मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएँ - Features of Marx's Dialectical Materialism

मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएँ - Features of Marx's Dialectical Materialism


मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की कुछ आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें मार्क्स ने तत्त्वशास्त्र का विशेष उल्लेख किया है। तत्त्व-शास्त्र भाववादी दर्शन का एक प्रमुख अंग है और प्रकृति जगत सत्ता आत्मा तथा विचार चेतना की उत्पत्ति आधार और स्वरूप आदि की विवेचना इसकी प्रमुख वस्तु है। मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद इससे ठीक विपरीत है। मार्क्स के अनुसार जीवन और जगत का परम सत्य भौतिकवाद है आत्मा और ईश्वर का अस्तित्व नहीं है इनका विचार केवल कपोल कल्पित है। चेतना का आधार भौतिक है। बिना भौतिक चेतना का आधार भौतिक है। बिना भौतिक के चेतना अस्तित्व में नहीं आ सकती। मार्क्स के अनुसार राज्य और संगठित धर्म शोषण और उत्पीड़न के हथियार है और भाववादी दर्शन ने उन्हें पुष्ट बनाया है। 


(1 ) तत्वशास्त्र के विपरीत मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद प्रकृति अथवा ब्रह्मांड की वस्तुओं और घटनाओं को आकस्मिक मात्र नहीं मानता। ये घटना प्रवाह विच्छित्र पृथक और स्वतंत्र नहीं है परंतु एक • सुसंबद्ध तथा पूर्णतया समग्र और अविछिन्न इकाई है। विभिन्न घटनाएँ और वस्तुएँ आतंरिक रूप से एक दूसरे से सावयवी रूप से संयुक्त संबंधित और एक-दूसरे पर निर्भर है।

इसका तात्पर्य यह हुआ कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार प्रकृति और मानव समाज की वस्तुएँ और घटनाएँ अचानक ही अथवा के किसी विशेष आध्यात्मिक शाक्ति द्वारा नहीं घटती किंतु वे निश्चित वस्तुगत नियमों के द्वारा संचालित होती है। प्रकृति में जब ज्वालामुखी का विस्फोट होता है। तो ऐसा निश्चित प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही होता है। उसी प्रकार जब समाज में कोई जबरदस्त प्रक्रिया के नियमों के अंतर्गत होता है। विज्ञान और दर्शन का एक प्रमुख कार्य प्राकृतिक और सामाजिक घटनाओं के नियमों को खोज करके उन्हें मानव के उपयोग में लाना है। इस प्रकार मार्क्स की द्वंद्वात्मक प्रणाली के अनुसार प्रकृति की किसी भी वस्तु अथवा घटना को अन्य वस्तुओं या घटनाओं से पृथक असंबद्धित तथा स्वतंत्र रूप से कभी नहीं समक्ता जा सकता है। प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु से संबंधित होती है और प्रत्येक घटना दूसरी घटनाओं के चक्र से घिरी रहती है। उन सबका प्रभाव प्रत्येक पर, और प्रत्येक का प्रभाव सब पर होता है घटना प्रवाह का समक्ता जाना अथवा उसकी व्याख्या करना इस अटूट संदर्भ में ही हो सकता है। इसके बिना घटना अर्थहीन ही रहती है और उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना संभव नही हो पाता।


( 2 ) तत्वशास्त्र के विपरीत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मान्यता है कि प्रकृति सएक स्थिर गतिहीन अपरिवर्तनशील और चिंतन अवस्था नहीं है वरन् प्रकृति सतत् गतिशाल परिवर्तनशील और नवीन विकास की दशा है

प्रकृति परिवर्तित तथा परिमार्जित अवस्था है जिसमें कुछ वस्तुओं का सदैव उद्भव और विकास और कुछ की अवनति और विनाश होता रहता है सबसे महत्व की वस्तु उदभुत और विकसित होती वस्तु है जन्म और निर्वारण की निरंतर दशा ही प्रकृति है। स्टालिन के अनुसार "द्वंद्वात्मक प्रणाली उसी को अजेय मानती है जो उग रहा हो और विकासमान हो। द्वंद्वात्मक प्ररणाली के अनुसार घटनाओं और वस्तुओं की विवेचना न केवल उनके अंतः संबंध और अंतः निर्भरता को ध्यान में रखकर की जानी जाए अपितु उसमें उनके गति परिवर्तन उदभुव और विकास तथा विनाश को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। वास्तव में संसार में कोई भी वस्तु या घटना शाश्वत चिर अथवा स्थाई नहीं है एंजिल्स ने लिखा है कि समस्त प्रकृति छोटे से लेकर बड़े तक बालू करण से लेकर सूर्य तक बाह्याड से लेकर व्यक्ति तक आने और चले जाने की एक निरंतर स्थिति में निरंतर प्रवाह में अनवरत गति तथा परिवर्तन की स्थिति में है।


संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि इस संसार और प्रकृति में सब कुछ अस्थाई गतिशील तथा परिवर्तनशील है। एंजिल्स के अनुसार मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद वस्तुओं और उनके गोचर प्रतिरूपों को तत्वरूप से एक-दूसरे से संबंधित उनके संयोग उनकी गतिशीलता और उनके जन्म और निर्वारण की दशा में देखता है।


( 3 ) तत्वशास्त्र के ग्राम विद्वान प्रकृति के विकास की प्रक्रिया को सरल और किसी आध्यात्मिक तत्व के द्वारा किसी ने किसी रूप में निर्धारित मानते हैं इसके विपरीत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार विकास की प्रक्रिया सरल और सीधी रेखा की भाँति नही होती। परिमारणात्मक परिवर्तनों से उत्पन्न होती है। छोटे से छोटे परिमारणात्मक परिवर्तन से बड़े से बड़ा गुणात्मक परिवर्तन संभव है। इस गुणात्मक परिवर्तन प्रकार का विकास या परिवर्तन धीरे-धीरे अथवा सरल तरीके से नहीं होता लेकिन शीघ्रता से और एकाएक होता है और यह धीरे-धीरे होते रहने वाले संचय का ही स्वाभाविक फल है। ये परिवर्तन एक स्थिति से दूसरी में छलाँग की तरह होते हैं ऐसा आकस्मिक नहीं होता वरन परिमाराणात्मक परिवर्तनों के संचित होने के स्वाभाविक परिणाम स्वरूप होता है। तेजी से होने वाले यह परिवर्तन किसी चक्र में ही घुमने वाली गति की तरह नही होती इंडवाद के अनुसार विकास की गति निरंतर आगे बढ़ती हुई होती है। पुरानी गुरणात्मक दशा में एक नई गुणात्मक दिशा की ओर आगे बढ़ते रहना ही विकास का सिलसिला है यह एक ऐसा विकास है जो सरल से जटिल निम्न से उच्च स्तर और साधारण से संश्लिष्ट की ओर होता है। परिमाण का परिवर्तन युग के परिवर्तन की ओर बढ़ता है। परिमाण के गुण में बदलते ही छलाँग पूरी हो जाती है।


(4) तत्वशास्त्र ईश्वर आत्मा और प्रकृति को निश्चल, विरोधरहित तथा शुद्ध मानता है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार सभी प्राकृतिक और सामाजिक वस्तुओं तथा घटनाओं में आतंरिक विरोध निहित है। और ये इनमें अंत निष्ठ होते हैं। प्रत्येक वस्तु अथवा घटना का निषेधात्मक और सकारात्मक वाद और प्रतिवाद विकास और विनाश पक्ष होता है। विकास आतंरिक विरोध या संघर्ष द्वारा ही संचालित होता है। लेनिन के अनुसार अपने सही अर्थों में द्वंद्ववाद वस्तुओं के मूल तत्व में असंगतियों का एक अध्ययन है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कार्ल मार्क्स के अनुसार नवीन और पुरातन का चिर संघर्ष विकास क्रम की आतंरिक अंतर्वस्तु है। प्रगति शांतिमय नहीं होती। प्रत्येक विकास की प्रक्रिया में वाद प्रतिवाद और संवाद की तीनों की अवस्थाएँ होती है एक अवस्था अपनी पूर्ववर्ती अवस्था का निषेध होती है और फिर धीरे-धीरे उसमें भी विरोध सक्रिय हो जाता है उसका भी निषेध करके एक और नई अवस्था को जन्म देते हैं इस प्रकार निषेध का निषेध के नियम की प्रक्रिया चलती रहती है।


(5) भौतिक आदर्शवाद की भाँति यह विश्वास नहीं करता की संसार निरपेक्ष विचार विश्वात्मा का मूर्त रूप है। इसके विपरीत मार्क्सवादी भौतिकवाद के अनुसार संसार स्वय अपनी प्रकृति से भौतिक है सारी अगणित घटनाओं का आधार गतिशील भौतिक तत्व अथवा पदार्थ है जो कि अपने आतंरिक स्वभाव द्वारा विकसित होकर आदि रूप में प्रकट होता है यह विकास भौतिक पदार्थ में नही एकान्तरिक विरोध द्वारा संचालित होता है।


आदर्शवाद के अनुसार हमारी चेतना विचार प्रत्यक्ष दर्शन उपलब्धि और अनुभूति में ही भौतिक जगत प्रकृति और जीव का अस्तित्व है। इसके विपरित मार्क्सवाद के अनुसार पदार्थ प्रकृति और जीव वैषयिक वास्तविकता है जिसका कि अस्तित्व हमारी चेतना आदि से बाहर और उससे परे है। पदार्थ प्रमुख है क्योंकि यह अनुभूति विचार चेतना का स्त्रोत है। चेतना गौण है। क्योंकि यह पदार्थ का ही प्रतिबिंब मात्र है। मार्क्स ने स्वयं लिखा है पदार्थ चेतना की उपज नहीं है वरन चेतना स्वय पदार्थ की ही सर्वश्रेष्ठ उपज मात्र है। विचार को पदार्थ से जो सोचता है पृथक करना असंभव है पदार्थ प्रत्येक प्रकार के परिवर्तनीय है।


इस प्रकार हम देखते हैं कि मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मूल मान्यता यह है कि विश्व का आधार भौतिक तत्व या पदार्थ है जो कि अपने आतंरिक स्वभाव द्वारा विकसित होकर आदि रूप धारण कर लेता है। यह विकास भौतिक पदार्थ में स्वाभाविक रूप से ही निहीत एक आतंरिक विरोध द्वारा संचालित होता है

और इसमें वाद प्रतिवाद और संवाद में तीन अवस्थाएँ होती है। विकास की यह प्रक्रिया सार्वभौमिक और निरंतरण है साथ ही विकास की प्रक्रिया सरल और सीधी नहीं होती। बल्कि एक बिंदु पर आकर एकाएक तीव्रता से विस्फोट की भाँति होती है। यही सामाजिक परिवर्तन में क्रांति की स्थिति होती है। क्रांति न टाली जा सकने वाली एक सामाजिक घटना है और प्रत्येक क्रांति के पश्चात एक नवीन सामाजिक अवस्था का जन्म होता है। प्रत्येक भौतिक पदार्थ अपने आतंरिक स्वभाव द्वारा ही अपने प्रतिवाद को जन्म देता है। इसके फलस्वरूप जो संघर्ष वाद प्रतिवाद में होता है। उसमें ही प्रत्येक प्रकार के परिवर्तन या विकास का समस्त रहस्य छिपा हुआ है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का क्रांतिकारी स्वरूप इसी से स्पष्ट हो जाता है। क्योंकि इसमें इस बात पर अत्यधिक बल दिया गया है कि जो कुछ भी परिवर्तन या विकास होता है। वह आतंरिक विरोध व संघर्ष द्वारा ही होता है यही प्रकृति का विकास या परिवर्तन का चाहे वह सामाजिक हो या प्राक्रतिक अटूट नियम है।


इसमें प्रकार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सामान्य महत्व हमें परिवर्तन या विकास की प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों और उनके पारस्परिक संबंधों में ही नहीं बल्कि इन परिवर्तन के आतंरिक कारणों में भी दिखाई देता है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद हमें यह स्पष्ट करता है। कि संसार की कोई भी प्रघटना अलग-अलग नहीं है श्रपितु समस्त घटनाओं के बीच अंत संबंध पाया जाता है और वे आपस में अंत निर्भर भी होती है। मार्क्स ने स्वयं इस बात की विवेचना की कि हीगल के समय में द्वंद्वात्मक अपने रहस्यात्मक अर्थात् अटकलपच्चू रूप में एक फैशन की तरह इसे द्वंद्ववाद को हर चीज में लागू कर दिया जाता था परंतु अपने वास्तविक स्वरूप में अर्थात् वैज्ञानिक भौतिकवाद रूप में वह पूँजीपतियों और उनके समर्थकों के बीच एक चेतावनी के रूप में काम करने लगा था क्योंकि उसकी सहायता से जहाँ हम एक और विद्यमान सभी चीजों के विषय में प्रत्यक्ष बोध को संपन्न बनाते हैं वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट होता है कि प्रत्येक वस्तु का एक विरोधी तत्व पाया जाता है जो निश्चित स्तर आने पर प्रस्फुटित होता है और उसके बाद एक नई वस्तु का जन्म होता है इस नई वस्तु में पुरानें और नए दोनों का समन्वय होता है।


इस प्रकार हम देखते हैं कि मार्क्स ने अपने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद सिद्धांत को हीगल के आदर्शवाद और भाववादी विचारों के खिलाफ अपने भौतिकवादी सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें उन्होनें वाद प्रतिवाद और सवांद की विवेचना के द्वारा द्वंद्व की विस्तार से व्याखा की। भौतिक पदार्थ ही मार्क्स के लिए सर्वेसर्वा थे। मार्क्स की यह दृढ मान्यता थी कि इन भौतिक पदार्थ में एक प्रकार का आतंरिक विरोध होता है। जिसमें वाद प्रतिवाद के बाद संवाद की अवस्था आती है और प्रत्येक प्रकार के परिवर्तन या विकास में यह रहस्य छुपा रहता है मार्क्स ने अपने सिद्धांत की पुष्टि अनेक ऐतिहासिक तथ्यों के द्वारा की हैं इस प्रकार मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत एक अनुपम सिद्धांत है।