नेतृत्व का उद्भव - emergence of leadership
नेतृत्व का उद्भव - emergence of leadership
समूह का नेता अपने विशेष पद के कारण समूह के लक्ष्यों, संरचना, विचार आदि को प्रभावित कर उनमें परिवर्तन लाता है. परंतु समूह की संरचना, विचारधाराओं एवं लक्ष्यों द्वारा यह भी निर्धारित होता है कि समूह में किस तरह से नेतृत्व का उद्भव होता है. समाज मनोवैज्ञानिकों एवं समाज शास्त्रियों ने मिलकर कुछ ऐसे कारको का वर्णन किया है जिनसे समूह में नेतृत्व का उद्भव सीधे प्रभावित होता है. कुछ ऐसे ही कारकों का वर्णन निम्नांकित है
1. समूह की जटिलता- जैसे- जैसे किसी समूह की जटिलता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे समूह में नए-नए नेताओं के बढ़ने की संभावना भी बढ़ती जाती है. दूसरे शब्दों में, जैसे- जैसे समूह का आकार एवं कार्य में वृद्धि होती जाती है, समूह में प्राथमिक नेता तथा द्वितीयक नेता के उत्पन्न होने की संभावना भी बढ़ती जाती हैं. इस तरह से यह स्पष्ट है कि समूह की जटिलता बढ़ने से नेता की एक श्रृंखला का जन्म होता है. इस श्रृंखला के सबसे ऊपरी सतह पर प्राथमिक नेता होते हैं तथा निचली सतह ऊपर द्वितीयक नेतागण होते हैं. अतः यह स्पष्ट है कि बड़ा संगठन या समूह होने से कई तरह के नेताओं का जन्म हो जाता है. प्रसिद्ध समाजशास्त्री व्हाइट 1948 ने रेखां उद्योग में अध्ययन कर उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि की है.
2. समूह संकट- जब किसी समूह को बाहरी तत्वों से अपनी सुरक्षा का खतरा होता है या समूह अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहता है तो ऐसी परिस्थिति में नए नेता का जन्म होता है. इस प्रकार की संकट कालीन परिस्थिति में यदि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत विशेषता या अन्य कारणों से उस खतरा को दूर करने में या समूह को अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचाने में समर्थ होता है. उसे आसानी से लोग समूह का नेता मान लेते हैं.
हैमब्लिन (Hamblin, 1958) ने एक प्रयोग कर इसे साबित कर दिया है. इस अध्ययन में तीन-तीन व्यक्तियों का 24 समूह था जिसमें से 12 संकटग्रस्त समूह थे तथा 12 नियंत्रित समूह थे. संकटग्रस्त समूह को खेल के विशेष नियम एक संकट कालीन परिस्थिति में सीखना था जहां खेल के नियम में अचानक परिवर्तन कर उसे सीखना जानबूझकर कठिन बना दिया जाता था. परंतु नियंत्रित समूह को खेल के नियम को एक सामान्य परिस्थिति में सीखना था. परिणाम में दो बातें पाई गई. पहला तो यह कि संकट कालीन परिस्थिति में नेता की शक्ति बढ़ जाती है तथा अनुयायियों द्वारा ऐसी परिस्थिति में नेता को तुरत ही स्वीकार कर लिया जाता है.
दूसरी परिस्थिति में संकटकालीन परिस्थिति की समस्याओं को यदि पुराना नेता ठीक ढंग से समाधान नहीं कर पाता है तो उसे तुरंत ही नया नेता द्वारा पति स्थापित कर दिया जाता है •. हैमब्लिन ने अपने प्रयोगों में पाया कि 12 संकटग्रस्त समूहों में से 9 ने अपने पुराने नेता को नए नेता द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जबकि 12 नियंत्रित समूहों में से मात्र तीन समूह नहीं ऐसा किया।
समूह संकट का प्रभाव सिर्फ नेतृत्व के उद्भव पर ही नहीं पड़ता है बल्कि नेतृत्व के वितरण पर भी पड़ता है . जब संकट अधिक तीव्र होती है या फिर समूह को खतरा अधिक हो जाता है तो वैसी परिस्थिति में सत्ताधारी नेता के उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है. उसी तरह जब समूह के सामने कोई कठिन कार्य आ जाता है तो वैसी परिस्थिति में कई सदस्यों द्वारा मिलकर आपस में नेतृत्व संबंधी कार्यों का बंटवारा कर लिया जाता है।
3. समूह अस्थिरता कभी-कभी ऐसा होता है कि समूह के सदस्यों में आपसी मतभेद काफी बढ़ जाता है
ऐसे में समूह लक्ष्य की प्राप्ति खतरे में पड़ जाती है तथा समूह में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. ऐसी परिस्थिति में नए नेता के बनने की और पुराने नेता के हटने की संभावना तीव्र हो जाती है. समूह का कोई भी व्यक्ति जो इस तरह की अस्थिरता को दूर करके लक्ष्य की प्राप्ति की ओर समूह को ले जाता है, उसे समूह अपना नेता मान लेता है. क्रॉकेट 1955 में अध्ययन करके यह बतलाया कि समूह के बारे में सदस्यों के विचार आपस में विभाजित होते हैं तो वैसी परिस्थिति में नेता के उभरने की संभावना काफी तीव्र हो जाती है . इसका ज्वलंत उदाहरण हमें राज्य के मुख्यमंत्रियों के फेर-बदलाव से मिलता है.
4. अधिकृत अध्यक्षों की असफलता जब समूह का वर्तमान अधिकृत अध्यक्ष अपनी जवाबदेही निभाने में असमर्थ हो जाता है तो ऐसी परिस्थिति में नए नेता के उभरने की संभावना अधिक तीव्र हो जाती है. एक अधिकृत अध्यक्ष अनेकों कार्य जैसे योजना का निर्माण करना, समूह की नीति बनाना, विरोध का कार्य करना आदि करते हैं.
जब किसी कारणवश अध्यक्ष इन कार्यों को नहीं कर पाते हैं तो इससे समूह लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है और उनका पद दूसरे को दे दिया जाता है अर्थात समूह का नेता कोई दूसरा व्यक्ति हो जाता है.
क्रोकेट (1955) में अपने अध्ययन में पाया है कि 83% अबफल औपचारिक अध्यक्ष तथा मात्र 39 प्रतिशत सफल औपचारिक अध्यक्ष के जगह पर समूह के सदस्यों ने नए नेताओं का चयन किया कोज एवं उनके सहयोगियों 1951 ने रेल सड़क कर्मचारियों के समूह के नेताओं के अध्ययन में भी इस प्रकार का तथ्य पाया गया है।
5. नेता की असफलताएं कुछ आवश्यकताएं ही इस प्रकार की होती हैं जिनसे नेतृत्व के उद्भव में सहायता मिलती हैथ उदाहरण स्वरूप, सत्ता में आने की आवश्यकता, प्रतिष्ठा पाने की आवश्यकता, धन कमाने की इच्छा, दूसरों पर प्रभुत्व दिखाने की इच्छा इत्यादि कुछ ऐसी ही आवश्यकताएं हैं. यदि समूह ऐसा है जिसके अधिकतर सदस्यों में इन आवश्यकताओं का भरमार है, तो वैसी परिस्थिति में समूह के कई नेता के उभरने की संभावना बढ़ जाती है. दूसरे तरफ यदि समूह ऐसा है जिसके एकाध सदस्य में ही इस तरह की आवश्यकताएं हैं,
तो वैसी परिस्थिति में समूह में वह व्यक्ति तुरंत नेता बन जाएगा. परंतु यदि समूह के कोई भी सदस्य में ऐसी आवश्यकता नहीं है, तो ऐसी परिस्थिति में कोई भी व्यक्ति समूह का नेतृत्व संभाल नहीं पाएगा और समूह विघटित हो जाएगा।
6. व्यक्तित्व कारक नेतृत्व की उत्पत्ति व्यक्ति के प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण भी हो सकती हैं। कुछ समाज मनोवैज्ञानिकों का मत है कि यदि किसी व्यक्ति में बुद्धि शक्ति, सूझबूझ, शब्दआडंबर, सावेगीक स्थिरता आदि का गुण पर्याप्त होता है तो वह व्यक्ति आसानी से समूह का नेता बन जाता है. इन गुणों से व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता बढ़ती है सामाजिक समस्याओं का समाधान करने एवं विभिन्न प्रकार की योजनाओं एवं नीतियों को कार्यरूप देने में मदद मिलती है . इन सब के बावजूद भी आधुनिक समाज मनोवैज्ञानिकों को यह मंजूर नहीं है कि कोई भी व्यक्ति मात्र व्यक्तित्व के शील गुणों के आधार पर समूह का नेता बन सकता है. इन लोगों के अनुसार नेता बनने के लिए शील गुणों के साथ-साथ उपयुक्त सामाजिक परिस्थिति का भी होना अनिवार्य है।
ऊपर के विवरण से यह स्पष्ट है कि नेता का उद्भव कई कारको से होता है जिसमें समूह से संबंधित कारक एवं शील गुण महत्वपूर्ण है।
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