अंतर्वस्तु विश्लेषण विधि की विशेषताएं - Features of Content Analysis Method

 अंतर्वस्तु विश्लेषण विधि की विशेषताएं - Features of Content Analysis Method


अंतर्वस्तु विश्लेषण की उपरोक्त सभी परिभाषाओं में इस विधि की तीन प्रमुख विशेषताओं पर जोर दिया गया है। 


1. वस्तुपरकता - वस्तुपरकता प्रत्येक वैज्ञानिक विधि की एक प्रमुख विशेषता है। वस्तुपरकता से तात्पर्य ऐसे विश्लेषण से है जो कि निश्चित नियमों के आधार पर किया जाता है। जब विभिन्न शोधकर्ता समान संचार संदेशों या दस्तावेजों का अध्ययन करते हैं तो उनके निष्कर्षों में भी समानता होना आवश्यक है। यह वस्तुपरकता की जांच की एक प्रमुख कसौटी है।


संचार की विषय वस्तु का विश्लेषण करते समय वर्गीकरण की क्या योजना होगी, अर्थात वर्ग 'अ' को वर्ग 'ब' से अलग करने के मापदंड क्या होंगे? इनकी क्या परिभाषाएं होंगी? अंतर्वस्तु की इकाई के संबंध में निर्णय किन मापदंडों के आधार पर किया जाएगा?

इन प्रश्नों के बारे में निर्णय करते समय स्पष्ट एवं सुनिश्चित नियम निर्देशों का पालन करना जरूरी है। ये नियम निर्देश शोधकरता की अभिनति को नियंत्रित कर शोध निष्कर्षों को वस्तु पर बनाते हैं। तथ्यों के चयन के मान्य मापदंड एवं निर्देश शोधकर्ता की मनमानी प्रकृति पर नियंत्रण लगा विश्लेषण को वस्तुपरक बनाने में उसकी सहायता करते हैं। मापदंडों की शर्तों के कारण शोधकर्ता अपने अध्ययन में ऐसे तत्वों का समावेश नहीं कर पाता जो उसकी प्राकल्पना का उसकी इच्छा अनुसार समर्थन करने वाले होते हैं।


2. व्यवस्थितता या क्रमबद्धता क्रमबद्धता विषय वस्तु विश्लेषण की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। किसी भी शोध की यह प्राथमिक आवश्यकता होती है कि वह क्रमबद्ध तरीके से किया गया हो।

क्रमबद्धता भंग होने पर शोध की विश्वसनीयता भी बाधित होती है। यह एक प्रकार से सुनिश्चित कार्यप्रणाली पर जोर देती है, अर्थात शोध की क्या प्रक्रिया होगी. इसके क्या चरण होंगे. इन चरणों में कम पता होना आवश्यक है।


3. परिमाणीकरण परिमाणीकरण या परिमाणन प्रक्रिया विषय वस्तु की गणना और सांख्यिकी वर्गीकरण पर जोर देती है, अर्थात संचार की विषय वस्तु को निश्चित संख्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाए। संख्यात्मकता सामग्री को संक्षिप्त रूप प्रदान कर उसे तुलना योग्य बनाती है। संख्यात्मक तथ्यों को समझना भी सरल होता है। जब हम यह कहते हैं कि भारत में 70% पुरुष और 30% स्त्रियां शिक्षित हैं, तब हमारा यह कथन परिमाणात्मकता को ही प्रकट करता है।


4. सामान्यता- शोध अध्ययन के निष्कर्षों की सैद्धांतिक सार्थकता होना भी जरूरी है।

पूर्णता वर्णनात्मक अध्ययनों का कोई विशेष महत्व नहीं होता। ऐसी अध्ययन वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। यदि हम किसी उपन्यास लेखक की पुस्तकों की विषय वस्तु के विश्लेषण के द्वारा निष्कर्ष निकालते हैं कि उक्त लेखक ने अपनी पुस्तकों में गरीबी शब्द का 250 पर प्रयोग किया है, करके विश्लेषण का तब तक कोई विशेष मूल्य नहीं होगा. जब तक हम इस शब्द को विषय वस्तु की कुछ अन्य विशेषताओं अथवा कथानक के पात्रों के चरित्रों आदि के साथ नहीं जोड़ते हैं। संचार की विषय वस्तु का कोई भी तक अब तक अर्थहीन रहता है जब तक उसे किसी अन्य तथ्य के साथ नहीं जोड़ा जाता है और तथ्यों को जोड़ने का यह कार्य सिद्धांत द्वारा किया जाता है।


5. संचार की विषयवस्तु विश्लेषण की विधि- संचार की विषय वस्तु से तात्पर्य उन संकेतों (जो मौखिक, संगीतात्मक, चित्रात्मक, मूर्तिपरक या मुखा भावात्मक हो सकते हैं) के पीछे छुपे अर्थ से जिसके द्वारा संप्रेषण किया जाता है।

हमारा अधिकांश संप्रेषण शाब्दिक या प्रतीकात्मक • व्यव्हार के द्वारा होता है। शाब्दिक संप्रेषण का रूप लिखित या मौखिक हो सकता है। क्या बोला जाता है अथवा क्या लिखा जाता है, इसका मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः मानवीय व्यवहार के अध्ययन में संप्रेषण की अंतर्वस्तु का अध्ययन आवश्यक है। यहां 'अंतर्वस्तु' तात्पर्य उन साधनों से है जिनके द्वारा एक व्यक्ति अथवा कोई समूह दूसरे व्यक्ति या समूह को विचाराभिव्यक्ति करता है।


संप्रेषण का मानवीय अंतरक्रिया में केंद्रीय स्थान है। सभी समूहों, संस्थाओं, संगठनों और यहां तक कि राष्ट्रों का अस्तित्व भी संप्रेषण पर आधारित है। संप्रेषण की कमी के कारण सभी प्रकार के संबंधों ( पति-पत्नी के संबंधों से लेकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक) में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है, व्यवस्थाओं का अस्तित्व डगमगाने लगता है। यही कारण है कि कोहन (1963) में इसे सभ्यता का हृदय कहा है।

अतः मानव इतिहास, व्यवहार, विचार, कला और संस्थाओं के अध्येता के संप्रेषण की प्रक्रिया और निष्पत्तियों का अध्ययन आवश्यक है। संप्रेषण में केंद्रीय स्थान विषय वस्तु का होता है और इसी का अध्ययन अंतर्वस्तु विश्लेषण विधि द्वारा किया जाता है।


6. द्वितीयक तथ्यों के विश्लेषण की एक विधि- इस विधि द्वारा द्वितीयक स्रोत जैसे दस्तावेज, अखबार, पत्रिका में छपे लेख, पुस्तक, पत्र, डायरियों आदि से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है। इस विश्लेषण की प्रक्रिया में तथ्यों का संकेतन वर्गीकरण और सारणीकरण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। द्वितीयक तथ्य वे होते हैं जिनका संकलन अन्य शोधकर्ताओं द्वारा किसी अन्य उद्देश्य किया गया होता है। शोधकर्ता को इस प्रकार के ढेर सारे तथ्य विश्लेषण के लिए उपलब्ध हो सकते हैं।


7. यह गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों प्रकार की एक विधि है- एकहार्ड और हरमन (1977) के अनुसार, एक गुणात्मक विधि के रूप में अंतर्वस्तु विश्लेषण मनोभाव प्रेरणाओं, और मूल्यों जैसी व्यक्तिपरक सूचनाओं का अध्ययन करता है जबकि एक परिमाणात्मक विधि के रूप में इसका प्रयोग किसी घटना की समय- आवृत्ति या समय अवधि के निर्धारण में किया जाता है। एक परिमाणात्मक विधि के रूप में इसके द्वारा व्यक्तियों और समूहों के आचरण उद्देश्यों विचारधाराओं भावनाओं और मूल्यों के बारे में पता लगाया जाता है।


अंतर्वस्तु विश्लेषण : एक संक्षिप्त इतिहास


अंतर्वस्तु विश्लेषण शोध नामक इस नवीन विधि का विकास अभी कुछ वर्षों पूर्व हुआ है। इसके द्वारा जन संचार के साधनों के माध्यम से प्रचारित एवं प्रसारित व गुणात्मक प्रकृति की विषय सामग्री (अखबार, पत्र-पत्रिकाएं, पंपलेट, पुस्तकें, सरकारी गैर सरकारी प्रलेख, दस्तावेज, डायरियां, क्षेत्र प्रलेख) को वैज्ञानिक तथ्यों में बदलने का प्रयास किया जाता है

यद्यपि इसके पूर्व भी इतिहासकार और साहित्य समालोचक आदि अपने-अपने क्षेत्र की सामग्री का विश्लेषण करते रहे हैं किंतु उनके विश्लेषण में आज की इस नवीन विधि की भांति व्यवस्थितता था और वस्तुपरकता की कमी थी। उनका विश्लेषण और अपरिष्कृत व्यक्तिपरक और अवैज्ञानिक अधिक था।


इस विधि का विकास मूलतः आधुनिक सामूहिक संचार के बढ़ते हुए साधनों से हुआ है। इस का सर्वप्रथम प्रयोग पत्रकारिता के क्षेत्र में और बाद में समाजशास्त्र में हुआ। ऐसा माना जाता है कि इन का सर्वप्रथम प्रयोग मेलकॉम बिल्ले ने सन 1926 में समाचार पत्रों की विषय सामग्री के विश्लेषण में किया। लगभग इसी समय सन 1930 में वुडलैंड ने अमेरिकी प्रातः कालीन समाचार पत्रों की विषय सामग्री (विशेषता विदेश के समाचारों) के विश्लेषण में इस विधि का प्रयोग किया।

इस प्रकार के सभी अध्ययनों में विषय सामग्री के विश्लेषण में प्रत्यक्ष वर्गों जैसे राजनीति, खेलकूद, घरेलू समस्या, श्रम, अपराध, और तलाक आदि का प्रयोग किया गया। समाचार पत्रों के अलावा साहित्य के क्षेत्र में अंग्रेजी गद्य व पद्य की विभिन्न शैलियों की विशेषताओं के विश्लेषण में भी इस विधि का बहुत प्रयोग किया गया।


इस विधि का प्रयोग धीरे-धीरे राजनीति विज्ञान और जनमत अध्ययनों में भी किया जाने लगा। सन 1930 के बाद एच.डी. लासवेल तथा उनके साथियों ने अपने कई अध्ययनों में इस विधि का प्रयोग किया। लगभग इसी समय कोलंबिया विश्वविद्यालय में पॉल. एफ. लेजार्सफील्ड के नेतृत्व में रेडियो द्वारा प्रसारित सामग्री के विश्लेषण का कार्य प्रारंभ हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध की कालावधी में कई पो सरकारी विभागों ने जनसंचार के विश्लेषण में रुचि प्रदर्शित की। आजकल इस विधि का प्रयोग अधिकांश पर निम्न क्षेत्रों में प्रमुख रूप से किया जा रहा है:


1. व्यक्तिगत दस्तावेजों का विश्लेषण


2. असंगठित साक्षात्कार ओं का विश्लेषण


3. प्रचिती परीक्षणों के प्रति तरों का विश्लेषण


4. रोगियों के निदानात्मक दस्तावेजों का विश्लेषण