समाज की प्रकार्यात्मक एकता - Functional Unity of Society

समाज की प्रकार्यात्मक एकता - Functional Unity of Society

इसके अंतर्गत मर्टन की पहली मान्यता एवं ऐमट की पहली एवं दूसरी मान्यताएँ आ जाती हैं। इसका अभिप्राय स्पष्ट है कि प्रकार्य की दृष्टि से समाज में एकता पाई जाती है। सब भाग एक-दूसरे से संबंधित होते हैं। रेडक्लिफ ब्राउन ने इस मान्यता को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया था। उसने लिखा है- “एक विशिष्ट सामाजिक प्रथा का प्रकार्य वह योग है जो वह संपूर्ण सामाजिक तंत्र के रूप में कार्य करने वाले संपूर्ण सामाजिक जीवन को देती है। एक प्रकार का विचार यह अर्थ निहित रखता है कि एक सामाजिक तंत्र के रूप में कार्य करने वाले संपूर्ण सामाजिक जीवन को देती है। इस प्रकार का विचार यह अर्थ निहित रखता है कि एक सामाजिक तंत्र ( संपूर्ण सामाजिक ढाँचा, कुल सामाजिक प्रथाओं के सहित, जिसमें कि ढाँचा स्पष्ट होता है जिस पर निरंतर अस्तित्व के लिए निर्भर है)। एक प्रकार की एकता, है जिसे हम प्रकार्यात्मक एकता कह सकते हैं। प्रकार्यात्मक एकता की परिभाषा हम एक दशा के रूप कर सकते हैं, जिसमें सामाजिक तंत्र के समस्त में भाग पर्याप्त संतुलन में कार्य करते हैं और ऐसे संघर्ष उत्पन्न नहीं करते, जो नियंत्रित न किए जा सकते हों(।" रेडक्लिफ-ब्राउन ने इसे एक उपकल्पना (Hypothesis) के ही रूप में माना है। मैलिनोवस्की ने तो पहले इसका विरोध किया, पर स्थान-स्थान पर उसने इसका ही बोध दिया है।

मैलिनोवस्कीने इस मान्यता की इस आधार पर आलोचना की है कि रेडक्लिफ ब्राउन ने इस मान्यता को आदिम जातियों के लघु समुदायों के अध्ययनों के आधार पर प्रतिपादित किया है। लघु समुदायों में सावयवी एकता पाई जाती है, इसलिए प्रकार्यात्मक एकता झलकती है, पर जटिल एवं वृहद् समुदायों में एक मान्यता से कठिनाई आएगी क्योंकि उनमें विभिन्न प्रकार के समूह एवं वर्ग पाए जाते हैं। मैलिनोवस्कीकी आलोचना का दूसरा आधार यह था कि इस मान्यता को मान लेने से व्यक्ति (Individual) की उपेक्षा होती है। इसका कहना है कि ये प्रकार्यात्मक एकता समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति के लिए भी हो सकती है। उसका कहना है कि इस मान्यता को सावधानी के साथ स्वीकार करना चाहिए।

बटेसन ने बताया है कि परिवार का गर्व बढ़ जाने से समुदाय की एकता कम पड़ने लगती है। अधिक जटिल और अधिक स्तरित समाजों में प्रकार्यात्मक एकता, यह विलकुल सत्य नहीं है। धर्म का उदाहरण लीजिए, धर्म समाज में एकता स्थापित करता है। पर उन समाजें में क्या होता है? जहाँ कई धर्म होते हैं। भारतीय सामाजिक तंत्र को ही लीजिए।

एक कार्य हिंदुओं के लिए अच्छा हो सकता है, पर वहीं अन्य धर्मों के समूहों के लिए हानिप्रद हो सकता है। पृथक-पृथक धर्म अपने अपने अनुयायियों में एकता स्थापित करते हैं, पर संपूर्ण समाज में तो एकता नहीं स्थापित करते। फिर संपूर्ण सामाजिक तंत्र में प्रकार्यात्मक एकता का प्रश्न कहाँ उठता है। दुर्खीम ने भी इस प्रकार की समस्याओं पर प्रकाश डाला है। मर्टन ने भी इसकी व्याख्या की है। मर्टन ने इस मान्यता को एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं किया है। उसका कहना है कि एक ही समाज में एक प्रथा समाज के कुछ समूहों के लिए प्रकार्यात्मक हो सकती है और एकता उत्पन्न कर सकती है, पर अन्य कुछ समूहों के लिए वहीं प्रथा अकार्यात्मक हो सकती है। मर्टन ने धर्म को लेकर इस मान्यता को अस्वीकार किया है। धर्म का मुख्य प्रकार्य एकता स्थापित करना बताया गया है। पर सदैव ऐसा नहीं होता। मर्टन ने निम्नलिखित तर्क दिए हैं-


(1) धार्मिक समूहों में संषर्घ स्पष्ट तथ्य है. इसके लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। बहुधार्मिक समाजों में धर्म एकता नहीं उत्पन्न करता है, अपितु विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच संषर्घ एवं घृणा उत्पन्न करता है।


(2) प्रायः माना जाता है कि धर्म के द्वारा समाज के सामान्य मूल्यों और लक्ष्यों के प्रति लोग अधिक सजग रहते हैं, यह सत्य नहीं है। धर्म कई बार कर्मकांड तक ही सीमित हो जाता है और सामाजिक मूल्यों के प्रति लोगों को सजग नहीं रखा जाता है। धर्म को न मानने वाले भी सामाजिक मूल्यों एवं लक्ष्यों के प्रति सजग रहते हैं। वैज्ञानिक प्रायः धर्म को नहीं मानते. पर सामाजिक मूल्यों एवं लक्ष्यों के प्रति अधिक सजग रहते हैं। वैज्ञानिक प्रायः धर्म को नहीं मानते, पर सामाजिक मूल्यों एवं लक्ष्यों के प्रति अधिक सजग रहते हैं।


(3) सामाजिक मूल्यों के विषय में समान विचार न होने पर धर्म अप्रभावी रहता है। 


(4) धर्म के आधार पर एकता स्थापित होने की बात आधुनिक समाजों पर लागू नहीं होती है।


इससे स्पष्ट होता है कि इस प्रकार की प्रकार्यात्मक एकता को मानकर नहीं चलना चाहिए, अपितु इनका वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। मर्टन ने इस मान्तयता को निरपेक्ष सत्य नहीं माना है. इसीलिए उसने इसे सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं किया है। उसका मत है कि किसी भी समाज के सभी तत्त्व समान रूप से प्रकार्यात्मक नहीं होते, उनमें से कुछ अकार्यात्मक भी हो सकते हैं। यह मान्यता ऐसी है जो कि तथ्यों के आधार पर जानी जा सकती है, क्योंकि प्रकार्यात्मक एकता प्रत्यक्षात्मक तथ्य (Empirical Fact) है।