ब्रिटिश शासन के उत्तरार्द्ध में शिक्षा व्यवस्था - Education system in the latter part of British rule

ब्रिटिश शासन के उत्तरार्द्ध में शिक्षा व्यवस्था - Education system in the latter part of British rule


इसे हम बीसवीं शती के प्रारंभ की शिक्षा व्यवस्था भी कह सकते है। हंटर की शिक्षा व्यवस्था से जन साधारण संतुष्ट नहीं था अंग्रेजी माध्यम से कुछ लोग ही पाश्चात्य ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं तथा इसके कारण भारतीय संस्कृति का लोप होता जा रहा है। सन 1899 में लार्ड कर्जन भारत वायसराय बरकर आये। लार्ड कर्जन का मानना था कि शिक्षा में सुधार करके ही प्रशासन को सुधारा जा सकता है। उसका मानना था कि प्राथमिक शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाये एवं उच्च शिक्षा पर अधिक नियंत्रण रखा जायेगा। इसलिए उसने 1901 में शिमला में एक सम्मेलन किया जिसमें किसी भारतीय को हीं बुलाया गया। इसमें 150 प्रस्तावों का पारित किया गया। विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने की तीव्र आलोचना हुई विवश होकर 1902 सर थामस रैले की अध्यक्षता में भारतीय विश्वविद्यालय आयोग का गठन किया गया।

1904 में लार्ड कर्जन ने भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पास कराया नई शताब्दी में भारतीय शिक्षा नीति में अनेक परिवर्तन आये। लार्ड कर्जन ने शिक्षा की गुणात्मकता पर बल दिया। लार्ड कर्जन ने मैकाले की नीति की कठोर आलोचना की। उसने शिक्षा के क्षेत्र में अधिक धन राशि खर्च की प्रचलित शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में उसके द्वारा किये गये व्यापक सुधारों के कारण भारतवासी सदैव उसे याद करेंगे किन्तु पाश्चात्य सभ्यता का उपासक होने एवं भारतीय संस्कृति का विरोधी होने के कारण वह भारतीयों का प्रिय नहीं बन सका। इसकाल की प्रमुख घटनायें निम्नानुसार है।


शिमला सम्मेलन - लार्ड कर्जन ने भारत में शैक्षिक सुधार हेतु 1901 में शिमला में एक - शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया इसमें शिक्षा से सम्बन्धित 150 प्रस्तावों को पारित किया गया। 


भारतीय विश्वविद्यालय आयोग - 1902-सन 1902 में सर थामस रैल की अध्यक्षता में भारतीय विश्वविद्यालय आयोग का गठन किया गया इस आयोग में दो भारतीय सदस्य भी थे। इस आयोग के सुझावों को विश्वविद्यालय शिक्षा प्रणाली को पुनगर्ठन किया गया। 


शिक्षा नीति संबंधी सरकारी प्रस्ताव 1904 – शिमला सम्मेलन पारित प्रस्तावों के आधार पर लार्ड कर्जन ने 1904 को शिक्षा नीति सम्बधी सरकारी प्रस्ताव प्रकाशित किया। इन प्रस्ताव में प्राथमिक शिक्षा के सक्रिय विस्तार पर जोर दिया माध्यमिक शिक्षा को सुदृढ़ करने की बात की गई एवं सरकारी संस्थाओं में केवल धर्म निरपेक्ष शिक्षा दी जाने की बात कही गई।


राष्ट्रीय आन्दोलन व शिक्षा - कांग्रेस के द्वारा संचालित राष्ट्रीय आन्दोलन का शिक्षा के विकास पर काफी प्रभाव पड़ा। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने भारतीय आदर्शों पर आधारित तथा भारतीय भाषाओं में दी जानेवाली ऐसी शिक्षा की माँग की जिस पर भारतीयों का नियंत्रण हो। 


गोखले का प्रस्ताव - गोपाल कृष्ण गोखले ने सन 1910 व 1911 में केन्द्रीय धारा में प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य बनाने के लिए प्रस्ताव रखा जो कि अस्वीकार कर दिया गया।


शिक्षा नीति, सम्बन्धी सरकारी प्रस्ताव (1913)


सन 1913 में जारी सरकारी प्रस्ताव में निरक्षरता दूर करने तथा प्राथमिक शिक्षा पर अधिक धन व्यय करने की नीति को स्वीकार किया गया।


सैलडर आयोग- सन 1917 में सैलडर की अध्यक्षता में कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग का गठन किया गया। जिसमें स्नातक पाठ्यक्रम 3 वर्ष करने सीमेट एवं सिंडी केट के स्थान पर छोटे आकार की प्रतिनिधि सभा गठित करने एवं प्रत्येक प्रान्त में माध्यमिक व इंटरमीडिएट बोर्ड बनाने की सिफारिश नियंत्रण की गई। 


राष्ट्रीय शिक्षा - आन्दोलन राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन में शिक्षा पर भारतीय मातृभूमि प्रेम के लिए शिक्षण तथा पाश्चात्य की नकल न करने की मांग की गई।


हटांग समिति - सन 1929 में गठित हगि समिति ने प्राथमिक शिक्षा को राष्ट्रीय आवश्यकता मानते हुए इसका उत्तरदायित्व शासन पर होने की सिफारिश की। उसने विश्वविद्यालयों में प्रवेश के नियमों को कठोर बनाने की अनुशंसा भी की।


एबड-वुड रिपोर्ट- सन 1937 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में एवड तथा बुड ने सामान्य शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा के विकास के संबंध में अत्यन्त महत्वपूर्ण सिफारशे की।