जाति व्यवस्था की विशेषताएं - Features of Caste System
जाति व्यवस्था की विशेषताएं - Features of Caste System
जाति व्यवस्था के संबंध में अनेक विद्वानों ने मत प्रस्तुत किए हैं तथा कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा चिन्हित की गई विशेषताओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है
● गोविंद सदाशिव घुरिए ने जाति व्यवस्था की 6 सामाजिक तथा सांस्कृतिक विशेषताओं का उल्लेख किया है, जो जाति व्यवस्था की संरचना को स्पष्ट तौर पर प्रस्तुत करती है -
1. समाज का खंडात्मक विभाजन
भारतीय जाति व्यवस्था ने समाज को कई खण्डों में बाँट दिया है तथा प्रत्येक खंड के पृथक-पृथक व्यवसाय, प्रस्थिति तथा स्थान आदि को भी निर्धारित कर दिया है। घुरिए बताते हैं कि जाति व्यवस्था द्वारा संचालित समाजों में सामुदायिक भावना अत्यंत ही सीमित हो जाती है तथा वह संपूर्ण समुदाय के प्रति अस्थावान न रहकर एक जाति के सदस्यों के प्रति ही आस्थावान रह जाती है।
एक जाति का नैतिक नियम ही उसकी जाति के प्रति प्रेम सहयोग की भावना है। प्रत्येक सदस्य को इन नियमों के प्रति अपने पद व कार्य का निर्वहन करना होता है। जो भी सदस्य इन नियमों व कर्तव्य बोध आदि के विरुद्ध जाता है, इनकी अवहेलना करता है तो समग्र जाति उस पर जुर्माना लगाती है। कभी-कभी उस व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत भी कर देती है।
2. संस्तरण
जाति व्यवस्था द्वारा निर्धारित किए गए अनेक खंडों में उच्च तथा निम्न का संस्तरण विद्यमान रहता है। यह संस्तरण परंपराओं के आधार पर निश्चित रहता है। इसमें स्थान का निर्धारण जन से होता है तथा व्यक्ति आजीवन एक ही जाति का सदस्य रहता है। जाति व्यवस्था के इस उच्च व निम्न वाले संस्तरण में ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च रहता है, ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय का स्थान दूसरे पायदान पर आता है, इसके बाद वैश्य तथा सबसे निम्न/अंत में शूद्र का स्थान आता है। जन्म पर आधारित होने के कारण यह संस्तरण स्थिर व दृढ़ प्रकृति का होता है।
3. भोजन और सामाजिक सहवास पर प्रतिबंध
जाति व्यवस्था में भोजन व सामाजिक सहवास संबंधी अनेक निषेध पाए जाते हैं। प्रत्येक जाति को किसी अन्य जाति द्वारा तैयार किए गए भोजन को ग्रहण करने की अनुमति नहीं है। जातीय नियमों में पूर्व से ही निश्चित है कि कौन सी जाति किस जाति के यहां भोजन ग्रहण कर सकती है तथा किस जाति के यहां भोजन ग्रहण करना प्रतिबंधित है। ब्राह्मण द्वारा बनाए गए भोजन को सभी जातियों के लोग ग्रहण कर सकते हैं। सबसे अधिक निषेध अछूतों द्वारा बनाए गए भोजन पर हैं। भोजन से संबंधित सभी प्रकार के प्रतिबंध भोजन की प्रकृति पर भी निर्भर करते हैं। हम भोजन को मुख्य रूप से तीन वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं फलाहार ( फल, दूध तथा दूध से निर्मित भोजन) पक्का (तेल अथवा घी में तलकर निर्मित भोजन) तथा कच्चा (पानी में उबले हुए चावल, दाल व रोटियां आदि)। भोजन की प्रकृति के आधार पर सभी जातियों में प्रतिबंध पाए जाते हैं। ये प्रतिबंध स्वरूप नियम ही निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति किस जाति के यहां कौन सा भोजन कर सकता है।
4. सामाजिक एवं धार्मिक निर्योग्यताएं व विशेषाधिकार
जाति व्यवस्था में सभी जातियों के अपने-अपने विशेषाधिकार तथा सामाजिक व धार्मिक निर्योग्यताएं होती हैं। यह स्पष्ट तौर पर विदित है कि सबसे अधिक विशेषाधिकार ब्राह्मण को प्राप्त है तथा सबसे अधिक निर्योग्यताएं अछूतों के लिए निर्धारित हैं। भारत के दक्षिणी क्षेत्रों में अछूतों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वे अस्पृश्य तो थे ही और साथ में वे तथाकथित उच्च जाति के लोगों को अपनी शक्ल भी नहीं दिखा सकते थे। त्रावनकोर, पूना आदि स्थानों पर अछूतों को सड़क पर चलने की अनुमति नहीं थी। इसके अलावा उनका मंदिर में प्रवेश वर्जित था, स्कूल में पढ़ने का अधिकार नहीं था. वे उन कुओं व तालाबों का प्रयोग नहीं कर सकते थे जिनका उपयोग उच्च जाति के लोग करते थे। गावों में अछूतों को किसी प्रकार के सामाजिक-आर्थिक अधिकार प्राप्त नहीं थे तथा उनके निवास स्थान प्रायः गांव से बाहर ही रहते थे।
5. व्यवसाय के अप्रतिबंधित चयन का अभाव
जाति व्यवस्था में व्यवसाय का निर्धारण परंपरागत आधारों से होता था।
जिस व्यक्ति का जन्म जिस जाति में होता था उसी के अनुरूप उसके व्यवसाय का निर्धारण होता था तथा वह आगे चलकर उसी व्यवसाय को करता था। यह व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते थे जैसे ब्राह्मण, धोबी, नाई, कुम्हार, चर्मकार, स्वर्णकार आदि अपने-अपने व्यवसायों में परंपरागत रूप से संलिप्त रहते थे। घुरिए का मत है कि प्रत्येक जाति समूह अपने जातीय व्यवसाय को पैतृक व्यवसाय मानता था तथा इस जातीय व्यवसाय को किसी अन्य लाभकारी व्यवसाय के लिए भी छोड़ना उचित नहीं मानता था। इसके अलावा वह इसलिए भी जातीय व्यवसाय को नहीं छोड़ पाता था क्योंकि अन्य जातीय समूह के लोग अपना पैतृक व्यवसाय किसी अन्य जाति को नहीं करने दे सकते थे।
6. वैवाहिक प्रतिबंध
वैवाहिक प्रतिबंध जाति व्यवस्था की अत्यंत प्रमुख विशेषता है। प्रत्येक जाति को अपनी ही जाति में विवाह संबंध स्थापित करने की अनुमति है। यदि कोई व्यक्ति अपनी जाति से बाहर विवाह संबंध स्थापित कर लेता है
तो उसे तथा उसके माता-पिता को जाति अथवा उप-जाति से बाहर निकाल दिया जाता है। घुरिए ने 'अनुलोम विवाह' के आधार पर अपनी ही उपजाति में विवाह के निषेध के अपवाद के रूप में स्पष्ट किया है। वेस्टरमार्क ने अंतर्विवाह की विशेषता को जाति व्यवस्था के सार के रूप में विश्लेषित किया है।
• एन. के. दत्ता द्वारा निम्न विशेषताएं बताई गई हैं
1. व्यक्ति की जाति जन्म पर आधारित रहती है और व्यक्ति अपने जन्म से मृत्युपर्यंत उसी जाति का सदस्य रहता है।
2. एक जाति के सदस्य अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकते हैं।
3. प्रत्येक जाति में दूसरी जातियों के साथ खान-पान संबंधी निषेध पाए जाते हैं।
4. अधिकांश जातियों के व्यवसाय पूर्व से ही निर्धारित रहते हैं।
5. जातियों में संस्तरण पाया जाता है जो एक जाति को उच्च तथा दूसरी जाति को निम्न का दर्जा प्रदान करती है।
6. संपूर्ण जाति व्यवस्था ब्राह्मणों की श्रेष्ठता पर आधारित रहती है।
5. केतकर ने विभिन्न जातीय समूहों के मध्य संबंधों के अनुकूलन अर्थात् सावयवी संरचना के आधार पर जाति व्यवस्था के दो आधार बताए हैं-
1. वंशगत सदस्यता
2. अंतर्विवाही
इस प्रकार से निम्न बिंदुओं को जाति की विशेषताओं के रूप में समझा जा सकता है-
i. जाति व्यवस्था की सदस्यता जन्म से आधारित होती है और व्यक्ति जीवन पर्यंत उसी जातिगत समूह का सदस्य रहता है।
ii. एक समरूप सदस्यता
III. एक समान वंशानुगत व्यवसाय
iv. संस्तरण
v. विभिन्न जातिगत निषेध और विशेषाधिकार
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