अन्वेषण प्रणाली - Exploration system

अन्वेषण प्रणाली - Exploration system


मनुष्य स्वभावतः कम प्रतिरोध वाले मार्गों का चयन करता है। संकृत्य (Task) जैसा भी हो, शारीरिक या मानसिक, व्यक्ति कम श्रम कर उसका सफल निष्पादन करने की ओर अग्रसर होता है। फिस्के एवं टेलर (1991) के अनुसार हम सभी लोग अधिकांश परिस्थितियों में कम से कम मानसिक श्रम से प्रत्येक कार्य पूरा करना चाहते हैं। प्रायः लोग अनेक प्रकार के लघु मार्गों का उपयोग करते हैं, लेकिन विशाल मात्रा में उपलब्ध सामाजिक सूचनाओं की प्रक्रिया का सही सामाजिक संज्ञान करने के लिए जिन मानसिक लघु मार्गों का उपयोग किया जाता है, उन्हें ट्वेस्की एवं काहनमैन (1974) ने अन्वेषण प्रणाली बताया है। इन्हीं अन्वेषण प्रणालियों की सहायता से सामाजिक सूचनाओं का प्रक्रमण करने में व्यक्ति उपयुक्त मनोबन्धों का चयन करता है। वास्तव में जटिल सूचनाएं चाहे वे सामाजिक हों या भौतिक-पादार्थिक का प्रक्रमण कर उनसे किसी समस्या का समाधान करना हो या इसे किसी प्रकार का अनुमान लगाना हो, तो दो प्रकार के नियमों 1. अल्गोरिदम 2. अन्वेषण प्रणाली, की सहायता से करते हैं।


अल्गोरिदम का उपयोग अंकगणित अथवा बीजगणित के प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह एक ऐसी प्रणाली है जो विशाल मात्रा में उपलब्ध सूचनाओं का प्रक्रमण कर उससे निष्कर्ष निकालने की विधि प्रस्तुत करती है। उदाहरण- क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण में किसी निश्चित प्रणाली का उपयोग कर सभी संभव निष्कर्षों की जांच की जाती है। यदि मनुष्य के मस्तिष्क की सूचना प्रक्रमण क्षमता किसी कंप्यूटर की तरह अनंत होती है, तो वह अपनी समस्त ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त होने वाली सूचनाओं की विशाल मात्रा का प्रक्रमण कर सही-सही निर्धारण कर पाता है कि कौन सी घटनाएं घटित हुई हैं और कौन सी घटित होने वाली हैं।


मनुष्य की सूचना प्रक्रमण की क्षमता सीमित है, इसलिए लघु मार्गों को अपना कर अन्वेषण प्रणाली को विकसित किया गया। अन्वेषण प्रणाली के अनेक प्रारूप हैं लेकिन रोजमर्रा के सामाजिक जीवन में तीन अन्वेषण प्रणालियां प्रचलित हैं, जो इस प्रकार हैं-


1. प्रतिनिधित्वात्मकता


2. उपलब्धता की अन्वेषण प्रणाली


3. स्थिरण अन्वेषण प्रणाली


1. प्रतिनिधित्वात्मकता


परिवेश से प्राप्त सूचनाओं तथा मनोबन्ध के मध्य जितनी अधिक समानता है, उतनी अधिक प्रायिकता इसकी होती है कि वे सूचनाएं उस मनोबन्ध से सम्बंधित हैं। उदाहरण- मान लीजिए कि आप किसी सड़क से होकर जा रहें हैं और अचानक आपको एक तेज शोर सुनाई देती है कि पकड़ों पकड़ों और साथ ही पुलिस की सायरन वाली गाड़ी की आवाज इतनी सूचना के आधार पर आप मान लेते हैं कि कोई गम्भीर दुःखद घटना घटित हुई हैं। गम्भीर दुःखद घटना के मनोबन्ध में गठित सूचनाओं में तेज शोर और पुलिस की गाड़ी का सायरन प्रमुख होते हैं। इसी समानता के आधार पर आप जान लेते हैं कि कोई दुःखद घटना घटित हुई है। इस प्रकार का संज्ञान बिना किसी मानसिक श्रम के ज्ञात हो जाता है। 


2. उपलब्धता की अन्वेषण प्रणाली


कभी-कभी व्यक्ति को यह अनुमान या निर्णय करने की आवश्यकता होती है कि किसी प्रस्तुत घटना या व्यवहार के घटित होने की संभावना कितनी है? ऐसी संभावना का आकलन करने के लिए उपलब्धता की अन्वेषण प्रणाली है जो इस पर आधारित होती है कि व्यक्ति के मस्तिष्क में कितनी सरलता और शीघ्रता से उस घटना का मोनोबन्ध सक्रिय हो जाता है।

ट्वेस्की एवं काहनमैन (1982) ने 100 लोगों से यह प्रश्न पूछा किस प्रकार के शब्द सामान्य है जिन का प्रथम अक्षर अंग्रेजी का K से होता है अथवा वे शब्द जिन का तीसरा अक्षर K होता है। कुछ व्यक्तियों के अतिरिक्त सभी ने उत्तर दिया कि K अक्षर से प्रारंभ होने वाले शब्द अधिक सामान्य हैं। वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी के शब्दों के तीसरे स्थान पर K अक्षर वाले शब्द K से प्रारंभ होने वाले शब्दों से दो गुने से भी अधिक हैं। इसके विपरीत उत्तरदाताओं ने बताया कि K से प्रारंभ होने वाले शब्द अधिक सामान्य हैं, क्योंकि प्रश्न सुनकर कार्यकारी स्मृति में ऐसे शब्दों का अधिक आवृत्ति से स्मरण होता है। इसी सरल एवं सहज साहचर्य के आधार पर संज्ञानात्मक अनुमान ही उपलब्धता अन्वेषण प्रणाली का नियम है।


उपलब्धता की अन्वेषण प्रणाली की एक विशेषता यह है कि मनोबन्धों में सूचनाओं की उपलब्धता स्थिर नहीं होती, अर्थात एक जैसी नहीं बनी रहती है। उसे बढ़ाया जा सकता है। किसी भी मनोबन्ध को प्राथमिक लेप देकर शीघ्रता एवं सरलता से उपलब्ध बनाया जा सकता है। दूसरी विशेषता यह है कि सामाजिक निर्णय या अनुमान एक और प्रभाव उत्पन्न करता है. जिसे त्रुटिपूर्ण सहमति कहा जाता है।


क. प्राथमिक लेप तथा उपलब्धता


प्राथमिक लेप से स्मृति में किसी मनोबंध या स्मृति में संचित सूचनाओं की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। यदि किसी मनोबंध का उपयोग कुछ ही समय पूर्व किया गया हो तो इसकी प्रायिकता अधिक होती है कि नई सूचना की व्याख्या के लिए उस मनोबन्ध का पुनः उपयोग किया जाए। उदाहरण- जब मनोविज्ञान के छात्र जब असामान्य मनोविज्ञान का अध्ययन करने लगते हैं तो उन्हें अपने एवं अपने निकट के लोगों के व्यवहारों में मानसिक रुग्णता के लक्षण अथवा अनेक प्रकार के सुरक्षात्मक क्रियातंत्र के होने का आभास होने लगता है। प्राथमिक लेप प्रभावों को अनेक अलग अलग प्रकार के अध्ययनों में भी प्रदर्शित किया गया है।


ख. पूर्ण सहमति प्रभाव


जब कभी भी उपलब्धता अन्वेषण प्रणाली के आधार पर किसी सामाजिक व्यवहार या घटना की आवृत्ति का अनुमान किया जाता है, तो लोग उस अनुमान को मात्र सही ही नहीं मानते, बल्कि यह भी मानते हैं कि अन्य लोग भी उस अनुमानित आवृत्ति से सहमत हैं। व्यक्ति का यह अभिग्रह होता है कि अन्य लोग भी उसके इस अभिग्रह से सहमत हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति का अभिग्रह सही हो।

इसे ही त्रुटिपूर्ण सहमति प्रभाव कहा जाता है। उदाहरण- आप किसी विद्यार्थी से पूछिये कि आप के विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले कितने प्रतिशत विद्यार्थी शराब का सेवन करते है? प्रायः यह देखा जाता है कि यदि विद्यार्थी स्वयं इसका सेवन करता है तो उसके आंकलन में प्रतिशत की मात्रा अधिक होगी अपेक्षाकृत उस विद्यार्थी के आंकलन से जो शराब का सेवन ना करता हो। जबकि हो सकता है कि दोनों का आंकलन सही ना हो।


शेरमन, प्रेस्सन और चैस्सीन (1984) ने अपने एक अध्ययन में पाया कि धूम्रपान करने वाले छात्रों ने बताया कि उनके 51% सहपाठी धूम्रपान करते हैं, जबकि धूम्रपान न करने वाले छात्रों का आकलन 38% था।


वेटजेल एवं वाल्टन (1985) के अनुसार त्रुटिपूर्ण सहमति का प्रभाव अल्पवयस्क छात्रों में पाया जाता है। वहीं फील्ड्स एवं शुमान (1976) ने कहा कि प्रौढ़ लोग समझते हैं कि राजनीतिक मामलों के बारे में उनके विचारों से अधिकांश लोग सहमत होंगे।


कैम्पबेल (1986) ने अपने अध्ययन से यह स्पष्ट किया कि जब व्यक्ति में किसी धनात्मक शीलगुण की दृष्टि से अन्य लोगों से अपने को अलग मानने की इच्छा, दूसरों के समान होने की तुलना अधिक प्रबल होती है. तब ऐसे व्यक्ति त्रुटिपूर्ण सहमति प्रभाव से मुक्त रहते हैं। 


3. स्थिरण अन्वेषण प्रणाली में


मनुष्यों के अनेक ऐसे विश्वास होते हैं जिनको वे सत्य मानते हैं।

ऐसे विश्वासों को खंडित करने वाली सामाजिक सूचनाओं के प्रकाश में लोग अपने विश्वासों को परिवर्तित नहीं करते हैं। रास्स लेब्बर एवं हबर्ड (1975) ने अपने अध्ययन में प्रयोज्यों को क्रमशः 25 कार्ड दिए गए। प्रत्येक कार्ड पर ऐसे दो विवरण थे, जिन्हें संभवत आत्महत्या कर लेने वाले व्यक्तियों ने लिखा था। प्रत्येक कार्ड में लिखित एक विवरण सत्य था और एक विवरण त्रुटिपूर्ण प्रयोज्य को सही कथन को बांटकर त्रुटिपूर्ण कथन से अलग करना था. जैसे ही प्रयोज्य एक कार्ड को पढ़कर बताता था कि कौन विवरण सत्य और कौन असत्य है। इसी प्रकार प्रयोगकर्ता उनके उत्तर की प्रतिपूर्ति कर देता था। इन प्रतिपूर्ति को यादृच्छिक रीति से वितरित कर व्यवस्थित किया गया था। एक प्रयोज्य समूह में यह विश्वास बनाया गया की वे औसत कोटिक्रम के हैं। दूसरे प्रयोज्य समूह में प्रतिपूर्ति को व्यवस्थित श्रेष्ठता कोटिक्रम का तथा तीसरे समूह में निम्नतर कोटिक्रम का होने का विश्वास उत्पन्न किया गया। टास्क की समाप्ति के बाद प्रयोज्य को यह बताया गया की, टास्क में दी गई प्रतिपूर्ति किसी भी प्रकार उनके सत्य-असत्य में बांटने की क्षमता या योग्यता पर आधारित नहीं थी।

बल्कि मनमाने ढंग से दी गई थी। इस दिशा-निर्देश के पश्चात दूसरे पदों की व्याख्या के उद्देश्य से एक प्रश्नावली भरने को दी गई। स्थिरण अन्वेषण प्रणाली का उपयोग व्यक्ति किसी विमा पर किसी की स्थिति का आकलन करने के लिए करता है। जब कभी भी व्यक्ति को अस्पष्ट सूचना के आधार पर किसी घटना या सामाजिक क्रियाकलाप का मात्रात्मक अनुमान या निर्णय करना होता है, तो वह किसी संदर्भ बिंदु से शुरू होकर अपने को समायोजित करता है। सामाजिक घटनाओं. समूह, कार्यकलाप एवं व्यवहार से संबंधित सूचनाएं प्राय: अस्पष्ट होती है। ऐसी स्थिति की व्याख्या करने के लिए व्यक्ति किसी ज्ञात सूचना स्रोत को संदर्भ बिंदु मानकर परिस्थिति के अनुसार अपने निर्णय को समायोजित कर लेता है। स्थिरण अन्वेषण प्रणाली का उपयोग कर लोग किसी प्रकार की सामाजिक सूचना के आधार पर उसकी गुणवत्ता या किसी विमा पर उसकी स्थिति का सही आकलन कर पाने में सक्षम होते हैं।