मुस्लिम विवाह के भेद - Form of Muslim Marriage
मुस्लिम विवाह के भेद - Form of Muslim Marriage
मुस्लिम विवाह चार प्रकार के होते हैं।
1. निकाह (Permanent Marriage ) :- निकाह को सही विवाह भी कहते हैं। ये साधारणतः स्थायी प्रकृति में होते हैं और पति-पत्नी की पारस्परिक सहमति से होते है तथा विच्छेद नहीं होने तक चलते रहते हैं। ऐसे विवाह मुस्लिम रीति-रीवाजों के अनुसार संपन्न होते हैं मुस्लिम लोगों में विवाह का यह प्रकार सबसे अधिक प्रचलित है। सुन्नियों में विवाह के इसी प्रकार को मान्यता प्रदान की जाती है।
2. मुताह (Temporary Marriage) :- यह अस्थायी प्रकार का विवाह है और केवल मुस्लिम समाज में ही मान्य है। मुस्ल्मि में सुन्नियों के अनुसार केवल स्थायी विवाह (निकाह) हो सकता है, परंतु शिया लोगों के अनुसार अस्थायी विवाह भी हो सकता है। जिसे मुताह (Mutah) कहते हैं। ऐसे विवाह ईरान आदि शिया देशों में पाये जाते हैं। मुताह विवाह के लिए यह आवश्यक है
कि सहवास का समय निश्चित हो अर्थात् यह पहले से तय कर लिया जाता है कि यह विवाह एक दिन एक मास, एक वर्ष या कितनी अविध के लिए किया गया है। अवधि पूर्ण होने पर ऐसा विवाह स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
पति-पत्नी चाहे तो ऐसे विवाह को स्थायी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। ऐसे विवाहों में मेहर का निश्चित रूप से उल्लेख किया जाता है। मेहर के निश्चित होने के उपरांत भी सहवास का समय अनिश्चित होने पर ऐसे विवाह अवैध माने जाते है। जहाँ सहवास न किया गया हो तो भी ऐसे विवाह वैध माने जाते हैं। ऐसे विवाहों से उत्पन्न बच्चों का पिता की संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार होता है परंतु पत्नी को न तो पति की संपत्ति में कोई हिस्सा प्राप्त होता है और न ही पति से भरण-पोषण का अधिकार मिलता है। ऐसे विवाह की अवधि के पूर्ण होने से पहले ही यदि पति-पत्नी से छोड़ना चाहे तो उसे मेहर की पूरी राशि चुकानी पड़ती है। यदि पत्नी विवाह की अवधि समाप्त होने से पूर्व ही पति के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त करना चाहे तो उसे मेहर का कुछ भाग छोड़ना पड़ता है। डॉ. कपाड़िया का मानना था कि कानूनी तौर पर शिया लोगों को ऐसे विवाह की आज्ञा प्राप्त होने पर भी भारतवर्ष में इसका प्रचलन नहीं पाया जाता है।
इस्लाम का रुख तो मुताह के विरुद्ध रहा है। मुहम्मद साहब ने ऐसे विवाह को वेश्यावृत्ति की बहन कहा है। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्व काल में अरब समाज में ऐसे विवाहों का प्रचलन होने से उन्हें मुताह के लिए अपनी स्वीकृति देनी पड़ी।
3. फासिद विवाह (Irregular Marriage):- विवाह के बीच कोई कठिनाई आए अर्थात् किन्हीं कारणों से कुछ अनियमितताएं रह जाएं और उन्हें दूर किए बिना ही विवाह कर लिया जाए तो ऐसे विवाह को फासिद विवाह कहते हैं। ऐसे विवाह में आने वाली कठिनाईयों या अनियमितताओं को दूर करने पर विवाह नियमित माने जाते हैं। जैसे यदि कोई मुसलमान पाँचवी स्त्री से किसी मूर्ति पूजक स्त्री से या बिना गवाहों की उपस्थिति के विवाह कर ले तो ऐसा विवाह फासिद विवाह कहलाता है। ऐसा विवाह उस समय “सही विवाह" या नियमित विवाह हो जाता है। जब इस विवाह में आयी अनियमितता को दूर कर दिया जाता है। जैसे- पाँच स्त्री में से किसी एक को तलाक दे दिया जाय स्त्री अपना धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम धर्म अपना ले या बाद में गवाहों की गवाही ले ली जाए।
4. वातिल या अवैध विवाह:- मुस्लिम समाज में वह विवाह जो शरीयत अधिनियम की शर्तों के अनुसार नहीं किया गया हो अथवा दूसरे शब्दों में किसी कारणवश विवाह के पूर्व या विवाह के पश्चात् ऐसे तथ्यों का ज्ञान हो जो विवाह की वैधता पर प्रहार करता हो किंतु तब भी पति-पत्नी के संबंधों को न रोका जा सकता हो अथवा वे आपस में तलाक होने पर राजी न हो तो ऐसे विवाह को अकबर या अवैध विवाह कहा जाता है। बातिल विवाह का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है- अकबर तथा जोधाबाई का विवाह प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री नर्गिस व सुनीलदत्त का विवाह भी इसी श्रेणी में आता है।
वार्तालाप में शामिल हों