परिकल्पना का निर्माण - Formation of a hypothesis

 परिकल्पना का निर्माण - Formation of a hypothesis


सामाजिक शोध का अगला चरण अध्ययन से संबंधित किसी एक अथवा एक से अधिक परिकल्पनाओं का निर्माण करना है। शोधकर्ता कोई भी शोध आरंभ करने से पहले अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों से संबंधित कुछ सामान्य अनुमान अवश्य लगा लेता है। ऐसे सामान्य अनुमान का उद्देश्य अध्ययन के लिए एक निश्चित दिशा का निर्धारण करना है जिससे शोधकर्ता इधर-उधर न भटक कर सुनिश्चित आधार पर तथ्यों का संकलन कर सके। इस दृष्टिकोण से उपकल्पना को परिभाषित करते हुए गुड़े एवं हॉट ने लिखा है, "परिकल्पना एक ऐसी मान्यता है जिसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए परिभाषित की जा सकती है।" लगभग इन्हीं शब्दों में बोगार्डस का कथन है,

"परिकल्पना परीक्षण के लिए प्रस्तुत की गई एक सामान्य मान्यता है।" पी.वी. यंग के शब्दों में. "परिकल्पना एक अस्थाई लेकिन केंद्रीय महत्व का विचार है जो उपयोगी शोध का आधार बन जाता है।" इन सभी कथनों से परिकल्पना की कुछ विशेषताएं स्पष्ट होती हैं। सर्वप्रथम, परिकल्पना में स्पष्टता होना आवश्यक है। इसका तात्पर्य है कि परिकल्पना में प्रयोग किए जाने वाले शब्द पूर्णतया परिभाषित होने चाहिए तथा उसमें ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे सभी लोग उसे समान अर्थ में समझ सके। दूसरे, परिकल्पना में अनुभव सिद्ध प्रमाणिकता का होना आवश्यक है। इसका संबंध किसी ऐसे विचार या अवधारणा से होना चाहिए जिसकी सत्यता की परीक्षा की जा सके। तीसरे, परिकल्पना का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह अध्ययन विषय के किसी विशेष पक्ष से ही संबंधित हो। परिकल्पना में विशिष्टता होने से ही अनुसंधानकर्ता विषय के एक विशेष पक्ष पर ध्यान केंद्रित करके उपयोगी सूचनाएं प्राप्त कर सकता है।

चौथे, परिकल्पना की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह इस तरह की होनी चाहिए जिसका उपलब्ध प्रविधियों के द्वारा परीक्षण किया जा सके। अंत में, परिकल्पना के लिए यह भी आवश्यक है कि वह पहले प्रस्तुत किए गए किसी सिद्धांत अथवा सिद्धांतों से संबंधित हो। यदि कोई परिकल्पना किसी भी सिद्धांत से संबंधित नहीं होती तो उसकी सत्यता की परीक्षा करना बहुत कठिन हो जाता है। सच तो यह है कि परिकल्पना के बिना सामाजिक शोध को किसी भी तरह व्यवस्थित नहीं किया जा सकता। इसी कारण इसे शोध के एक प्रमुख चरण के रूप में देखा जाता है। परिकल्पना का सर्व प्रमुख कार्य अध्ययन की दिशा का निर्धारण करना है। इसे अध्ययनकर्ता व्यर्थ के परिश्रम, समय और व्यय से बच जाता है। अध्ययन क्षेत्र को सीमित बनाने में भी उपकल्पना का विशेष योगदान होता है। परिकल्पना की सहायता से यह निश्चित करना आसान हो जाता है कि किन तथ्यों को एकत्र किया जाए और किन्हें छोड़ा जाए। इस प्रकार यह उपयोगी तथ्यों के संकलन में सहायक होती है। यदि परिकल्पना का सावधानी से निर्माण किया जाए तो यह उपयोगी और तर्कसंगत निष्कर्ष निकालने में बहुत सहायक होती है।