परिवर्तन के लिए दबाव पैदा करने वाले कारक - factors driving change

परिवर्तन के लिए दबाव पैदा करने वाले कारक - factors driving change


पारसन्स ने ऐसे कई पहलुओं का उल्लेख किया है, जो सामाजिक प्रणालियों में नया संतुलन स्थापित करने के लिए आवश्यक दबाव पैदा करते हैं। इनमें से कुछ कारक इस प्रकार है - 


• एक स्थान से दूसरे स्थान पर लोगों के सामूहिक रूप से चले जाने, प्रजातियों के (अंतसमुदाय विवाह) उसके साथ-साथ लोगों की मृत्यु और जन्म दर में परिवर्तन आदि के माध्यम से जनसंख्या के जनसांख्यिकीय स्वरूप में परिवर्तन इन सभी कारकों से सामाजिक संरूप में बदलाव आता है।


• भौतिक वातावरण में परिवर्तन जैसे कि भौतिक संसाधनों (मुद्रा, जल मौसम आदि) की समाप्ति। इससे भी सामाजिक प्रणाली में तनाव और परिवर्तन आ सकता है। 


• सामाजिक प्रणाली के भीतर सदस्यों के लिए संसाधनों की उपलब्धता और खाद्य उत्पादन में वृद्धि के कारण जनसंख्या में परिवर्तन। 


• प्रौद्योगिकी में परिवर्तन और समाज की प्रगति के लिए वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग।


• नए धार्मिक विचार अथवा धार्मिक मूल्यों तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि के बीच एकीकरण जैसे नए (सांस्कृतिक संरूप ( भी सामाजिक प्रणाली में परिवर्तन ला सकते हैं। पारसन्स का कहना है कि ये पहलू अपने आप में पूर्ण नहीं है, किंतु उन अनेक तत्वों में से महत्वपूर्ण होने का संकेत देते हैं जो अपने अलग अस्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि (परंपराश्रित समूह हैं ) अर्थात् अनेक तत्व एक-दूसरे का सहारा लेकर सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन लाने के लिए काम करते हैं।


सांस्कृतिक तत्व मूल्यों और विश्वासों के तर्कसंगतिकरण तथा परंपरागत होने की सतत प्रक्रियाओं के द्वारा सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन लाते हैं।

पारसन्स ने तर्कसगतिकरण की अवधारणा का प्रयोग वेबर की व्याख्या के अनुसार किया है, जिसका अभिप्राय है कार्य, व्यक्तिगत कर्तव्यों तथा सामाजिक संस्थाओं के प्रति तर्कसंगत व्यक्तिवादी और अभिनव दृष्टिकोण के क्रमिक विकास की प्रक्रिया। इसका अर्थ है राजा, पूजारी अथवा नेता जैसे शासक लोगों की व्यक्तिगत सनक अथवा परंपरा अथवा रीति-रिवाज की बजाय उत्तरदायित्व के निर्धारण के कानूनी तथा औपचारिक उपायों में बढ़ोत्तरी, किंतु तर्कसंगतिकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ सामाजिक प्रणालियों में कुछ समय में बाद मूल्यों को स्थायित्व प्रदान करने अथवा संस्थागत करने की प्रवृत्ति भी रहती है। जिससे निहित स्वार्थ उभर आते हैं। ये निहित स्वार्थ स्थितियों में परिवर्तन होने के बावजूद उन्हीं मूल्यों को जारी रखने पर बल देते हैं। ऐसा होने पर तार्किक मूल्यों में फिर से परंपरा का रूप आने लगता है। समाज अथवा सामाजिक प्रणाली में तर्कसंगतिकरण और परंपरागत होने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और पुराने मूल्यों के स्थान पर नए यह चक्र निरंतर गतिशील रहता है।


पारसन्स ने परिवार प्रणाली के उदाहरणों से सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन की प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया है। परिवार में उसके सदस्यों के जीवनचक्र में अतर्हित परिवर्तन के फलस्वरूप उसमें परिवर्तन होता रहता है।

जन्म, बाल्यावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था और मुत्यु की प्रक्रियाएँ सभी परिवारों के अनिवार्य अंग है और इनमें से प्रत्येक प्रक्रिया ऐसे सामाजिक परिणाम लाती है, जो परिवर्तन तथा पारिवारिक भूमिकाओं, सदस्यों के व्यवसाय, सत्ता, प्रस्थिति और मूल्यों एवं विश्वासों में नए समायोजन का आवश्यक बना देते हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के मूल्यों तथा दृष्किकोण में परिवर्तन परिवार प्रणाली का अंतर्निहित तत्व हैं। परिवार में निरंतरता तथा परिवर्तनों की इस प्रक्रिया की महत्वपूर्ण विधि है बालक का समाजीकरण। यह प्रक्रिया बालक के व्यक्तित्व में प्रणाली के मूल्यों को स्थापित करती है, किंतु बड़ा होने पर वही बालक समाज की व्यापक प्रणलियों से अन्य मूल्य ग्रहण करता है, हो सकता है कि बड़ा होने पर उसकी नई भूमिकाएँ और अपेक्षाएँ बाल्यवस्था की भूमिकाओं एवं अपेक्षाओं से मेल न खाती हों। इस प्रकार परिवार प्रणाली में स्थिरता और परिवर्तन की अंतनिहित प्रक्रिया है।


इन परिवर्तनों को परिवार चक्र के अध्ययन द्वारा चित्रित किया जा सकता है।

इस चक्र का एक पहलू शारीरिक विकास की प्रक्रिया में बच्चे की भूमिका में परिवर्तन से संबंधित हैं। इससे बदलते हुए जैविक चक्र (उदाहरण के लिए बाल्यावस्था. किशोरावस्था. प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था) में व्यक्ति के व्यक्तिगत पर प्रभाव पड़ता है। क्योंकि इसके साथ भूमिका अपेक्षाएँ बदल जाती है। पुराने शैक्षिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों के स्थान पर नए मूल्यों को आत्मसात् करना आवश्यक हो जाता है। समाजीकरण की जैविक प्रक्रिया निर्बाध नहीं होती, क्योंकि जीवन के एक चरण से दूसरे चरण में परिवर्तन में विरोध और से चिंता का सामना करना पड़ता है। इससे नई भूमिकाओं तथा नए मूल्यों को सीखने के स्थान पर पुराने मूल्यों के संरक्षण नई भूमिकाओं तथा नए मूल्यों को सीखने के स्थान पर पुराने मूल्यों के संरक्षण की नई विधियाँ सामने आती है। इसलिए समाजीकरण और शिक्षा की प्रक्रियाओं में पुरस्कार तथा दंड के माध्यम से सदैव भूमिका अपेक्षाओं में हेर-फेर होती रहती है। बचपन में यह भूमिका माँ-बाप निभाते हैं और बड़ा होने पर सामाजिक प्रणाली. सामाजिक प्रतिबंध की अपनी संरचना के द्वारा अपेक्षित भूमिकाओं के साथ अनुरूपता स्थापित करती है।


परिवार चक्र का दूसरा पहलू संरचात्मक है। इसका निर्धारण परिवार में सदस्यों की संख्या में परिवर्तन से होता है। एकल परिवारों में सदस्यों की संख्या में वृद्धि से संयुक्त परिवार बन जाते हैं। परिवार का यह आकार प्रणाली के आंतरिक तथा बाहरी दोनों पहलुओं से प्रभावित हो सकता है। बाहरी पहलुओं में आर्थिक साधन, संपत्ति या व्यवसाय आदि शामिल किए जा सकते हैं। आंतरिक पहलु जन्म दर तथा लिंग अनुपात से निर्धारित होते हैं। ये दोनों पहलू एक-दूसरे से जुड़े हुए है।