मुस्लिम समाज में परिवार - family in muslim society
मुस्लिम समाज में परिवार - family in muslim society
• मुस्लिम समाजों में भी हमेशा से परिवार संस्था महत्वपूर्ण रही है। मुस्लिम परिवार धर्म से प्रभावित और निर्देशित होने वाली संस्था है उनके सभी नियम, यथा- परिवार का संगठन, विवाह पद्धति, उत्तराधिकार का नियम पारिवारिक सदस्यों में आपसी संबंध, पारस्परिक सहायता के नियम, विधवा तथा अपंग जनों की सुरक्षा आदि, कुरान में लिखी गई आयतों के ही अनुरूप हैं। मुस्लिम परिवार की प्रमुख विशेषताओं के बारे में यहाँ विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है -
क) संयुक्त परिवार व्यवस्था
मुस्लिम धर्मग्रंथ कुरान में संयुक्त परिवार को उत्तम कोटि का परिवार माना गया है। इसी कारण मुसलमान समाजों में संयुक्त परिवारों की संख्या प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। इस्लाम धर्म के अनुसार प्रत्येक मुसलमान पुरुष को चार पत्नियाँ रखने का अधिकार है और ऐसी स्थिति में संतानों की संख्या में स्वतः ही अधिकता हो जाती है।
संयुक्त परिवार व्यवस्था होने के कारण परिवार में पिता-माता, पुत्र, उसका पुत्र और उनसे संबंधित स्त्रियाँ तथा अन्य रिश्तेदार शामिल रहते हैं। परिवार के वृद्ध व्यक्ति को विशिष्ट सम्मान दिया जाता है और परिवार का मुखिया भी वही रहता है तथा परिवार के अन्य सभी सदस्य मुखिया के आदेशों का पालन पूरी निष्ठा के साथ करते हैं। सभी के निवास स्थान एक होते हैं और भोजन के लिए रसोई भी एक ही प्रयोग में लाई जाती है।
हालांकि परिवर्तन की चपेट में मुस्लिम संयुक्त परिवार भी आए हैं और नगरीकरण, औद्योगीकरण आदि कारकों के कारण मुसलमानों में भी एकाकी परिवारों का प्रचलन धीरे धीरे बढ़ ही रहा है।
ख) पितृसत्तात्मक व्यवस्था
मुसलमानों के परिवार भी हिंदुओं की तरह ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था से संचालित रहते हैं। परिवार का मुखिया एक पुरुष ही होता है तथा उसके आदेशानुसार परिवार के अन्य सदस्य कार्य करते हैं।
सदस्यों की सुरक्षा तथा संरक्षण संबंधी सभी निर्णय पुरुष मुखिया द्वारा ही लिए जाते हैं। तलाक संबंधी अधिकार भी स्त्रियों की तुलना में पुरुषों को अधिक प्राप्त हैं। परिवार में बच्चों को प्राप्त होने वाली शिक्षा तथा सुविधाओं के लिए पुरुष सदस्य ही नीति निर्माण का कार्य करते हैं तथा किसी भी निर्णय अथवा नियोजन में पुरुषों की भूमिका सर्वोपरि रहती है। विवाह के उपरांत स्त्री अपने पति के निवास स्थान पर रहने को जाती है और वंश का नाम भी पिता से पुत्र की ओर चलता है।
ग) बहु-पत्नी विवाह
मुसलमानों की यह प्रथा हिंदुओं से अलग है। जहां हिंदुओं में एक विवाह को मान्यता दी जाती है, वहीं मुसलमानों को एक साथ चार पत्नियाँ रखने के अधिकार प्राप्त हैं। कई संपन्न परिवारों के लिए एक से अधिक स्त्रियाँ रखना प्रतिष्ठा का सूचक रहता है। यहाँ इस बात का आवश्यक ध्यान देना चाहिए कि चार पत्नियों को एक साथ रखने पर पुरुष पर एक नियंत्रण की बात की गई है और वह नियंत्रण सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करने के रूप में है। सभी पत्नियों को समान स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त होने चाहिए।
हालांकि शिक्षा और अन्य परिवर्तनों के कारण एक से अधिक पत्नियाँ रखना आज के समय में अधिक प्रासंगिक नहीं रह गया है। इसके अलावा बहू-पत्नी विवाह को गैर-कानूनी भी माना गया है। अतः वर्तमान समय में एक पत्नी विवाह का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।
घ) सदस्यों की पारिवारिक स्थिति में असमानता
मुस्लिम समाज में पाई जाने वाली परिवार व्यवस्था में सभी सदस्यों को समान रूप से प्रस्थिति प्राप्त नहीं रहती है। आयु की दृष्टि से ही परिवार के सदस्यों को प्रस्थिति प्राप्त होती है। अधिक आयु के लोगों को उच्च परिवारिक स्थिति तथा कम आयु वाले को निम्न पारिवारिक स्थिति प्राप्त होती है। आयु के कारण ही पिता को मुखिया का स्थान मिलता है और परिवार में सबसे उच्च पारिवारिक प्रस्थिति प्राप्त होती हैं। हालांकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था होने के कारण माता का स्थान पारिवारिक प्रस्थिति की दृष्टि से गौण होता है। यही कारण है कि पारिवारिक निर्णयों में पुरुषों की राय को महत्वपूर्ण समझा जाता है और स्त्रियों की राय नहीं ली जाती है। पारिवारिक स्थिति में पुरुष सदैव स्त्रियों से उच्च रहते हैं।
ङ) स्त्री पुरुष में पृथकता
मुस्लिम परिवारों में पर्दा प्रथा का प्रचलन है और परिवार की स्त्रियाँ अपने बड़ों से विभिन्न रिश्तेदारों से तथा बाहर के लोगों से पर्दा करती हैं। घर से बाहर निकालने पर स्त्रियों को बुर्के का प्रयोग करना पड़ता है, ताकि महिलाओं का कोई भी अंग दिखाई नहीं देना चाहिए। मुसलमानों में स्त्री और पुरुष के रहने के स्थान भी अलग अलग होते हैं: स्त्रियों के रहने वाले स्थान को जनानाखाना और पुरुषों के रहने वाले स्थान को मर्दानाखाना कहा जाता है। इसका उल्लंघन केवल आर्थिक तंगी की दशा में ही किया जाता है। मुस्लिम परिवारों में घर के दरवाजों पर पर्दे लगे रहते हैं। पूर्वजों द्वारा अनुपालित की जाने वाली परंपराओं के प्रति मुसलमानों में काफी आस्था देखने को मिलती है तथा वे उन व्यवहारों के पालन में अपनी विशिष्ट रुचि दिखाते हैं। वे अपने रीति-रिवाज, भाषा, व्यवहार के तरीके और जीवन पद्धति को निरंतर बनाए रखने में अपना गौरव समझते हैं। यह निरंतरता पिता से पुत्र और पुत्र से उसके पुत्र को सांस्कृतिक विरासत के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। इस प्रकार से मुस्लिम परिवार की संस्कृति और उसके प्रतिमान निरंतर बने हुए हैं।
च) परिवार की संरचना में धर्म की प्रधानता
मुस्लिम परिवार पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होता है। धर्म के आधार पर ही परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा के साथ निभाता है तथा परिवार में सद्भावना बनाए रखता है। समस्त पारिवारिक सदस्यों के मार्गदर्शन का कार्य कुरान शरीफ करता है। इसी वजह से सभी धार्मिक क्रियाकलाप संपन्न करते हैं, यथा- दिन में पाँच बार नमाज पढ़ना, रमजान के महीने में व्रत रखना, गरीब और अपंगों की सहायता व दान आदि देना, हज पर जाना आदि। कुरान में लिखा गया है कि जो लोग अल्लाह के बताए गए रास्ते पर नहीं चलते हैं, उन्हें जन्नत नसीब नहीं होती. वे दंड के भागी होते हैं और जो लोग अल्लाह के बताए गए रास्ते पर चलकर पारिवारिक कर्तव्यों को पूरी निष्ठा के साथ निभाते हैं, वे अल्लाह के प्यारे होते हैं तथा उन्हें जन्नत नसीब होती है। इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि मुसलमानों में धर्म के प्रभाव और विश्वास ने पारिवारिक व्यवस्था को संरचनात्मक दृढ़ता प्रदान किया है।
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