क्षेत्र प्रयोग विधि , गुण - Field Application Method, Properties

 क्षेत्र प्रयोग विधि , गुण - Field Application Method, Properties


प्रयोग विधि प्रयोगात्मक विधि कि दूसरी प्रमुख प्रविधि है जिसका प्रयोग मनोवैज्ञानिकों द्वारा अधिक किया गया है। इस विधि की आवश्यकता कुछ ऐसे सामाजिक व्यवहार के अध्ययन में महसूस की गई है जिसे प्रयोगशाला प्रयोग विधि द्वारा अध्ययन सामान्यतः नहीं किया जा सकता था। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है भीड़, क्रांति, राजनैतिक आंदोलन कुछ ऐसी सामाजिक समस्याएं हैं जिन्हें प्रयोगशाला में अध्ययन नहीं किया जा सकता है। फिर भी समाज मनोवैज्ञानिक इन समस्याओं का अध्ययन करना चाहते थे फलतः वे लोग क्षेत्र प्रयोग विधि का प्रतिपादन किए हैं। इस विधि में किसी सामाजिक व्यवहार का अध्ययन प्रयोगशाला में न कर के वास्तविक परिस्थिति में जिसे समाज मनोवैज्ञानिकों ने क्षेत्र कहा है, किया जाता है। प्रयोग करता इसी वास्तविक परिस्थिति में स्वतंत्र चर में जोड़ तोड़ करता है तथा उसका प्रभाव आश्रित चर पर देखता है। फिशर (1982) ने क्षेत्र विधि को परिभाषित करते हुए कहा कि "क्षेत्र प्रयोग में शोधकर्ता वास्तविक सेटिंग में स्वतंत्र चर को देकर या उसमें जोड़ तोड़ कर एक तरफ से हस्तक्षेप करता है और बाद में आश्रित चर पर पड़ने वाले प्रभावों की माप करता है।" क्षेत्र प्रयोग विधि के कुछ गुण तथा दोष है निम्नलिखित हैं


क्षेत्र प्रयोग विधि प्रमुख गुण 


(i) इस विधि में प्रयोग चुकी वास्तविक परिस्थिति मे किया जाता है, अतः इससे प्राप्त परिणाम जीवन के वास्तविक हालातों के लिए अधिक सही होता है।


(ii) इस विधि में प्रयोगशाला प्रयोग विधि के ही समान स्वतंत्र चरों को जोड़-तोड़ किया जाता है तथा

यथासंभव बहिरंग चरो को भी नियंत्रित करके रखा जाता है। 

इस विधि के कुछ प्रमुख दोष निम्नांकित हैं- 


(i) क्योंकि क्षेत्र प्रयोग वास्तविक परिस्थिति में किया जाता है, अतः प्रयोग करता सभी तरह के बहिरंग

का नियंत्रण उस सीमा तक नहीं कर पाता जिस सीमा तक एक प्रयोगशाला प्रयोग करता प्रयोगशाला में कर पाता है।


(ii) क्षेत्र प्रयोग विधि में कभी-कभी स्वतंत्र चरणों में तोड़ करना कठिन हो जाता है। फलस्वरूप प्रयोग करता को लाचार होकर इस विधि का परित्याग कर प्रयोगशाला प्रयोग विधि अपनाना पड़ता है।