जाति व्यवस्था में परिवर्तन लाने वाले कारक - Factors that brought changes in the caste system
जाति व्यवस्था में परिवर्तन लाने वाले कारक - Factors that brought changes in the caste system
उक्त लिखित परिवर्तनों तथा जाति के परंपरागत स्वरूप विघटित होने में अनेक कारक उत्तरदायी हैं, जिनमें से प्रमुख के बारे में यहां विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है
a. पश्चिमी शिक्षा तथा सभ्यता
ब्रिटिश औपनिवेश के पूर्व भारतीय समाज में धार्मिक शिक्षा का प्रचलन था, जिसमें केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रियों को ही शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार प्राप्त था तथा शेष जातियों को शैक्षिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था। लोग अपने जातीय व्यवसायों की शिक्षा परिवार द्वारा प्राप्त करते थे। ब्रिटिश काल में पहली बार शिक्षा धर्म निरपेक्ष तथा सार्वभौमिक हुई। इस प्रकार से भारतियों में संकीर्णता तथा रूढ़िवादिता में कमी आयी तथा समानता व भाई-चारे की भावना का विकास हुआ।
b. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण
आजाद भारत में भी पश्चिमी शिक्षा तथा सभ्यता के प्रति आकर्षण बना हुआ है। यही कारण है कि भारत में व्यक्तिवादिता, उदरवाद, भौतिकवाद और उपयोगितावाद जैसे नवीन विचारों का आगमन हुआ है।
भारत में बड़े-बड़े कारखानों का निर्माण औद्योगीकरण के कारण हुआ तथा इन कारखानों ने सभी जातियों के लोगों को साथ काम करने के अवसर दिए। पूर्व के स्थापित जाति आधारित व्यवसायों को तोड़कर औद्योगीकरण ने लोगों को विभिन्न व्यवसायों में सम्मिलित किया तथा इसका आधार गुण व कुशलता को बनाया गया न कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था को एक साथ कार्य करने से लोगों में पारस्परिकता कि भावना विकसित हुई तथा भेदभाव में कमी आयी।
c. स्वतंत्रता तथा धार्मिक आंदोलन
ब्रिटिश औपनिवेश से आजाद होने के लिए भारतियों ने बहुत संघर्ष किया। इन आंदोलनों में शामिल नेताओं ने जातिगत भेदभावों को दूर रखते हुए एक साथ मिलकर आवाज उठाई। सभी जातियों के लोग एक साथ रहते थे. साथ खाते थे. साथ सोते थे तथा साथ ही मंत्रणा व विचार-विमर्श भी किया करते थे। इन क्रियाविधियों ने भी जाति व्यवस्था की कठोर संरचना को तोड़ने का काम किया।
स्वतन्त्रता आंदोलनों के अलावा भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने की दृष्टि से अनेक धार्मिक आंदोलन भी किए गए, जिनमें ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन द्वारा चलाए गए आंदोलन प्रमुख हैं। इनके अलावा व्यक्तिगत तौर पर कबीर, गुरु नानक. नामदेव. तुकाराम आदि समाज सुधारकों ने भी धार्मिक सुधार की दृष्टि से उल्लेखनीय कार्य किए। इन आंदोलनों की सहायता से अस्पृश्यता भेदभाव आदि समस्याओं को समाप्त करने के प्रयत्न किए गए।
d. लोकतन्त्र की स्थापना
स्वतंत्र भारत में लोकतन्त्र की स्थापना की गई तथा इसके बाद संवैधानिक रूप से रंग, लिंग, जन्म, जाति, धर्म आदि के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को समाप्त करने हेतु निर्देश जारी किए गए। देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाने की बात कही गई। इन लोकतान्त्रिक विचारों के कारण जाति व्यवस्था शिथिल हुई है।
e. स्त्री शिक्षा का प्रचार-प्रसार
आज स्त्रियां उतनी ही शिक्षित हैं जितना की पुरुष। स्त्रियों में शिक्षा के प्रसार ने उनके लिए सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक विकास के मार्ग खोल दिए। स्त्रियों ने अपने ऊपर थोपी जा रही कुप्रथाओं तथा निर्योग्यताओं का विरोध किया। शिक्षित स्त्रियां इन प्रकार के निषेधों को मानने से इनकार करती हैं।
f. धन-संपत्ति का बढ़ता महत्व
आज के समय में जन्म के स्थान पर व्यक्तिगत गुणों तथा कौशल को अधिक महत्व दिया जा रहा है। व्यक्ति के मूल्यांकन हेतु उसकी जाति गौड़ हो रही है तथा धन-संपत्ति के आधिपत्य को ज्यादा महत्व के दिया जाने लगा है।
g. संयुक्त परिवार का विघटन
जाति व्यवस्था को परिवर्तित करने में संयुक्त परिवारों का विघटन भी उत्तरदायी है।
संयुक्त परिवारों द्वारा जाति व्यवस्था के नियमों का कठोरता से पालन किया जाता था, परंतु उनके विघटित होने के बाद जन्मे एकाकी परिवारों में व्यक्तिवादिता की भव अधिक पायी जाती है। यही कारण है कि इन परिवारों में जाति व्यवस्था को मानने वाले नियमों के प्रति उदासीनता आयी है।
h. यातायात तथा संचार साधनों का विकास
आज यातायात और संचार का विकास काफी हो चुका है तथा इन साधनों के विकास के कारण लोगों में गतिशीलता बढ़ी है। अनेक प्रान्तों, धर्मों, जातियों के लोग आज एकसाथ बस, ट्रेन, हवाई जहाज आदि में सफर करते हैं। इस प्रकार से लोगों में आपसी सहयोग, संपर्क, समानता आदि की भावना बलवती हुई तथा खान-पान और छुआछूत संबंधित निषेध कम से कमतर हुए।
i. जाति पंचायतों की कमी
जाति व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की दिशा में जाति पंचायतों तथा ग्राम पंचायतों की भूमिका प्रमुख रही है। ए पंचायतें जाति व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों के लिए दंड आदि का प्रावधान करते थे। परंतु जाति पंचायतों की समाप्ती के कारण जाति व्यवस्था के प्रति लोगों की धारणाओं में भी बहुत परिवर्तन हुए हैं।
j. जजमानी व्यवस्था की समाप्ति
जाति व्यवस्था को सुदृढ़ तथा जातियों को परस्परिक तौर पर निर्भर रखने में जजमानी प्रणाली की भूमिका अग्रणी रही है। परंतु औद्योगीकरण तथा अन्य संस्थाओं की स्थापना ने जजमानी प्रणाली को तोड़ दिया तथा लोग अपने जातीय व्यवसायों से हटकर भी अन्य व्यवसायों में शामिल होने लगे। इस प्रकार से जातीय व्यवस्था की बाध्यता तथा जातियों की आपसी आर्थिक निर्भरता कम होने लगी।
K. नवीन संवैधानिक कानून ब्रिटिश काल से ही ऐसे क़ानूनों का प्रावधान किया जाने लगा, जो जाति व्यवस्था के विरुद्ध थे स्वतंत्र भारत में निम्न कानूनों द्वारा जाति व्यवस्था की स्थापित मान्यताओं को तोड़ने का काम किया गया है -
• हिंदू विवाह वैधकरण अधिनियम, 1954
• विशेष विवाह अधिनियम 1954
• हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
• अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 आदि इसके अलावा संविधान में लिखित अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि आधार पर किए जाने वाले भेदभाव तथा अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता को वर्जित किया गया है। संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संज्ञा प्रदान की है।
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