प्रयोगात्मक अनुसंधान अभिकल्प - experimental research design

 प्रयोगात्मक अनुसंधान अभिकल्प - experimental research design


प्रयोगात्मक अनुसंधान प्रारूप / अभिकल्प ऐसा अनुसंधान प्रारूप होता है जिसमे अध्यन समस्या के विश्लेषण के लिए किसी न किसी प्रकार का प्रयोग समाहित होता है। यह प्रारूप नियंत्रित स्थिति में होता है, जैसे कि प्रयोगशाला मे ज्यादा उपयुक्त होता है।


सामाजिक अध्ययनों में सामान्यतः प्रयोगशाला का प्रयोग नहीं होता है। इस प्रकार के अभिकल्प का प्रयोग ग्रामीण समाजशास्त्र और विशेषकर कृषि सम्बन्धी अध्ययनों में ज्यादा होता है। ग्रामीण प्रयोगात्मक अध्ययनों में प्रयोगों के आधार पर यह पता लगाया जाता है कि संचार माध्यमों का क्या प्रभाव पड़ रहा है योजनाओं का लाभ लेने वालों और न लेने वालो की सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति मे क्या अन्तर आया है, इत्यादि। इसी प्रकार के बहुत से विषयों या प्रभावों को इस प्रारूप के द्वारा स्पष्ट करने की कोशिश की जाती है। चरों के बीच कारणात्मक संबंधों का परीक्षण इसके द्वारा प्रामाणित तरीके से हो पाता है।


प्रयोगात्मक अनुसंधान अभिकल्प का प्रयोग शोधकर्ता किसी प्रयोगशाला की तरह करता है। इस अभिकल्प का प्रयोग दो चरों के परस्पर संबंध के अध्ययन करने के लिए किया जाता है। इसमें दो समूह होते हैं. पहला, नियंत्रित समूह तथा दूसरा प्रयोगिक समूह। नियंत्रित समूह को जैसे का तैसा रहने दिया जाता है तथा उसे किसी भी बाहरी प्रभाव से दूर रखा जाता है। जबकि प्रयोगिक समूह पर उस कारक को आरोपित किया जाता है, जिसका कि प्रभाव शोधकर्ता को देखना अथवा जाँचना होता है। इस अध्ययन में शोधकर्ता द्वारा वैज्ञानिक विधि के सभी चरण अपनाए जाते हैं।


नियंत्रण हेतु दो विधियों को प्रयोग में लाया जाता है पहली विधि में एक समूह के सदस्यों को दूसरे समूह के सदस्यों के साथ समानता स्थापित करने के प्रयोजन से दैव निदर्शन विधि द्वारा दो अलग-अलग समूहों में वर्गीकृत कर दिया जाता है। इस प्रकार की विधि में पक्षपात की संभावना बिलकुल नहीं रहती है

तथा सभी इकाइयों का वितरण बराबर-बराबर हो जाता है। दूसरी विधि में एक समूह की इकाई को दूसरे समूह की इकाई के साथ बराबर करने के लिए प्रत्येक इकाई को दूसरी इकाई से बराबर किया जाता है। इस विधि को मैचिंग विधि के नाम से जाना जाता है।


प्रयोगात्मक अनुसंधान अभिकल्प को हम तीन प्रकार के रूप में समझ सकते हैं-


क) केवल पश्चात् परीक्षण


इसमें सर्वप्रथम सभी दृष्टि से प्रायः समान विशेषताओं व प्रकृति वाले दो समूहों को चयनित कर लिया जाता है।

इन दो समूहों में एक समूह को नियंत्रित समूह तथा दूसरे समूह को प्रयोगिक समूह के रूप में संज्ञा प्रदान की जाती है। नियंत्रित समूह में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं लाया जाता है तथा प्रयोगिक समूह में उस कारक के प्रभाव को आरोपित किया जाता है, जिसके प्रभाव का अध्ययन शोधकर्ता को करना होता है। इसके पश्चात यदि प्रयोगिक समूह नियंत्रित समूह से भिन्न हो जाता है, तो यह इस परिवर्तन का कारण उस आरोपित कारक को ही मान लिया जाता है।


उदाहरणस्वरूप: दो समान प्रकृति और विशेषताओं वाले समूह को चयनित किया गया तथा उसमें से एक समूह में सह-शिक्षा का प्रसार किया जात और दूसरे समूह को जैसे का तैसा ही रहने दिया जाय। यदि में परिणामस्वरूप सह-शिक्षा का प्रसार किए हुये समूह में प्रेम-विवाह की घटनाएँ अधिक देखने को मिलती हैं. तो इस परिवर्तन के पीछे कारक के रूप में सह-शिक्षा को समझा जाएगा। 


ख) पूर्व-पश्चात् परीक्षण


इस प्रकार के अभिकल्प में आश्रित चरों पर प्रभाव की अध्ययन उपचार के पश्चात् ही नही किया जाता, अपितु पहले भी किया जाता है ताकि दोनों समूहों की समानता तथा अन्य चरो का पूर्वानुमान लगाकर प्रयोग को अधिक विश्वनीय बनाया जा सके। पूर्व-पश्चात् परीक्षण में एक ही समूह होता है अथवा एक से अधिक समूह ले सकते है। यदि एक ही समूह चुना जाता है तो उसका अवलोकन जिस कारक का प्रभाव देखना है उससे उपचार के पूर्व तथा पश्चात् किया जाता है। यदि अन्त परिवर्तनशील समूहो को चुना जाए तो प्रायोगिक चर की प्रारम्भिक माप की समस्या समाप्त हो जाती है यदि दो समूह चुने गए है तो एक का पूर्व प्रभाव नही देखा जाता परन्तु प्रायोगिक चर का अध्ययन किया जाता है।

उदाहरणस्वरूपः प्रेम विवाह का अध्ययन सह-शिक्षा के पूर्व और पश्चात किया जाय। इसमें चयनित समूह के बारे में विस्तृत व पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली जाती है तथा उसके पश्चात सह-शिक्षा को चयनित समूह में लागू किया जाता है। इसके पश्चात दोनों अध्ययनों में गहन तुलना की जाती है और यदि परिणामस्वरूप प्रेम-विवाह की घटनाएँ अधिक देखने को मिलती हैं, तो इस परिवर्तन के पीछे कारक के रूप में सह-शिक्षा को समझा जाएगा। 


ग) कार्योत्तर अथवा कार्यान्तर तथ्य परीक्षण


एक्स-पोस्ट-फैक्टो अनुसंधान से तात्पर्य वैसे अनुसंधान से होता है जिसमे शोधकर्ता किसी प्रभाव के आधार पर उसके सम्भागीय कारणों का पता लगाने की कोशिश करता है। इस प्रकार के अनुसंधान में घटना घटने के बाद शोधकर्ता अनुसंधान को प्रारम्भ करता है। प्रभाव आश्रित चर होता है।

पहले बीत चुकी घटनाएं जिन्हे कारण कहा जाता है स्वतंत्र चर होते है। इस तरह के एक्स-पोस्ट फैक्टों अनुसंधान मे स्वतंत्र चर की अभिव्यक्ति आश्रित चर के सामने आने के बहुत पहले ही हो चुकी होती है। यही कारण है कि इस तरह के अनुसंधान में शोधकर्ता चाह कर भी स्वतंत्र चर में किसी प्रकार का कोई जोड़-तोड़ नही कर सकता है।


उदाहरणस्वरूप: मान लिया जाए कि कोई शोधकर्ता फेफड़े का कैंसर का अध्यन करना चाहता है। वह ऐसे रोगियों का अवलोकन करके इस आधार पर पहुचता है कि धूम्रपान तथा हमेशा आने वाली खाँसी इससे संबंधित है। अतः वह ऐसे रोगियों में इस बात का पता लगाने की कोशिश करेगा कि उनमे धूम्रपान की आदल किस तरह की है, प्रतिदिन कितनी सिगरेट पीता है तथा यह भी पता लगायेगा कि रोगी में खाँसी का स्वरूप कैसा है अर्थात् कितने दिनों से उसे खाँसी आ रही है। तथा यह खाँसी आम तरह से आने वाली खाँसी से भिन्न है या उसी प्रकार की है आदि।