बौद्ध कालीन शिक्षा की विशेषताएं - Features of Buddhist education
बौद्ध कालीन शिक्षा की विशेषताएं - Features of Buddhist education
बौद्ध कालीन शिक्षा के उद्देश्य निम्न लिखित थे
• नैतिक चरित्र का निर्माण करना
• बौद्ध धर्म का प्रसार करना
• व्यक्तित्व का विकास करना
• जीवन के लिये तैयार करना
• अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना
• प्रव्रज्या संस्कार शिक्षा प्राप्त करने के लिए बालकों का मठों में प्रवेश हेतु प्रव्रज्या संस्कार होता था। इसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षा हेतु घर से बाहर जाना।
यह वैदिक काल के उपनयन संस्कार जैसा ही था। छात्र को मठ में ही रहना पड़ता था जति का कोई बंधन नहीं था यह 8 वर्ष की उम्र में किया जाता था।
• इस काल में छात्रों की दिनचर्या अत्यन्त कठिन थी। छात्रों को कठोर नियमों का पालन करना होता था। छात्रों (सामनेर) को 10 नियमों का पालन करना होता था 12 वर्ष तक शिक्षा।
• इस काल की शिक्षा संस्थाओं को बौद्ध संघ बौद्ध मठ या बौद्ध संघाराम कहते थे। ये नगरों के कोलाहल से दूर होते थे।
• इस समय की शिक्षा में बौद्ध धर्म की प्रधानता थी। अधिकांश छात्र धर्म शास्त्रों का अध्ययन करते थे। इस के अलावा इस काल में साहित्य दर्शन, कला, व्यापार, कृषि, सैनिक शिक्षा आदि की शिक्षा दी जाती थी।
शिक्षा को दो भागों में विभाजित किया गया था प्रारम्भिक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा प्रारम्भिक शिक्षा में पढ़ना लिखना तथा साधारण गणित सिखाया जाता था। उच्च शिक्षा के अन्तर्गत धर्म, दर्शन, इतिहास भाषा-साहित्य गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, शिल्पकला आदि का अध्ययन कराया जाता था।
• बौद्ध काल में शिक्षण विधियाँ वैदिक कालीन शिक्षण विधियों के समान थी। शिक्षण कार्य मौखिक होता था, प्रश्नोत्तर, वादविवाद, देशाटन आदि के द्वारा छात्र ज्ञान ग्रहण करते थे। प्राकृत एवं पाली भाषा शिक्षण के माध्यम थे व्याख्यान व्याख्या एवं चर्चा तीन विधियों का प्रयोग किया जाता था। कुछ विषयों में प्रयोगात्मक विधि का उपयोग किया जाता था।
• इस काल में अध्यापक छात्र के बीच संबंध अत्यन्त मधुर थे। अध्यापक उनका सम्पूर्ण ध्यान रखते थे तथा उनके सर्वांगीण विकास के लिए प्रयासरत रहते थे. छात्र अध्यापकों की सेवा करते थे।
• बौद्ध मठ के नियमों व अनुशासन का पालन छात्रों के लिए आवश्यक था। ऐसा न करने पर उसे मठ से निष्कासित कर दिया जाता था। गलती करने पर विद्धत सभा में अपने गलत आचरण त्रुटियों को रखना पड़ता था।
• बौद्धकालीन शिक्षा के प्रारम्भिक काल में नारी शिक्षा लगभग उपेक्षित थी परन्तु बाद में महात्मा बुद्ध ने स्त्रियों को भिक्षुणी के रूप में मठों में प्रवेश की अनुमति दी। वह पुरुष भिक्षुओं से अलग रहती थी। कही कही उनके लिए पृथ्क मठों की स्थापना की गई थी। बौद्ध काल में नारी शिक्षा के उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए थी।
• बौद्ध मठ में 12 वर्ष की शिक्षा के पश्चात् उपसम्पदा संस्कार होता था जो वेदिक काल के समावर्तन संस्कार जैसा था। इस संस्कार के पश्चात् सामनेर (विद्यार्थी) पूर्ण भिक्षु बन जाता था। गृहस्थ आश्रम में जाने वाले छात्रों का उपसम्पदा संस्कार नहीं होता था।
• शिक्षा के लिए आय के साधन नहीं थे जो वैदिक कालीन शिक्षा में थे। मठों को निरन्तर वित्तीय सहायता मिलती रहे इसकी व्यवस्था की गई थी। राजकीय सहायता पहले से अधिक बड़ा दी गई थी। शासन का संरक्षण प्राप्त था। राजस्व, धर्मस्व, उपहार, दान, समाज द्वारा सहायता भिक्षा तथा शुल्क आय के प्रमुख साधन थे।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते है कि बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था ने जीवन में पवित्रता एवं सात्विकता पर बल दिया। समाज में भेदभाव को समाप्त किया सभी जाति स्त्री पुरुषों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की। जीवन में संयम तथा अनुशासन लाने का प्रयास किया बौद्धकालीन शिक्षा धार्मिक आध्यात्मिक के साथ-साथ सांसारिक भी थी। इस शिक्षा में प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का उपयोग किया जाता था। किन्तु कुछ वर्षों पश्चात् मठों में अवांछित बाते होने लगी। जीवन बनावटी तथा आडम्बरयुक्त बनने लगा और धीरे-धीरे बौद्ध धर्म भारत से उठ गया।
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