शैक्षिक समाजशास्त्र - educational sociology

 शैक्षिक समाजशास्त्र - educational sociology


शिक्षा और समाज के घनिष्ठ संबंधों ने शैक्षिक समाजशास्त्र को जन्म दिया। दुर्खीम के अनुसार के शिक्षा मूलत: अपने स्वरूप, उद्भव एवं प्रकार्य दृष्टि से एक सामाजिक क्रिया है। फलतः शिक्षा का सिद्धांत किसी अन्य विका की अपेक्षा समाजशास्त्र से स्पष्ट रूप से संबंधित होता है। शैक्षिक समाजशास्त्र में समाजशास्त्र के उन सभी सिद्धांतों को उपयोग में लाया जाता है जो शिक्षा के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक दोनों पक्षों को प्रभावित करते है।


शैक्षिक समाजशास्त्र पर व्यवस्थित अध्ययन 1923 ई. में अमेरिका के समाजशास्त्री ई. जार्ज पेनी ने किया।

उन्होंने अपनी पुस्तक प्रिंसिपल्स ऑफ एज्युकेशनल सोसियोलॉजी में लिखा कि यह एक नवीन विज्ञान है जो समाजशास्त्र को शिक्षा से जोड़ता है। उन्होंने शैक्षिक प्रक्रिया की व्याख्या समाजशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर की। उन्होंने बताया कि सामूहिक जीवन पर शिक्षा एवं समाज का प्रभाव पड़ता है। शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है


और वह समाज के उत्थान तथा पुननिर्माण के मध्य कार्य करती है। जॉन डी वी ने अपनी पुस्तक स्कूल एण्ड सोसाइटी और डेमोकेसी एण्ड एज्यूकेशन में शिक्षा को एक सामाजिक प्रक्रिया माना है। जो व्यक्ति के द्वारा जाति की सामाजिक चेतना में भाग ले ने से विकसित होती है। भारत में शैक्षिक समाजशास्त्र का प्रारंभ 1965 में हुआ। भारत में शैक्षिक समाजशास्त्र के प्रवर्तक प्रो. एम. एम. गोरे थे।