जैन धर्म में व्रत - fasting in jainism

जैन धर्म में व्रत - fasting in jainism


जैन धर्म में पाँच व्रतों के बारे में विवरण मिलता है। हालांकि माना जाता है कि चार व्रत पहले से ही क्रियाशील थे. महावीर ने केवल पाँचवाँ व्रत जोड़ा है। ये व्रत इस प्रकार हैं


1- हिंसा से परहेज अर्थात् अहिंसा


2- झूठ न बोलना अर्थात् अमृषा


3- चोरी चकारी न करना अर्थात् अचौर्य


4- संपत्ति के अर्जन से दूर रहना अर्थात् अपरिग्रह


5- इंद्रियों पर संयम रखना अर्थात ब्रह्मचर्य


उक्त लिखित सभी व्रतों में अहिंसा के व्रत को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि जैन धर्म में किसी भी प्राणी को दुख अथवा यातना देना अत्यंत ही निकृष्ट समझा जाता है। हालांकि इस व्रत के संदर्भ में कुछ विरोधाभाषी गतिविधियां भी देखने को मिलती है, जैसे कुछ जैन मतावलंबी राजा किसी पशु की हत्या करने की वजह से हत्यारे को फांसी पर चढ़ा देते थे। जैन धर्म में जीव पर हिंसा व होने के कारण युद्ध तथा कृषि दोनों पर ही प्रतिबंध लगाया गया है।


व्रत के अलावा तीर्थंकरों के विचारों में भी काफी मतभेद देखने को मिलते हैं। महावीर से पूर्व के जैन तीर्थंकर पार्श्व ने अनुयायियों निचले और ऊपरी अंगों को बस्त्र आदि से ढकने की अनुमति प्रदान की थी, जबकि महावीर ने किसी भी प्रकार के वस्त्रों को पहनने की स्वीकृति नहीं प्रदान की तथा वस्त्र के सर्वथा त्याग की बात की। संभवतः महावीर अपने अनुयायियों के जीवन को और भी अधिक संयमी बनाना चाहते थे।

आगे चलकर जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया श्वेतांबर तथा दिगंबरा श्वेतांबर में वे जैन अनुयाई शामिल किए जाते हैं जो सफ़ेद वस्त्रों को धारण करते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के लोग वस्त्रों का त्याग कर नग्न अवस्था में ही रहते हैं।


जैन लोगों की आस्था ईश्वर के प्रति पाई जाती है अर्थात् इनमें ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है। महावीर का मत है कि पिछले जन्म में किए गए पुण्य तथा पाप द्वारा ही अगले जन्म का निर्धारण होता है अर्थात् पिछले जन्म में किए गए कार्यों के आधार पर ही व्यक्ति का जन्म उच्च अथवा निम्न कुल में होता है। महावीर का मानना है कि चांडालों में भी मानवीय गुण पाए जाते हैं। साथ ही वह इस बात पर भी जोर देते हैं कि शुद्ध और अच्छे आचरण द्वारा निम्न जाति का व्यक्ति भी मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

जैन धर्म में सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाने के लिए तीन मार्गों की व्यवस्था की गई है - सम्यक् ज्ञान, सम्यक् ध्यान और सम्यक् आचरण। इन तीनों को जैन धर्म में त्रिरत्न की संज्ञा प्रदान की गई है। बिना किसी कर्मकांडीय अनुष्ठान के इन तीनों उपायों को फलीभूत कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।