स्त्रीवाद - Feminism

स्त्रीवाद - Feminism


स्त्रीवाद एक मुक्तिकामी राजनीतिक सिद्धांत और जीवंत आंदोलन है जो स्त्री अधीनता के कारणों का पता लगाता है और स्त्रियों को अपने जीवन पर नियंत्रण और सत्ता दिलाने का प्रयास करता है। स्त्रीवाद अखंड (मोनोलिथिक) दृष्टिकोण नहीं है। स्त्रीवादी सिद्धांत में अनेक धाराएँ जन्मी और उन्होंने स्त्री अधीनता के बेहतर विश्लेषण और स्त्री मुक्ति के उपाय हेतु कई विचारगत और अवधारणागत औजार प्रदान किए हैं इनमें उदारवादी स्त्रीवाद, मार्क्सवादी स्त्रीवाद, रेडिकल स्त्रीवाद आदि हैं। जेंडर, यौनिकता और पितृसत्ता जैसे औजार और अवधारणाएँ जो स्त्रीवादी सिद्धांत द्वारा विकसित की गई उनका उपयोग अनेक इतिहासकारों द्वारा स्त्रियों के इतिहास के नए तथ्यों का पता लगाने में किया गया है।


इस बिंदु पर स्त्रीवादी इतिहास ने वर्ग जाति, जेंडर और पितृसत्ता जैसे नए सामाजिक विचारों को खंगालने का प्रयास किया और स्त्री इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान किया।

स्त्रीवादी विद्वान/विदूषियों ने ए.एस. अल्तेकर के स्त्री की स्थिति दृष्टिकोण से अपने नजरिए को बदला और स्त्री अधीनता एवं इस अधीनता को संभव बनाने वाली संरचना और मूलभूत प्रश्नों पर ज्यादा जोर देना शुरू किया। समाज विज्ञानियों ने महसूस किया कि स्त्री अधीनता को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक कि हम समाज में स्त्रियों के इतिहास का अध्ययन और विश्लेषण नहीं कर लें। साथ ही धर्म, कानून, संस्कृति और अर्थशास्त्र की प्रक्रिया और सामाजिक संरचनाओं, उत्पादन एवं पुर्नउत्पादन की विभिन्न प्रक्रियाओं के साथ इसके रिश्ते को समझना भी जरूरी है।


स्त्रीवादी विद्वानों/विदूषियों ने ज्यादा सार्थक प्रश्न उठाने शुरू किए। अतीत में स्त्रियों की अधीनता क्यों रही और किस समय से समाज में उनकी स्थिति में पतन शुरू हुआ? क्या अतीत में स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त थे? विभिन्न समयों में समाज में किस तरह के जेंडर रिश्ते विद्यमान थे? स्त्रियों उत्पादन और पुर्नउत्पादन व्यवस्था में किस तरह भाग लेती थी?