गुणारोपण को निर्धारित करने वाले कारक - Factors Determining Attribution
गुणारोपण को निर्धारित करने वाले कारक - Factors Determining Attribution
गुणारोपण को निर्धारित करने वाले अनेक संज्ञानात्मक कारकों में से तीन कारक महत्वपूर्ण हैं, जो इस प्रकार हैं-
1. प्रेक्षक कुछ विशेष प्रकार की सूचनाओं के उपलब्ध रहने पर भी गुणारोपण करते समय उन सूचनाओं का या तो उचित उपयोग नहीं करते या फिर उपयोग करने की इच्छा ही नहीं रखते हैं।
2. गुणारोपण में सूचनाओं के उपयोग का ढंग प्रेक्षक के निजी दृष्टिकोण से प्रभावित होता है।
3. प्रेक्षक की निजी आवश्यकताएं भी गुणारोपण को निर्धारित कर देती है।
गुणारोपण की प्रक्रिया ठीक उन्हीं तार्किक नियमों के अनुसार नहीं होती हैं, जिसका विभिन्न सिद्धांतकारों के अनुसार उसे होना चाहिए। उपरोक्त तीनों कारकों के प्रभाव से किसी व्यक्ति के किसी व्यवहार के कारणों का संज्ञान सभी प्रेक्षक एक समान करें ही यह जरूरी नहीं है।
अपूर्ण सूचनाओं का उपयोग गुणारोपण करते समय सभी लोग निर्धारित सूचनाओं का उपयोग करना पसंद करते हैं। जबकि निष्पक्ष सूचनाएं भी उपयोग के लिए उपलब्ध रहती है। उदाहरण यदि ज्ञात करना है कि किसी विशेष संकटकालीन स्थिति में लोगों का व्यवहार कैसा होगा? तो इसके लिए व्यक्तियों के एक समूह प्रतिदर्श से यह पूछना चाहिए कि इस परिस्थिति में वे लोग कैसा व्यवहार करेंगे? किंतु वास्तविकता यह है कि यदि किसी से पूछा गया कि इस स्थिति में लोग क्या करेंगे? तो जो व्यवहार वह स्वयं उस स्थिति में करता, उसे ही लोगों द्वारा किया जाना बताता है। (कैसीन, 1979) गुणारोपण में त्रुटि का एक कारण यह भी होता है कि प्रेक्षक प्राप्त सूचनाओं की गुणवत्ता की जांच वस्तुनिष्ठ ढंग से ना करके एक विशेष ढंग से करता है। विभिन्न शोध अध्ययनों से ज्ञात होता है कि गुणारोपण के लिए लोग अधिक स्पष्ट तथा मूर्त उदाहरणों व सूचनाओं का उपयोग अधिक मात्रा में करते हैं। जबकि अमूर्त विचारों, सांख्यिकीय निष्कर्षों तथा तार्किक मान्यताओं का उपयोग करने से परहेज करते हैं। (कहनेमैन तथा टवस्की, 1973)
प्रेक्षक का निजी दृष्टिकोण गुणारोपण के संबंध में किया गया एक सामान्य प्रेक्षण यह है कि किसी क्रिया को संपादित करने वाला व्यक्ति अपनी क्रियाओं का कारण परिवेश में स्थित कारकों को समझता है।
जबकि उन्हीं क्रियाओं को यदि दूसरा व्यक्ति करें तो वह उनका कारण कर्ता के अंदर स्थित कारकों को समझता है। ऐसी परिस्थिति सफलता/असफलता के गुणारोपण में ज्यादातर होती है कि व्यक्ति अपनी सफलता का कारण अपनी योग्यता को तथा अपनी असफलता का कारण परिवेशजन्य कारकों को मानता है। साथ ही साथ वह दसरे व्यक्ति की सफलता का कारण परिवेश कारकों को तथा असफलता का कारण उस व्यक्ति की योग्यता को मानता है। उदाहरण यदि आप ट्रेन का टिकट खरीदने के लिए एक लंबी लाइन में खड़े हैं और एक व्यक्ति बिना लाइन में लगे सीधे खिड़की से टिकट लेने का प्रयास करता है। इस परिस्थिति में चुकी आप लाइन में पहले से ही हैं। अतः संभावना यह है कि आप उस व्यक्ति में सभ्यता, अनुशासनहीनता जैसे और गुणों का गुणारोपण करेंगे। यहां यह स्पष्ट करना उचित होगा कि आपका दृष्टिकोण लाइन में लगे रहने के कारण भिन्न प्रकार का है। वहीं दूसरी तरफ मान लीजिए कि सभी लोग लाइन में है और आप बिना लाइन के टिकट लेना चाहते हैं। तब लोग आपको भला बुरा कहेंगे। परंतु ऐसी स्थिति में अधिक संभावना इस बात की है कि आप अपनी इस क्रिया का गुणारोपण करने में अपने अंदर सभ्यता, अनुशासनहीनता जैसे गुणों का आरोपण नहीं करना चाहेंगे। बल्कि इसके लिए परिवेश तथा अन्य कारकों का उत्तरदायी समझेंगे। हो सकता है कि आप यह भी अन्य लोगों को समझाने का प्रयास करें कि लाइन में नहीं लगने की मजबूरी मेरी अस्वस्थता है, समय की कमी है. सामान का सुरक्षित ना रहना इत्यादि कारणों से है। जिसके कारण आप देर तक लाइन में प्रतीक्षा नहीं कर सकते हैं।
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