गुणारोपण के कारक - factor of attribution
गुणारोपण के कारक - factor of attribution
गुणारोपण एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति को किस तरह का ज्ञान प्राप्त होता है, यह जानने का प्रयास किया जाता है। इसका संबंध किसी व्यवहार के कारण को खोजने से होता है। यदि हम किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति को गाली देते हुए देखते हैं तो हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि वह क्यों गाली दे रहा है, इसका क्या कारण है? गुणारोपण का संबंध सांकेतित निर्णय से होता है। गुणारोपण इस बात की भी व्याख्या करता है कि व्यक्ति, किसी व्यवहार को क्यों कर रहा है. इसके पीछे क्या कारण है तथा किस आधार पर? उन कारणों को समझने का प्रयास करता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसके दो आधार या कारक बताए है: आंतरिक कारक तथा वाह्य कारक। उदाहरण एक प्रेक्षक किसी विद्यार्थी के किसी परीक्षा में कम अंक को देखता है। स्पष्ट है कि विद्यार्थी के कम अंको का कारण या तो आंतरिक कारक अथवा उसके वाह्य कारक या दोनों कारक आंशिक रूप से उपस्थित हो सकते हैं। उपरोक्त उदाहरण में विद्यार्थी की कम मानसिक योग्यता. पढ़ाई में अरुचि, नोट्स का ना होना. कक्षा में उपस्थिति कम होना इत्यादि कारण हो सकते हैं (आंतरिक कारक)।
परीक्षा के प्रश्नों का कठिन होना अथवा परीक्षक द्वारा सख्त मूल्यांकन करना इत्यादि कारण हो सकते हैं (बाह्य कारक)। जब प्रेक्षक यह निर्णय ले लेता है कि कम अंको का कारण आंतरिक है अथवा वाह्य तो उसे विद्यार्थी के संबंध में अनेक प्रकार के संज्ञान उत्पन्न हो जाते हैं। साथ ही प्रेक्षक के द्वारा उस विद्यार्थी के बारे में पूर्वकथन भी किया जा सकता है। जिस व्यक्ति के संबंध में गुणारोपण किया जाता है वह कार्य जिस तरह से हो रहा है. उसका कारण उस व्यक्ति में निहित है, को आंतरिक कारक कहा जाता है। उदाहरण के द्वारा स्पष्ट है कि विद्यार्थी ने जो कम अंक प्राप्त किए हैं. उस कम अंक मिलने में उस विद्यार्थी का ही योगदान है को आंतरिक कारक के रूप में समझा जा सकता है। आंतरिक कारक के निम्न प्रकार हो सकते हैं: दु:ख, गुणारोपण का एक आधार लक्षित व्यक्ति का दुख या कष्ट हो सकता है। व्यक्ति किसी घटना के कारण किसी दु:ख या वेदना से पीड़ित होता है. तो हम उसे दया का पात्र समझने लगते हैं। किसी अंधे को देखकर उसके प्रति हम दया का भाव प्रकट करते हैं। यह आंतरिक कारक नियंत्रण के योग्य नहीं है दुर्व्यवहार, गुणारोपण करने का एक आधार दुर्व्यवहार भी हो सकता है। जब हम किसी व्यक्ति को दुर्व्यवहार करते पाते हैं, तो हम स्वतः ही निर्णय ले लेते हैं कि वह व्यक्ति ही दोषी है। इसी प्रकार जब हम स्वयं कोई ऐसा दुर्व्यवहार कर बैठते हैं, जिससे हम बच सकते थे तो हम स्वयं को दोषी समझने लगते हैं।
शीलगुण, गुणारोपण का एक महत्वपूर्ण आधार उसका शीलगुण होता है। हम किसी व्यक्ति के किसी निश्चित गुणों को ध्यान में रखते हुए, उसके व्यवहार की व्याख्या करते हैं। जैसे महात्मा गांधी ने अनेक कष्टों को सहते हुए अंग्रेजों के चंगुल से भारत को स्वतंत्र करने के अपने प्रयासों को अंत तक जारी रखा। क्योंकि उनमें राष्ट्रीयता नामक शीलगुण की अधिकता थी। आंतरिक कारक को व्यक्तिगत कारक भी कहा जाता है। गुणारोपण को निर्धारित करने में वाह्य कारकों का भी योगदान होता है। वाह्य कारकों का अर्थ वे कारक या निर्धारक हैं जिनका संबंध उस परिस्थिति से होता है, जिस परिस्थिति के कारण लक्षित व्यक्ति में कोई व्यवहार घटित होता है। अर्थात इस तरह के कारक में हम उन परिस्थितियों को निर्धारित करते हैं, जिनके कारण लक्षित व्यक्ति ने अपना व्यवहार किया। यह भी देखा जाता है कि इस व्यवहार का कारण वह व्यक्ति स्वयं नहीं है. बल्कि वह परिस्थिति है, जिसके कारण उस व्यक्ति को इस तरह के व्यवहार को करने के लिए बाध्य होना पड़ा। जैसे अगर कोई व्यक्ति अपराधी हो जाता है तो हम उन परिस्थितियों का विवरण प्रस्तुत करते हैं, जिसके कारण उस व्यक्ति को अपराध का सहारा लेना पड़ा। हम मानते हैं कि वह व्यक्ति अपराधी है। किन्तु हम उन परिस्थितियों को भी व्यक्त करते हैं जिसके कारण उस व्यक्ति के द्वारा यह व्यवहार घटित हुआ। परिस्थितिवश उत्पन्न होने वाले कारकों को निम्नलिखित रूप में जाना जा सकता है: दूसरे व्यक्ति का शीलगुण, कभी-कभी व्यक्ति अपने स्वभाव या शीलगुण के विपरीत दूसरे लोगों के स्वभाव या शीलगुण से प्रभावित होकर कोई व्यवहार कर देता है।
जैसे कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक के व्यवहार से दुखी होकर विद्यालय छोड़ कर चला जाता है। उस विद्यार्थी का विद्यालय छोड़ कर जाना, उस शिक्षक की हिंसक प्रवृत्ति या उसके द्वारा उस व्यवहार को कारण माना जाता है, जिससे परेशान होकर वह विद्यार्थी स्कूल छोड़ देता है। अर्थात कहा जा सकता है कि वाह्य कारक में दूसरे व्यक्ति का शीलगुण भी उन परिस्थितियों को उत्पन्न कर देता है. जिसके कारण व्यक्ति अपने स्वभाव के विपरीत जाकर निर्णय लेता है। विशेष घटना, व्यक्ति के व्यवहार को निर्धारित करने में किसी घटना विशेष का भी उल्लेख होता है। सामान्यतया व्यक्ति उस घटना के अनुकूल व्यवहार करता है, घटना बदल जाने पर उसका व्यवहार भी बदल जाता है। जैसे किसी की मृत्यु पर शोक प्रकट करना या किसी की सफलता पर खुशी प्रकट करना इत्यादि होने वाले व्यवहारों के कारणों की व्याख्या में विशेष घटना का उल्लेख किया जाता है। जिसके कारण उस व्यक्ति ने अपना व्यवहार प्रदर्शित किया. यहां उस घटना को कारक माना जाता है। किसी घटना को उत्पन्न करने वाले कारक आंतरिक हैं अथवा वाह्य। इसका निर्णय हो जाने के पश्चात प्रेक्षक भविष्य की घटनाओं का पूर्वकथन भी कर सकता है। मान लीजिए कि कम अंको का कारण विद्यार्थी की बुद्धिहीनता (आंतरिक कारक) को समझा गया, तो प्रेक्षक द्वारा यह पूर्वकथन किया जाएगा कि भविष्य में उस विद्यार्थी के द्वारा दी गई परीक्षाओं में भी ऐसे ही अंक प्राप्त होंगे। वहीं प्रश्नपत्र कठिन (बाह्य कारक) होने पर उसका पूर्वकथन प्रेक्षक द्वारा किया गया कि अन्य सभी विद्यार्थियों का भी परीक्षाफल संतोषजनक नहीं हुआ होगा।
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