जाति व्यवस्था की निरंतरता के कारक - Factors for the continuity of the caste system
जाति व्यवस्था की निरंतरता के कारक - Factors for the continuity of the caste system
उक्त प्रस्तुत किए गए संदर्भों से यह स्पष्ट है कि जाति व्यवस्था में अनुकूलन का गुण पाया जाता है तथा परिस्थितियों व परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को भी परिवर्तित करने में सक्षम है।
के.एम. पणिक्कर ने लिखा है कि "जाति व्यवस्था रबर से बने एक तम्बू की तरह है, जो अपने अंदर सभी समूहों का समावेश कर लेता है। "
इस कथन से भी जाति व्यवस्था के अनुकूलन की क्षमता प्रकट होती है। यह क्षमता प्राचीन काल से ही जाति व्यवस्था में विद्यमान रही है। इस व्यवस्था ने जैन, बौद्ध, इस्लाम, आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, संस्कृतिकरण आदि परिवर्तनों के साथ अनुकूलन किया है तथा अपने अस्तित्व को निरंतर बनाए रखा है। भले ही इसके स्वरूप में थोड़े बहुत परिवर्तन ही क्यूँ ना हुए हों। इसके अलावा निम्न समकालीन प्रकार्यों को भी जाति व्यवस्था की निरंतरता के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है-
1. जाति व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जो सामाजिक गतिशीलता को बल प्रदान करती है। इसे हम दो रूपों में समझ सकते हैं। पहला संस्कृतिकरण' के रूप में यह व्यवस्था जातीय संस्तरण की निम्न प्रस्थिति वाली जातियों द्वारा उच्च तथा प्रभुत्वशाली जातियों की जीवनशैली, संस्कृति, परंपरा के अनुसरण तथा कुछ समय बाद स्वयं को उच्च जाती के रूप में स्थापित करती है। इस के प्रकार से सभी जातीय समूहों को संतुष्ट करते हुए जाति व्यवस्था अपनी निरंतरता को कायम रख पाने में सक्षम है। दूसरे रूप में जाति व्यवस्था शक्ति को संकलित करने के संदर्भ से महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में आर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति बहुत महत्वपूर्ण है तथा सभी जातियों द्वारा अधिकाधिक शक्ति प्राप्त करने की होड़ सी लगी हुई है। जातियां एक ओर जहां अपने सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए दबाव समूह के रूप में कार्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर चुनावों में अपनी ही जाति के प्रतिनिधि को जिताने के लिए सभी जातियां एकत्रित हो जाती हैं।
2. यदा कदा व्यक्ति को अपने हितों की पूर्ति के लिए जातिवाद का सहारा लेना पड़ता है। राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक हितों के लिए व्यक्ति को कभी कभी जातिगत आधारों की सहायता लेनी पड़ती है
तथा यह अपने जातीय समूह के लोगों में जाति संबंधी भावनाएं पैदा करती है। व्यक्ति द्वारा अपनी जाति को संगठित कर दबाव समूह के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा अपने व्यक्तिगत हितो की पूर्ति की जाती है।
3. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में वोट बैंक की राजनीति करने की दृष्टि से भी जातियों को लमबंद किया जाता है। क्षेत्र में जातियों की संख्या के आधार पर ही प्रतिनिधि को नामित किया जाता है तथा जातियों द्वारा भी उन्हीं प्रतिनिधियों को वोट दिया जाता है, जो प्रतिनिधि उनकी जाति से संबंधित रहते हैं।
4. जाति के आधार पर विभिन्न प्रकार के संगठन बनाए जाते हैं तथा ए संगठन अनेक प्रकार के कल्याणकारी कार्य करते हैं। अपनी जाति के लिए अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, छात्रावास आदि।
स्थापित कर ए संगठन अपनी जातियों के प्रति अपनी आस्था को प्रकट करते हैं। इन संगठनों द्वारा किए जाने वाले कल्याणकारी कार्य केवल अपनी ही जाति के लिए होते हैं। यह कार्य एक ओर तो उनकी जातियों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं तो दूसरी ओर उनकी जाति से संबंधित लोगों में विश्वास की भावना बलवती होती है, जो उनकी जाति को मजबूती प्रदान करती है। इस प्रकार से लोगों में अपनी जाति के लिए हम की भावना' का विकास होता है।
5. समकालीन समय में वैश्वीकरण तथा संचार क्रांति के युग में व्यक्ति अपने पहचान को लेकर काफी सजग हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस विस्तारित युग में पहचान के खो जाने का संकट तेज हुआ है तथा इस संकट से उबरने के लिए और अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए व्यक्ति अपने नृजातीय मूल को तलाशता है। जाति व्यवस्था अपने सदस्यों को एक सामाजिक आवरण प्रदान करती है जो उनको सुरक्षित पहचान प्रदान करती है। एक ऐसी पहचान जिसे व्यक्ति जीवनपर्यंत धारण किए रहता है तथा कोई भी शक्ति इस पहचान को बदल नहीं सकती।
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