अधिसंरचना अधोसंरचना का आर्थिक निर्धारणवाद - economic determinism of infrastructure
अधिसंरचना अधोसंरचना का आर्थिक निर्धारणवाद - economic determinism of infrastructure
राजनैतिक अर्थव्यवस्था की समालोचना (Critique of political Economy) मार्क्स की वह प्रमुख रचना है जिसमें उन्होंने मानवीय संबंधों तथा राजनैतिक संरचना पर आर्थिक व्यवस्था की प्राथमिकता को स्वीकार किया। यह सच है कि राजनैतिक अर्थव्यवस्था से संबंधित विचार भी मार्क्स को एक आर्थिक निर्णायकवादी के रूप में स्पष्ट करते हैं लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मार्क्स का आर्थिक निर्णायकवाद निरपेक्ष न होकर बहुत कुछ सापेक्षिक है। इस पुस्तक में मार्क्स का आर्थिक ने जहाँ एक ओर समाज की संरचना तथा वैचारिकी पर आर्थिक व्यवस्था के प्रभावों को स्पष्ट किया है वहीं दूसरी और उनका उद्देश्य शक्ति तथा राज्य के स्परूप का निर्धारण करने में आर्थिक कारकों के प्रभाव को स्पष्ट करना रहा है। इस पुस्तक में मार्क्स ने बतलाया कि उत्पादन और वितरण की आर्थिक प्रणाली अथवा उत्पादन के संबंध ही किसी समाज की मूल संरचना (Infra Structure) का निर्माण करते हैं। समाज की इस मूल संरचना के अनुसार ही अन्य सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप का निर्धारण होता है। इन सामाजिक संस्थाओं में राज्य तथा वैज्ञानिक संस्थाओं का प्रमुख स्थान है। मार्क्स के इस विचार और अधिक स्पष्ट करते हुए उनके मित्र तथा सह-लेखक फ्रोडरिक ऐंजल्स ने लिखा है
कि “आर्थिक विकास की दशा में राज्य में अनेक संस्थाओं का रूप बदलने लगता है बल्कि समाज में धर्म और कला से संबंधित विचारों में भी परिवर्तन होने लगता है।" इस प्रकार मार्क्स ने सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं पर आर्थिक कारकों के जिस प्रभाव को स्पष्ट किया उन्हें निम्नांकित चार भागों में विभाजित करके स्पष्ट किया जा सकता है।
(1) आर्थिक व्यवस्था एवं समाज (Economic System and Society )
मार्क्स ने यह स्पष्ट किया भी समाज में विद्यमान आर्थिक व्यवस्था ही उस समाज की वास्तविक नींव होती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि आर्थिक व्यवस्था समाज की मूल संरचना (Infra Structure) होती है। उस समाज में पाएँ जाने वाले मूल्य, रीति-रिवाज, संस्कृति, कानून, नियम तथा सामाजिक मानदंड आदि वे अधि-संरचनाएँ (Super-Structures) हैं जिनका विकास मूल संरचना की प्रकृति के अनुसार ही होता है।
मार्क्स का कथन है कि समाज की मूल संरचना का निर्माण जिन आर्थिक दशाओं के आधार पर होता है उनमें उत्पादन के साधनों तथा उत्पादन के तरीकों का स्थान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि उत्पादन के साधनों के स्वामित्व तथा श्रम-संबंधों के आधार पर ही समाज की उस अधो-संरचना का निर्माण होता है जिसमें सामाजिक मूल्य, रीति रिवाज, धर्म, कानून, शिक्षा तथा राजनीति आदि का समावेश होता है। इसे स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने बताया कि जब समाज में आदिम साम्यवाद की दशा विद्यमान थी तब वह मूलतः एक अनुत्पादक समाज था। उस समय व्यक्ति पशुओं की तरह प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं का उपभोग किया करते थे। इस स्तर में हथियार मनुष्य की पहली संपत्ति बने जिसका उपयोग शक्तिशाली लोगों ने दुर्बल लोगों का शोषण करने के लिए किया। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि उस समय के हथियार तथा औजार ही उत्पादन के साधन थे जिन्होंने समाज में एक विशेष प्रकार ही मूलसंरचना का निर्माण किया। इनके आधार पर तत्कालीन समाज में जिन सामाजिक मूल्यों के स्थापना हुई वे वर्तमान समाज के मूल्यों से बिलकुल भिन्न थी।
सामंतवादी अर्थव्यवस्था तथा पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों तथा उत्पादन के तरीकों में एक आधार भूत अंतर देखने को मिलता है।
यही कारण हुआ उनका रूप भी एक-दूसरे से काफी भिन्न है। सामंतवादी आर्थिक व्यवस्था में बनने वाली समाज की अधोसंरचना में परंपरागत सत्ता अर्थ दास प्रथा अथवा बंधुआ मजदूरों का समावेश था। दूसरी ओर पूँजीवादी अर्द्धव्यवस्था ने एक ऐसी अधो संरचना का निर्माण किया जिसमें वैयक्तिक स्वतंत्रता तथा संपत्ति के संचय को विशेष महत्व दिया जाने लगा। इस आधार पर बनने वाली मूल संरचना तथा उसकी अधोसंरचना के बीच द्वंद्व होता है। इसी द्वंद्व के परिणामस्वरूप ऐसी दशा उत्पन्न होती है जिसे हम क्रांति कहते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रत्येक समाज दो मूख्य भागों में विभक्त होता है जिनमें से एक को हम इसकी मूल संरचना और दूसरे को इसकी अधोसंरचना कहते हैं। मूल संरचना का निर्माण आर्थिक अन्य संबंधों का समावेश होता है। समाज की इस मूल संरचना और अधोसंरचना के बीच जो अंतर्विरोध बने रहते हैं उसी के फलस्वरूप क्रांति का जन्म होता है।
(2) अर्थिक व्यवस्था एवां विचार (Economic System and Ideas )
राजनैतिक अर्थव्यवस्था की समालोचना में मार्क्स ने विचारों के निर्माण की प्रक्रिया को भी आर्थिक व्यवस्था के आधार पर ही समझने का प्रयत्न किया है। उनका कथन है कि दर्शन, राजनीति, मूल्यों एवं धर्म से संबंधित वैचारिकी का रूप आर्थिक व्यवस्था के आधार पर ही निर्धारित होता हैं।
मार्क्स ने कॉम्टे तथा हीगल की आलोचना करते हुए बतलाया कि सामाजिक संरचना में होने वाला विकास विचारों के फलस्वरूप नहीं होता बल्कि परिवर्तनशील भौतिक दशाएँ ही नए विचारों को जन्म देकर विकास के रूप में होने वाले परिवर्तनों की उत्पन्न करती है। इस दृष्टिकोण से विचारों का संबंध समाज की अधो-संरचना से होता है जबकि समाज की मूल संरचना का निर्माण आर्थिक दशाओं के द्वारा ही होता है।
मार्क्स ने यह स्पष्ट किया कि एक विशेष अवधि में समाज की वैचारिकी अथवा आदर्श उस काल के प्रभुतासंपन्न वर्ग के विचारों का ही प्रतिबिंब होते हैं। अपने कथन को स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने के लिखा है कि - प्रत्येक युग में लोगों पर नियंत्रण रखने वाले विचार अथवा समाज को संचालित करने वाले नियम उसी वर्ग से संबंधित होते हैं जो एक ही समय में न केवल भौतिक शक्तियों का स्वामी होता है। बल्कि साथ ही उसका बौद्धिक शक्तियों पर भी नियंत्रण होता है।" दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि पूँजीपति वर्ग जिसके पास आर्थिक साधनों का स्वामित्व होता है, वह पूँजी की शक्ति से बौद्धिक शक्ति को भीर खरीद लेता है। समाज में जो वर्ग आर्थिक रूप से प्रभुतासंपन्न होता है वह एक ऐसी वैचारिकी को विकसित करने में सफल हो जाता है जो उसी के हितों के अनुकूल हो। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भौतिक शक्ति ही वह बाधार है जो विचारों को नियंत्रित करती है।
स्पष्ट है कि मार्क्स ने आर्थिक कारकों को ही समाज में पाई जाने वाली वैचारिकी के निर्णायक कारक के रूप में स्वीकार किया है। इस संदर्भ में अपने अनुयायियों को सचेत करते हुए मार्क्स ने लिखा कि - "यदि हम ऐसा मानने लगेंगे कि शासक वर्ग का एक पृथक अस्तित्व है तथा वह समाज की वैचारिकी को अपनी सत्ता से पृथक रखता है, तो हम ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को उचित ढंग से नहीं समझ सकेंगे।" इस प्रकार मार्क्स ने अनुसार आर्थिक कारकों तथा वैचारिकी के बीचएक घनिष्ठ संबंध है तथा प्रत्येक आर्थिक सत्ता अपने हितों के अनुसार ही वैचारिकी को एक विशेष रूप देने का प्रयत्न करती हैं।
(3) आर्थिक कारक एवं शक्ति (Economic Factors and Power)
शक्ति राजनैतिक व्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। बॉटोमोर ने भी शक्ति को (राजनीति के केंद्र बिंदु) के रूप में स्पष्ट किया है। पारसन्स शक्ति को एक ऐसे तत्त्व के रूप में स्वीकार करते हैं जो शासक और शासितों के बीच संतुलन बनाए रखता है। आपके अनुसार शक्ति ही वह आधार है जिसके कारण शासक और शासित दोनों समाज के हित को ध्यान में रखते हुए कार्य करते हैं। इन विचारों के ठीक विपरित, कार्ल मार्क्स ने यह स्पष्ट किया कि शक्ति एक ऐसा तत्त्व है जिसका उपयोग आर्थिक रूप में प्रभुतासंपन्न वर्ग अपने हितों के लिए करता है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण से समाज में शक्ति का स्रोत समाज की आर्थिक मूल संरचना में निहित होता है। इसे स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने बताया कि स्तरों में विभाजित प्रत्येक समाज में उत्पादन की शक्तियाँ कुछ लोगों ने हाथ में ही केंद्रित होती है। यही लाग सत्ता वर्ग के प्रतिनिधि भी होते हैं। उत्पादन की शक्तियों कारण समाज में जिस उच्च वर्ग का निर्माण होता है। उसकी प्रभुता अथवा शक्ति का कारण उत्पादन की शक्तियों पर उनका अधिकार होना ही है। इस दृष्टिकोण से शक्ति की विवेचना केवल आर्थिक आधार पर ही की जा सकती है। सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जिस वग्र के पास पूँजी होती है, वही वर्ग समाज में शक्तिशाली होता है। इस आधार पर मार्क्स ने लिखा है कि- “यदि सत्ता को पुनः जनसाधारण में स्थानांतरित करना है तो जनसामान्य को सामूहिक रूप से उत्पादन की शक्तियाँ अपने हाथों में लेनी होंगी।
एक पूँजीवादी समाज में सत्ता वर्ग के द्वारा अपनी शक्ति का उपयोग समाज के अन्य वर्गों का शोषण करने के लिए ही किया जाता है। शोषण की इसी प्रक्रिया में बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा वर्ग से अधिक उत्पादन करवाता है और उसे कम से कम मजदूरी देता है। मार्क्स का कथन है कि शक्तिशाली वर्ग द्वारा किए जाने वाले शोषण को बल प्रयोग का ही एक विशेष स्वरूप कहा जा सकता है। समाज का सर्वहारा वर्ग बुर्जुआ वर्ग के शोषण को अपने हितों के विरूद्ध होने के बाद भी यदि स्वीकार कर लेता है तो इस दशा में यह स्वीकार करना आवश्यक है कि समाज की अधो-संरचना बल-प्रयोग पर आधारित है।
इस दशा की इस रूप में भी समझा जा सकता है कि यदि सामाजिक संरचना द्वारा छिपे तौर पर बल-प्रयोग को मान्यता न दी जा रही हो तो सर्वहारा वर्ग उस शोषण को कभी स्वीकार नहीं करेगो जो बुर्जुआ अथवा प्रभुतासंपन्न वर्ग द्वारा किया जाता है। मार्क्स ने लिखा है कि यदि बुर्जुआ वर्ग की शक्ति के समाज उसकी वैधानिक शक्ति के रूप में स्वीकार कर लेता है तो इस दशा को केवल एक झूठी वर्ग-चेतना ही कहा जा सकता है।
मार्क्स ने स्पष्ट किया कि समाज की मूल संरचना अथवा अर्थिक संरचना में शोषण और दमन के रूप में प्रभुत्त के जो संबंध विकसित होते हैं, वे धीरे-धीरे समाज की अधोसंरचना (Super-structure ) में स्पष्ट रूप से दिखलाई देने लगते हैं। उदाहरण के लिए, एक पूँजीवादी समाज में नियोजक (Employer) तथा कर्मचारी ( Employee) के बीच पाए जाने वाले असमानतापूर्ण संबंधों का प्रतिबिंब वहाँ की वैधानिक व्यवस्था में दिखलाई देता है। इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक पूँजीवादी समाज में विधायिका तथा कानूनों के द्वारा संपत्ति के स्वामियों के हितों काही संरक्षण किया जाता है। मार्क्स के इस कथन से स्पष्ट होता है कि पूँजीवादी समान की आर्थिक व्यवस्था में पाए जाने वाले असमानताकारी संबंधों के फलस्परूप ही एक ऐसी असमानता को प्रोत्साहन मिलता है जिसे वैधानिक मान्यता मिली होती है।
इस प्रकार समाज के उच्च वर्ग को जब वैधानिक रूप से जनसामान्य का शोषण करने की अनुमति मिल जाती है तब उसकी शक्ति का विस्तार होने लगता है।
उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि मार्क्स आर्थिक शक्तियों, अर्थात् उत्पादन की शक्तियाँ को ही सामाजिक शक्ति का प्रमुख आधार पर मानते हैं। साथ ही मार्क्स यह भी स्वीकार करते हैं कि आर्थिक आधार पर प्राप्त होने वाली शक्ति ही समाज की अन्य संस्थाओं को भी प्रभावित करती है।
(4) आर्थिक कारक एवं राज्य (Econimic Factors and State)
हम जानते हैं कि मार्क्स ने इंग्लैंड की तत्कालीन अर्थ-व्यवस्था के आधार पर ही अपने विचार प्रस्तुत किए। अपने आर्थिक सिद्धांतों की विवेचना के लिए मार्क्स ने उस समय के कुछ विचारों को मान्यता प्रदान की तो अनेक दूसरे विचारों का दृढ़तापूर्वक खंडन भी किया। मार्क्स के समकालीन विचारकों में प्रोधों (Prodhon) तथा बकुनिन (Bakunin) प्रमुख अराजकतावादी विचारक थे।
इन विद्वानों ने तत्कालीन सामाजिक चिंतन को प्रभावि करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। यह अराजकतावादी विचारक (Anarchsists) जहाँ राज्य को एक आवश्यक बुराई के रूप में देखते थे, वही मार्क्स ने आर्थिक-राजनैतिक विचारों के द्वारा राज्य की अवधारणा को एक भिन्न रूप से स्पष्ट किया। इस संबंध में रेमंड ऐरों (Ramond Aron) ने लिखा है कि एक सद्भावनापूर्ण समाज में मार्क्स द्वारा प्रस्तुत राजनीति की अवधारणा तथा राज्य के लुप्त हो जाने से संबंधित विचारों ने मुझे उनके अन्य सामाजिक विचारों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावित किया। रेमंड ऐरों के इस कथन से रानैतिक अर्थ-व्यवस्था से संबंधित मार्क्स के विचारों का महत्व स्पष्ट हो जाता है। इस दृष्टिकोण से आवश्यक है कि राज्य के बारे में मार्क्स के विचारों के प्रमुख अंशो को संक्षेप में समझ लिया जाए।
आरंभ में ही यह अमझ लेना आवश्यक है कि मार्क्स राज्य की अनिवार्यता को स्वीकार करते हैं। मार्क्स ने बतलाया कि आधुनिक युग में कुछ प्रशासनिक कार्य ऐसे हैं जो प्रत्येक समाज के लिए अनिवार्य होते हैं। कोई भी व्यक्ति इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता कि औद्योगिक समाजों में प्रशासनिक संरचना के बिना कोई काम नहीं चल सकता।
दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि औद्योगिक समाजों में भी एक विशेष प्रकार के केंद्रीकृत प्रशानत का होना अनिवार्य होता है। केंद्रीकृत प्रशासनिक संरचना समाज के आर्थिक विकास की योजनाओं के लिए भी आवश्यक है। मार्क्स का विचार है कि राज्य समाज के प्रशासनिक तथा दिशा-निर्देश देने वाले कार्यों का सम्मिलित रूप है अतः किसी भी समाज में राज्य को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके बाद भी मार्क्स राज्य के वर्तमान रूप को एक बुराई के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि सद्भावनापूर्ण समाजों (Nonantagonist Societees) में मार्क्स ने राज्य का लोप हो जाने से संबंधित अपने जो विचार प्रस्तुत किए है, उनका अर्थ प्रतीकात्मक है। वास्तव में मार्क्स यह नहीं मानते कि क्रांति के बाद बनने वाले साम्यवादी समाज में राज्य पूर्णतया समाप्त हो जाएगा बल्कि मार्क्स के अनुसार साम्यवादी समाज में राज्य तो रहेगा लेकिन वर्गों पर आधारित उसका चरित्र नष्ट हो जाएगा। यही राज्य के लुप्त हो जाने का प्रतीकात्मक अर्थ है।
मार्क्स के अनुसार राजनैतिक व्यवस्था तथा आर्थिक व्यवस्था के बीच आदान प्रदान का एक गहरा संबंध है। साम्यवादी समाजों में राजनैतिक व्यवस्था का स्वरूप आर्थिक व्यवस्था की ही तरह स्वयत्ततापूर्ण होना चाहिए। मार्क्स का विचार है कि जिस तरह उत्पादन और वितरण का एक पृथक संगठन होता है तथा जिस प्रकार उत्पादन की समस्याओं का निदान आर्थिक व्यवस्था में ही खोजा जाता है उसी तरह राजनैतिक व्यवस्था को भी एक ऐसे तंत्र के रूप में होना चाहिए जिसके द्वारा जनसाधारण की समस्याओं का समाधान किया जा सके।
इसका तात्पर्य है कि राजनीति को सत्ता से पृथक करना आवश्यक है। राज्य की सत्ता का विरोध करते हुए मार्क्स ने लिखा है कि- "राज्य के लुप्त होने का अर्थ यह है कि राज्य का अस्तित्व केवल उत्पादन और वितरण के स्रोतों को खोजने तथा इनसे संबंधित समस्याओं का विदान करने तक ही सीमित होगा ।" इस प्रकार पूँजीवादी समाजों में राज्य की शक्ति के चुनौति देते हुए मार्क्स ने उन प्रयत्नों पर बल दिया जिनके द्वारा क्रांति के माध्यम से राज्य की परंपरागत सत्ता को नष्ट किया जा सके।
मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विभिन्न विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि बौद्धिक पृष्ठभुमि में मार्क्स सबसे अधिक प्रभावपूर्ण लेकिन सबसे अधिक विवादपूर्ण विचारक रहे है। उनके विचारों की जो भी आलोचनाएँ की गई है। वे मल्यू रूप से इसी बिंदु पर आधारित है कि मार्क्स ने आर्थिक कारकों तथा वे • श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्व को ही अपने चिंतन का आधार माना। इसके बाद भी यह सच है कि मार्क्स ने अपने विचारों के द्वारा दुनिया की जनसंख्या के जिनते बड़े भाग को प्रभावित किया, उतना प्रभाव आज • तक कोई दूसरा विद्वान जन मानस पर नहीं डाल सका। सच तो यह है कि मार्क्स केवल एक विचारक ही नहीं थे, बल्कि वह संसार के कामगरों के एक महान नेता भी थे। इस दशा में उनके द्वारा एक ऐसी विचारधारा को विकसित करना बहुत स्वाभाविक था जो कामगरों में नई आशा का संचार करके उन्हें संगठित होने की प्रेरणा दे पाती। अपने इस विशन को पूरा करने के लिए मार्क्स नें संवेगात्मक अपील का भी सहारा लिया लेकिन आज उन्हीं के चिंतन के प्रभाव से श्रमिक वर्ग के सामाजिक-आर्थिक महत्त्व को हर कहीं स्वीकार किया जाने लगा है।
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