मिशनरियों के शैक्षिक प्रयास - Educational efforts of missionaries
मिशनरियों के शैक्षिक प्रयास - Educational efforts of missionaries
यूरोपीय व्यापारियों के भारत में व्यापार करने आने के पश्चात वहाँ की ईसाई मिशनरियों ने भी भारत में धर्म प्रचार करना प्रारंभ कर दिया। इसके लिए उन्होंने शिक्षा की सहायता ली। शिक्षा की सहायता से उन्होंने अपने धर्म विचारों एवं सिद्धान्तों को भारतीयों तक पहुँचाया। पाश्चात्य ढंग की शिक्षा प्रदान करने के लिए अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की। इसलिए इसाई मिशनरियों को आधुनिक भारतीय शिक्षा का प्रवर्तक माना जाता है। इस समय भारत में डच डेन फ्रासिसी ब्रिटिश मिशनरियां कार्यरत थी जिन्होंने देश के अलग-अलग भागों में अनेक स्कूलों की स्थापना की। इस काल में घटित कुछ प्रमुख शैक्षिक घटनाएं निम्नानुसार है।
सीरामपुर त्रिमुर्ति - कैरे, वार्ड तथा मार्शमैन तीन लोगों ने सीरामपुर बंगाल में ईसाई धर्म प्रचार तथा हिन्दु एवं मुस्लिम धर्म की आलोचना करने वाली एक पुस्तक का प्रकाशन किया इससे हिन्दु मुस्लमानों ने इसका विरोध किया तब लार्ड मिंटो ने इन पादरियों को बंद कर दिया तथा मिश्नरियों के धर्म प्रचार पर रोक लगा दी।
चार्ल्स ग्राण्ट के शैक्षिक प्रसास- चार्ल्स ग्राण्ट ने सन 1792 में एक पाँच सूत्रीय योजना प्रस्तुत की जिसमें भारत में विद्यालयों की स्थापना अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा, अंग्रेजी साहित्य की शिक्षा, पाश्चात्य ज्ञान व विज्ञान का प्रसार तथा ईसाई धर्म के प्रचार की आवश्यकता पर बल दिया।
सन् 1813 का आज्ञा पत्र - सन् 1813 का आज्ञा पत्र का भारतीय शिक्षा के इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इसने भारतीयों की शिक्षा के प्रति ईस्ट इंडिया कम्पनी के उत्तरदायित्व को निश्चित कर दिया जिसके फलस्वरूप भारतीय शिक्षा को एक नवीन दिशा मिली। इसे भारत में ब्रिटिश शिक्षा पद्धति का शिलालेख भी कहा जाता है।
प्राच्य-पाश्चात्य शिक्षा विवाद- 1813 के आज्ञा पत्र के अनुसार स्वीकृत राशि किन शिक्षा संस्थानों को दी जायेगी, संस्कृत-फारसी के माध्यम की शिक्षा संस्थाओं या अंग्रेजी माध्यम की पाश्चात्य संस्थाओं को इस पर विवाद होने से निर्धारित धन राशि ठीक से खर्च नहीं हो सकी।
मैकाले का विवरण पत्र- सन 1835 में लार्ड मैकाले ने भारत में शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी माध्यम से यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रचार करना घोषित किया,
जिससे पाश्चात्य तथा विज्ञान में रंगे भारतीय तैयार हो सके जो अंग्रेजी शासन में सहायक हो। इसने सम्भ्रान्त वर्ग को शिक्षित करने के लिए कहा।
बुड़ का घोषणा पत्र - सन 1854 में वुड घोषणा पत्र में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था के पुनरीक्षण तथा शैक्षिक पुन निर्माण के लिए नीति को प्रस्तुत किया जिसमें जनसाधारण के लिए शिक्षा व्यवस्था करने छोटी कक्षाओं में प्रान्तीय भाषाओं में शिक्षा देने, अध्यापकों को प्रशिक्षिण प्रारंभ करने तथा विश्वविद्यालय स्थापना की बात कही गई थी।
हंटर आयोगसन - 1882 में गठित हटर आयोग ने देशी शिक्षा को प्रोत्साहन देने. प्राथमिक शिक्षा का विस्तार करने तथा सत्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ शिक्षा का उत्तरदायित्व वैयक्तिक संस्थाओं को सौंपने तथा उदारता पूर्वक सहायता अनुदान देने की अनुशंसा की।
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