अनुकूलन के प्रारूप या प्रकार - Format or Types of Customization
अनुकूलन के प्रारूप या प्रकार - Format or Types of Customization
मर्टन का मत है कि जब सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों में असामंजस्य की स्थिति रहती है या जिसे हम नियमहीनता की स्थिति कहते हैं. तो व्यक्ति संस्थागत नियमों के विपरीत भी किसी भी प्रकार सांस्कृतिमक लक्ष्यों की प्राप्ति करने का प्रायास करता है। विभिन्न व्यक्ति अपनी-अपनी परिस्थितियों के संदर्भ में भिन्न-भिन्न प्रकार के अमान्य और अस्वीकृत साधनों का प्रयोग करते हैं और सामाजिक पर्यावरण के साथ अनुकूलन करते हैं। मर्टन के अनुसार अनुकूलन के ये प्रकार वैयक्तिक अनुकूलन है। इस प्रकार के अनुकूलन के उसने पाँच प्रकार बताए हैं
(अ) अनुरूपना
(ब) प्रवर्तन
(स) कर्मकांडीयता
(द) प्रत्यावर्तन
(य) विद्रोहा
(अ) अनुरूपता अनुरूपता वह अनुकूलन है जो व्यक्ति समाज के सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों से करता है। जब समाज में नियमबद्धता पाई जाती है और उसके सांस्कृतिक लक्ष्यों एवं संस्थागत नियमों में सामंजस्य पाया जाता है. तो व्यक्ति इनके अनुरूप व्यवहार करते हैं। व्यक्ति सांस्कृतिक लक्ष्यों को अपने उद्देश्य मानते हैं और संस्थागत नियमों के द्वारा उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। अनुरूपता आदर्श व्यवहार का लक्षण है।
(ब) प्रवर्तन अनुरूपता तो आदर्श व्यवहार है। प्रवर्तन को ही मर्टन नियमहीनता की स्थिति सांस्कृतिक लक्षं को तो मानते एवं अपनाते हैं, परंतु उनको प्राप्त करने के लिए निर्धारित संस्थागत नियमों को नहीं अपनाते हैं, अपतुि उनके स्थान पर नए संस्थागत नियम नहीं स्वीकार किए जाते हैं।
जब लक्ष्य मुख्य हो जाते हैं और साधन गौण, तो लक्ष्यों की प्राप्ति में किसी भी प्रकार के साधन प्रयोग किए जा सकते हैं। लक्ष्य है धन कमाना चाहिए या अर्जित करना चाहिए। यदि साधनों को गौण रखा गया, तो फिर धन किसी भी प्रकार कमाया जा सकता है। डाका डालना, चोरी करना, गबन करना, जालसाजी करना, धोखा देना, जेबकाटी करना, चोरी-बाजारी करना, रिश्वत लोना आदि भी धन कमाने के साधन हैं। श्वेत वस्त्रों अपराध इसी नियमहीनता के कारण पनपते हैं। ये नए मार्ग हैं जो व्यक्ति अपनाते हैं। मर्टन के अनुसार प्रवर्तन की दो प्रमुख विशेषताएँ है -
(1) सांस्कृतिक लक्ष्य एवं मूल्य सफलता की प्रेरणा प्रदान करते हैं, और
(2) कुछ वर्ग के लिए सामाजिक संरचनाएँ इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधनों को सीमित कर देती हैं। ऐसी स्थिति में नियमहीनता बड़े पैमाने पर पनपती है।
(स) कर्मकांडीयता कर्मकंडीयता, प्रवर्तन की विरोधी स्थिति है। कर्मकांडीयता में व्यक्ति सांस्कृतिक लक्ष्यों को नहीं स्वीकार करता, परंतु संस्थागत नियमों का कठोरता से पालन करता है और उन्हें स्वीकार करता है। व्यक्ति (संसार में आगे बढ़ने के लक्ष्यों को स्वीकार करता हैं। पर संस्थागत नियमों को स्वीकार करता है। कर्मकांडीयता खतरों से बचने की एक सुरक्षा-पद्धति है। व्यक्ति केवल उतना करता है जितना अनिवार्य है। इसमें प्रदर्शन की मात्रा अधिक रहती है। इसमें व्यक्ति उतना ही कार्य करता है जितना कि उसे अपने असित्व के लिए आवश्यक प्रतीत होता है। वह महत्त्वाकांक्षी नहीं होता है।
(द) प्रत्यावर्तन प्रत्यावर्तन वह अनुकूलन है जिसमें व्यक्ति सांस्कृतिक लक्ष्यों को स्वीकार नहीं करता है। और संस्थागत नियमों को भी स्वीकार नहीं करता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह पूर्ण अलगाव की स्थिति है। प्रत्यावर्तन में व्यक्ति केवल नाममात्रा के लिए ही समाज का सदस्य होता है। मानसिक विक्षप्त, वेश्याएँ, आवारा, पक्का पियक्कड़ आदि इसी के अंतर्गत आते हैं।
(य) विद्रोह - विद्रोह वह स्थिति है जिसमें न तो संस्कृतिक लक्ष्यों और न ही संस्थागत निगम के प्रति आस्था रहित है और व्यक्ति नए सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों की खोज प्रारंभ कर देता है। इसके अंतर्गत प्रचलित व्यवस्था को परिवर्तित करने की भावना रहती है। विद्रोह के अनुकूलन को कल्पना एवं भविष्य के प्रति आशा जन्म देती है। यह नवनिर्माण की ओर अग्रसर करती है।
मर्टन ने इन वैयक्तिक अनुकूलन के प्रकारों को स्वीकृति, अस्वीकृति आदि के आधार पर प्रारूपित किया है
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