सामाजिक परिवर्तन के मुख्य उपकरण के रूप में शिक्षा - Education as the main tool of social change

सामाजिक परिवर्तन के मुख्य उपकरण के रूप में शिक्षा - Education as the main tool of social change


सामाजिक परिवर्तन के मुख्य उपकरण के रूप में शिक्षा को निम्नलिखित बिन्दुओं के अनुसार समझा जा सकता है -


√ शिक्षा का समाज में स्थान - वैकटरायप्पा ने शिक्षा व समाज के सम्बंध को स्पष्ट करते हुये लिखा है- शिक्षा समाज के बालकों का समाजीकरण करके उसकी सेवा करती है। इसका उद्देश्य - युवकों को सामाजिक मूल्यों विश्वासों और समाज के प्रतिमानो को आत्मासात करने के लिये तैयार करना और उनको समाज की क्रियाओं में भाग लेने के योग्य बनाना है। शिक्षा व्यक्ति व समाज के लिये यह कार्य करती है।


√ शिक्षा - व्यक्ति व समाज की प्रक्रिया का आधार शिक्षा को चाहे व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया कहें या सामाजिक प्रक्रिया इन दोनों में वह व्यक्ति व समाज से सम्बंध स्थापित करती है।

शिक्षा समाज को गतिशील बनाती है, और विकास का आधार प्रदान करती है।


√ समाज के व्यक्तियों का व्यक्तित्व विकास - शिक्षा द्वारा व्यक्तित्व का विकास होता है। व्यक्तित्व के विकास से तात्पर्य शारीरिक, चारित्रिक, नैतिक और बौद्धिक गुणों के विकास के साथ सामाजिक गुणों का विकास होना। विकसित व्यक्तित्व का बाहुल्य समाज की प्रगति का आधार बनता है। व्यक्ति को निर्जीव मानकर समाज उसका उपयोग नहीं कर सकता।


√ संस्कृति व सभ्यता के हस्तांतरण की प्रक्रिया - शिक्षा समाज की संस्कृति एवं सभ्यता के हस्तांतरण का आधार बनती है। शिक्षा के इस कार्य के विषय में ओटवे महोदय ने लिखा है कि “शिक्षा का कार्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहार के प्रतिमानों को अपने तरूण और शक्तिशाली सदस्यों को प्रदान करना है।

पर असल में यह उसके साधारण कार्यों में से एक है।" शिक्षा के इस कार्य पर टायलर ने लिखा है कि संस्कृति वह जटिल समग्रता है, जिसमें ज्ञान विश्वास, कला, नैतिकता, प्रथा तथा अन्य योग्यतायें और आदतें सम्मिलित होती हैं, जिनको मनुष्य समाज के सदस्य के रूप शिक्षा से प्राप्त करता है।" महात्मा गांधी ने शिक्षा के इस कार्य की आवश्यकता एवं प्रशंसा करते हुये लिखा है- "संस्कृति ही मानव जीवन की आधारशिला और मुख्य वस्तु है यह आपके आचरण और व्यक्तिगत व्यवहार की छोटी सी छोटी बातों में व्यक्त होनी चाहिये।”


√ शिक्षा और सामाजिक नियंत्रण - शिक्षा समाज का स्वरूप बदलकर उस पर नियंत्रण भी करती है अभिप्राय यह है कि व्यक्ति का दृष्टिकोण एवं उसके क्रियाकलाप समाज को गतिशील रखते हैं।

शिक्षा व्यक्ति के दृष्टिकोण में परिवर्तन कर उसके क्रियाकलापों में परिवर्तन कर समूह मन का निर्माण करती है और इससे अत्यव्यवस्था दूर कर उपयुक्त सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करती है।


√ शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया के अंग के रूप में - रासे के के अनुसार शिक्षा एक आधारभूत सामाजिक कार्य और सामाजिक प्रक्रिया का अंग है।" ओटवे ने शिक्षा को सामाजिक विज्ञान का रूप देते हुये स्पष्ट किया है "शिक्षा समाज में होने वाली क्रिया है और इसके उद्देश्य एवं विधियां उस समाज के स्वरूप के रूप के अनुरूप होती है, जिनमें इसकी क्रिया होती है।"


√ भावी पीढ़ी के प्रशिक्षण में शिक्षा - समाज को प्रशिक्षित भावी पीढी प्रदान करती है, जो कि समाज का भविष्य होते हैं। ब्राउन लिखते है

कि शिक्षा व्यक्ति व समूह के व्यवहार में परिवर्तन लाती है, यह चैतन्य रूप में एक नियंत्रित प्रक्रिया है. जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में और व्यक्ति द्वारा समूह में परिवर्तन किये जाते हैं। शिक्षा समाज को सभ्य एवं सुसंस्कृत पीढ़ी प्रदान करती है।"


√ शिक्षा समाज की प्रगति का आधार - शिक्षा समाज के लिये वह साधन है, जिसके द्वारा समाज के मनुष्यों के विचारों, आदर्शों, आदतों और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर समाज की प्रगति की जाती है। एलवुड ने स्पष्ट किया है शिक्षा वह साधन है जिसमें समाज सब प्रकार की महत्वपूर्ण सामाजिक प्रगति की आशा कर सकता है।"


√ समाज में परिर्वतन का आधार - समाज का स्वरूप एवं प्रस्थिति में निरन्तर बदलाव की ओर अग्रसर होता है,

और यह आवश्यक भी नहीं है, कि यह व्यक्ति और समाज के लिये हितकर हो इसमें शिक्षा इस बदलाव एवं व्यक्ति व समाज के मध्य सम्बधं स्थापित करते हुये सामंजस्य बैठती है। एलवुड ने स्पष्ट किया है. समाज का सर्वोत्तम परिवर्तन मानव के स्वभाव में परिवर्तन कर किया जा सकता है और ऐसा करने की सर्वोत्तम विधि शिक्षा द्वारा ही सम्भव है।"


√ शिक्षा के द्वारा समाज की स्थिरता - शिक्षा समाज के मानव संसाधन को सुसंस्कृत बनाकर अपने व समाज के लिये उपयोग बनाती है। ओर्शिया ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुये कहा है कि "समाज की शिक्षा व्यवस्था व्यक्तियों का मानसिक, व्यावसायिक, राजनीतिक और कलात्मक विकास करके न केवल समाज के अधोपतन की रक्षा करती है, वरन उसको स्थिरता भी प्रदान करती है।"


√ सामाजिक दोषो के सुधार का आधार - शिक्षा में नैतिकता चारित्रिक एवं दार्शनिक पक्ष की प्रधानता होती है और शिक्षा अपनी व्यवस्था में भावी पीढ़ी को समाज में व्याप्त दोषों को इंगित कर उनमें सुधार हेतु समझ एवं मार्ग प्रदान करती है।


√ समाज की सदस्यता की तैयारी का आधार - शिक्षा व्यक्ति को अपने व समाज के लिये उपयोगी बनाती है. प्रारम्भ में बालक परिवार का सदस्य होता है और उन्हें सामाजिक कर्तव्यों एवं नागरिकता के गुणों को विकसित कर उन्हें समाज के भावी सदस्य के रूप में तैयार करती हैं।