने नियमहीनता के कारणों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि इसके प्रमुख कारण है - सामूहिक शक्ति का दुर्बल हो जाना, अचानक महत्वपूर्ण तकनीकि परिवर्तन, भयंकर आर्थिक या सामाजिक संकट, प्राकृतिक विपदा आदि, जिनके कारण एकाएक नवीन परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है। दुखम का मत है कि यह कहना कि समाज का व्यक्ति पर स्वस्थ प्रभाव ही पड़ता है, गलत है। उसके अनुसार व्यक्ति पर समाज या सामाजिक संरचना का अस्वस्था प्रभाव या दबाव भी पड़ता है। व्यक्ति के द्वारा अस्वाभाविक व्यवहार या सामाजिक नियमों के विरुद्ध व्यवहार इस अस्वस्थ दबाव का परिणाम होता है। व्यक्ति समाज का सदस्य है और वह समाज के नियमों का पालन करना चाहता है. पर कई बार समाज ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है कि व्यक्ति समाज के साथ सामंजस्य नहीं कर पाता है और समाज से उसके पैर उखड़ जाते हैं। व्यक्ति अकेलापन, निराशा एवं दुख का अनुभव करता है। कई बार समाज व्यक्ति के व्यक्तित्व को अपने में इतना लोता है कि उसका पृथक अस्तित्व ही नहीं रह जाता। इन अवस्थाओं में व्यक्ति की समाज के प्रति आस्था एवं विश्वास समाप्त हो जाता है और वह मनमाने ढंग से व्यवहार करने लगता है। यह व्यक्ति को नियमहीनता की और धकेलती है।