स्त्रीवादी आलोचना - Feminist Criticism

स्त्रीवादी आलोचना - Feminist Criticism


मानवविज्ञानी सैली स्लोकम ने शिकारी पुरुष के तर्क को पुरुष पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच का परिणाम माना है। उनका मत है कि यदि हम यह मान लें कि मानव शिशु को अपेक्षाकृत लंबी अवधि तक देखभाल की ज़रूरत पड़ने लगी और स्त्रियाँ आवास पर ही ज्यादा समय व्यतीत करने लगीं तो यह निष्कर्ष निकालना अधिक तर्कसंगत होगा कि उन्होंने इस समय का अपने और बच्चों के लिए ज्यादा-से-ज्यादा कंद मूल फल एकत्र करने और अन्य उन रचनात्मक गतिविधियों में सदुपयोग करना शुरू कर दिया होगा जो मानव-सभ्यता के विकास के लिए ज़रूरी सिद्ध हुए।


यदि हम यह स्वीकार कर लें कि पुरुष की मूल प्रवृत्ति 'शिकारी' है और इसी ने मानव-विकास में निर्धारक भूमिका निभाई है तो हमें यह मानना पड़ेगा कि समूची मानव सभ्यता आक्रामकता और हिंसा की बुनियाद पर टिकी है। गर्दा लर्नर कहती हैं कि थोड़ी देर के लिए यदि हम यह मान भी लें कि पाषाणकालीन अवस्था में मानव प्रजाति को विकास की राह पर बचाए रखने के लिए पुरुषों को आक्रामक होने और स्त्रियों को प्रजनन के मोर्चे पर लगातार जुटे रहने की ज़रूरत रही होगी। लेकिन,

आज हम पल भर में समूचे मानव प्रजाति को नष्ट कर देने की क्षमता रखने वाले अस्त्रों के युग रह रहे हैं। इसके साथ ही, जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि और सिकुड़ रहे सीमित प्राकृतिक संसाधन ने भी मानव के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा रखा है। इन दो स्थितियों को ही ध्यान में रखें तो मानव प्रजाति को बचाए रखने के लिए जरूरी तर्क के हिसाब से पुरुष को अनाक्रामक और स्त्री को प्रजनन के मोर्चे पर सक्रिय हो जाना चाहिए।


वैसे भी सामान्य बोध के स्तर पर भी पुरुष के स्वभावत: आक्रामक होने की दलील हजम नहीं होती। हम दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपने आस-पास ऐसे ढेरों पुरुष पा सकते हैं जो अत्यंत शांत और अहिंसक होते हैं। आखिर, महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी या ईसा मसीह पुरुष ही तो थे।


इतिहासकार गर्दा लर्नर के अनुसार, शिकार-संग्रह अवस्था के समाजों के मानव-वैज्ञानिक साक्ष्यों ने भी यह जाहिर किया है कि ये समाज भोजन के लिए मुख्य तौर पर स्त्रियों और बच्चों के खाद्यसंग्रह और छोटे-छोटे शिकारों पर निर्भर करते हैं

न कि पुरुषों के बड़े शिकारों पर। इसके साथ ही, स्त्रीवादी मानव विज्ञानियों ने यह तथ्य भी उद्घाटित किया है कि शिकार-संग्रह अवस्था में स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं; उनके बीच भले ही श्रम का विभाजन रहता है, लेकिन एक के श्रम को दूसरे से हीन नहीं माना जाता। ऐसे समाजों में स्त्री और पुरुष के बीच समानता की स्थिति पाई गई।


स्त्रीवादी विद्वानों की इस व्याख्या की पुष्टि मध्य भारत के भीमबेटका की गुफाओं में ईसा पूर्व 5000 (मध्यपाषाणकालीन) की मिली चित्रकारी भी करती हैं। चित्रों में स्त्रियों को फल और खाद्य पदार्थ बटोरने के साथ-साथ टोकरी और जाल द्वारा मछली पकड़ने जैसे छोटे-मोटे आखेट करते हुए भी चित्रित किया गया है। एक स्त्री के कंधे से टोकरी लटक रही है, जिसमें दो बच्चे हैं और उसके सिर पर एक पशु लदा हुआ है। भारत में पितृसत्ता के निर्माण और उसके स्वरूप पर कार्य करने वाली इतिहासकार उमा चक्रवर्ती कहती हैं कि इससे यह जाहिर होता है कि कैसे स्त्रियाँ एक साथ माँ और संग्रहकर्ता दोनों ही भूमिकाएँ निभाती थीं। एक अन्य स्त्री हिरण का सींग पकड़कर खींच रही है, तो एक मछली पकड़ रही है। टोकरी लिए हुई स्त्रियों को प्राय: गर्भवती ही चित्रित किया गया है। सामूहिक शिकार दृश्यों में भी स्त्रियाँ शरीक होती चित्रित की गई हैं। उमा के मुताबिक, अनुमानतः कहा जा सकता है कि शिकार की सफलता के लिए उनकी सांकेतिक और वास्तविक दोनों स्तरों पर भागीदारी थी। चित्रकारी में गर्भवती स्त्रियों, माँ की भूमिकाएँ निभाती स्त्रियों और प्रसव के कतिपय चित्रण के आधार पर वे इस नतीजे पर पहुँची हैं कि स्त्रियों की प्रजनक भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जाता था।