अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प - exploratory research design

 अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प - exploratory research design


अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प वह प्रारूप है, जिसका उद्देश्य अज्ञात तथ्यों की खोज करना रहता है। अर्थात् यह तथ्यों के बारे में नवीन अंतर्दृष्टि प्राप्त करने से संबंधित है, ताकि वास्तविक समस्या का निर्धारण किया जा सके। किसी संरचनात्मक अध्ययन का आरंभ करने से पूर्व शोधकर्ता द्वारा किसी घटना से जुड़ी जनकरियाँ प्राप्त करने, संकल्पनाओं का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने, अग्रिम अनुसंधान के लिए आवश्यक प्राथमिकताओं को जानने अथवा महत्वपूर्ण समस्याओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने आदि प्रकार के प्रयोजनों की पूर्ति हेतु अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प का निर्माण किया जाता है। 


सेल्टिज के अनुसार,


"अधिक निश्चित अनुसंधान के लिए सम्बद्ध उपकल्पना के निरूपण में सहायक अनुभव प्राप्त करने के लिए अन्वेषणात्मक अनुसंधान आवश्यक है।" 


रसेल के. शुट्ज़ ने अपनी पुस्तक 'इंवेस्टिगेटिंग द सोशल वर्ल्ड' में बताया कि

“अन्वेषणात्मक अनुसंधान यह जानने का प्रयास करता है कि लोग किस प्रकार से एक-दूसरे के साथ अध्यानित वातावरण से संबंधित रहते हैं, एक-दूसरे की क्रिया को क्या अर्थ प्रदान करते हैं तथा कौन कौन से विषय व तत्व उन्हें महत्वपूर्ण लगते हैं। इन सभी का जानने एक ही उद्देश्य होता है कि क्या हो रहा है?' तथा बिना किसी स्पष्ट छुट के उस सामाजिक घटना को गहनता से अन्वेषित करना।" 


विलियम जिकमण्ड (1988 73) ने अन्वेषणात्मक अनुसंधान के प्रमुख रूप से तीन उद्देश्य बताए हैं-


• नवीन तथ्यों अथवा विचारों को तलाशना


• घटना अथवा परिस्थिति का निदान करना


• विकल्पों को चिन्हित करना


अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प के निर्माण हेतु तीन विधियाँ आवश्यक मानी जाती हैं, जो इस प्रकार हैं-


1- अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प के निर्माण हेतु सर्वप्रथम सामाजिक विज्ञान अथवा अपने अध्ययन से संबंधित साहित्यों का पुनरीक्षण किया जाता है। साहित्यों का पुनरीक्षण करना अत्यान आवश्यक और लाभदायक रहता है तथा इसकी सहायता से अनुसंधान समस्या को को स्पष्ट तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है और साथ ही उपकल्पनाओं के निर्माण हेतु भी यह आवश्यक होता है।

इस प्रकार से शोधकर्ता को अन्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित की गई अवधारणाओं और सिद्धांतों के बारे में जानकारी प्राप्त हो पाती है और उन्हें अपने अध्ययन क्षेत्र में क्रियान्वित करने हेतु अवसर भी प्राप्त हो जाता है।


2- इसके पश्चात समस्या से संबंधित विशेषज्ञों और अनुभवी व्यक्तियों का साक्षात्कार / सर्वेक्षण किया जाता है। विशेषज्ञ अथवा किसी अनुभवी व्यक्ति के सर्वेक्षण करने से शोधकर्ता को नवीन विचार और दृष्टि प्राप्त होती है और साथ ही विभिन्न प्रकार के चरों में पाये जाने वाले संबंधों के बारे में भी जानकारी मिल पाती है।


3- अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प के निर्माण में अंतिम और तीसरी विधि के रूप में अंतर्दृष्टि-प्रेरक उदाहरणों का विश्लेषण कार्य सम्पन्न किया जाता है।


इसमें उपलब्ध सामाग्री का अवलोकनात्मक अध्ययन किया जाता है अथवा असंरचित प्रकार के साक्षातरक का प्रयोग कर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अथवा किसी अन्य उपयुक्त विधि की सहायता ली जा सकती है।


भारतीय संदर्भ में किए जाने वाले अधिकांशत: अनुसंधान, अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प का ही प्रयोग करते हैं। अधिकांश अनुसन्धानों का मूल लक्ष्य संबंधित क्षेत्र के नवीन तथ्यों को उजागर करना रहता है। अन्वेषणात्मक अनुसंधान अभिकल्प का निर्माण मूल रूप से उपकल्पना की निर्मिति हेतु आवश्यक रहता है। यह अभिकल्प अपनी प्रकृति में काफी लचीले स्वभाव का होता है, क्योंकि पर्याप्त जानकारी के अभाव में शोधकर्ता को सभी पक्षों का ज्ञान नहीं रहता है। धीरे-धीरे शोधकर्ता को संबंधित अध्ययन के बारे में जानकारी का पता चलता जाता है तथा वह उन जानकारियों को अपने अनुसंधान में जोड़ता जाता है।


अन्वेषणात्मक अनुसंधान प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार के तथ्य स्रोतों पर निर्भर रहता है। प्राथमिक स्रोत के रूप में उत्तरदाता के साथ अनौपचारिक विचार-विमर्श, वैयक्तिक अध्ययन विधि तथा अन्य केन्द्रित समूह विचार विनिमय व गहन प्रकृति की विधियों का प्रयोग किया जाता है तथा द्वितीयक स्रोत में उपलब्ध साहित्यों की समीक्षा को सम्मिलित किया जाता है।