प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाएँ - functional prerequisites

प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाएँ - functional prerequisites


यह आप पढ़ चुके है कि पारसन्स के विचार में परिवार, अर्थव्यवस्था, शासन व्यवस्था आदि सभी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएँ है, जिसे वे अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए सदैव बनाए रखती है। इन व्यवस्थाओं का आत्म-अनुरक्षण तभी संभव है, जब सामाजिक प्राणी के रूप में मानव-पात्रों (व्यक्तियों) का समाज में समाजीकरण हो जाए और उनके अभिप्रेरणात्मक और मूल्यपरक उन्मुखताओं का प्रतिरूपण हो जाए। सामाजिक प्रणालियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अपने आंतरिक संगठन और बाहरी वातावरण के बीच कुछ अपरिहार्य व्यवस्थाएँ और समझौते करने पड़ते हैं। ये समझौते ठीक उसी तरह से है। जैसे कि मनुष्य के शरीर को बाहरी वातावरण के साथ और शरीर में निरंतर स्थिर तापमान बनाए रखकर करने पड़ते हैं। पारसन्स के विचार में सामाजिक प्रणालियों में भी ऐसी ही आत्म समन्वयकारी और अपने रख रखाव की क्षमता है। ये जो समन्वयकारी प्रक्रियाएँ सामाजिक प्रणाली को आंतरिक रूप से और अपनी सीमा अवस्थाओं के द्वारा बनाए रखती है उन्हें प्रकार्य कहते हैं। प्रकार्य प्रणाली के आत्म-अनुरक्षण की प्रक्रियाएँ है।


कुछ ऐसे प्रकार्य भी है, जिनके बिना सामाजिक प्रणाली जीवित नहीं रह सकती। इसे टालकट पारसन्स ने ( प्रकार्यात्मक पूर्वापक्षाएँ) कहा है। इस प्रकार की चार प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाएँ है।


• अनुकूलन


• लक्ष्य प्राप्ति


• एकीकरण


• विन्यास अनुरक्षण


इन प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाओं की कार्य पद्धति के क्षेत्र के बारे में आगे यह बताया गया है कि क्या ये पूर्वापेक्षाएँ प्रणाली की बाहरी प्रक्रियाओं से संबंध रखती है या आंतरिका उनका अंतर्क्रिया की प्रकृति के रूप से भी विरूपण किया गया है जैसे ये अंतर्क्रियाएँ प्रयोजनात्मक है या नैमित्तिक प्रयोनात्मक अंतर्क्रिया से अभिप्राय यह है कि जहाँ किसी अभीष्ट लक्ष को प्राप्त करने पर बल हो और नैमित्तिक अंतर्क्रिया में अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने में साधनों के अधिग्रहण और समामेलन पर बल होता है।