प्रकार्यवाद और सामाजिक परिवर्तन - Functionalism and Social Change

प्रकार्यवाद और सामाजिक परिवर्तन - Functionalism and Social Change


प्रकार्यवाद की उपर्युक्त विशेषताओं से हमें यह आभास हो सकता है कि इसका संबंध सामाजिक प्रणाली की निरंतरता एवं अनुरक्षण मात्र से है। इसमें सामाजिक परिवर्तन की धारणा नहीं है। वास्तव में अनेक समाजशास्त्रियों ने प्रकार्यवाद की केवल इसलिए आलोचना की है कि इसमें सामाजिक प्रणाली के उस पहलू पर आवश्यकता से अधिक बल दिया जाता है। जिसके फलस्वरूप स्थिरता एवं निरंतरता बनी रहती है। उनका यह भी कहना है कि प्रकार्यवाद बुनियादी मूल्यों में व्यापक सहमति या सर्वानुमति से चलता है। यह आलोचना उस प्रकार्यवादी दृष्टिकोण पर आधारित है जोकि यह विश्वास करता है कि समाज के सदस्य किसी समाज विशेष में अपनी समूची बाल्यावस्था में एक ही तरह के मूल्यों और विश्वासों से परिचित रहते हैं।


पारसन्स ने संबंधित सामाजिक प्रणालियों की प्रकार्यात्मक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप सामाजिक प्रणाली में स्थिरता तथा मूल्य सहमति के तत्व के प्रवेश से इनकार नहीं किया, परंतु उसने सामाजिक परिवर्तन की संभावनाओं की भी कल्पना की थी। यह किसी सामाजिक प्रणाली के विशिष्ट स्वरूप तथा प्रेरक प्रवृत्तियों के स्वरूप का परिणाम होता है

जोकि समाज में सदस्यों की कार्य-व्यवस्थाओं संगठित करते हैं। पहला स्वरूप सामाजिक प्रणालियों को पारिस्थितकीय संसाधनों और भौतिक एवं पर्यावरण परिस्थितियों जैसी बाह्य सीमावर्ती स्थितियों तथा सांस्कृतिक संपर्क पद विचारों और हितों के प्रसार जैसे ऐतिहासिक पहलुओं एवं इन ऐतिहासिक पहलुओं के कारण उत्पन्न सामाजिक दबावों के साथ जोड़ता है। दूसरा स्वरूप इसे कार्य-प्रणालियों से अभिप्रेरक तत्वों से जोड़ता है, जो अपने स्वरूप में अनिवार्यतः निर्देशात्मक है। उद्देश्यों तथा मूल्यों के उन्मुखीकरण की दिशा सामाजिक प्रणाली में सामंजस्य और तनाव दोनों की जन्म देती है। सामंजस्य से स्थिरता आती है और तनाव परिवर्तन कारण बनता है। पारसन्स ने दो स्तरों पर सामाजिक परिवर्तन की कल्पना की है। पहला सामाजिक प्रणाली के भीतर की प्रक्रियाओं में उभरने वाला परिवर्तन और दूसरा है, सामाजिक में आमूल परिवर्तन की प्रक्रियाएँ।


पारसन्स के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन के दोनों पहलुओं पर ध्यान देने के लिए सामाजिक विज्ञानों में अभी तक कोई निश्चित सिद्धांत विकसित नहीं हो पाया है,

किंतु समाजशास्त्र अपने विश्लेषण को दो पहलुओं तक सीमित रखकर सामाजिक परिवर्तन को समझने की समस्या हल कर सकता है। पहला वह कि परिवर्तन का अध्ययन अवधारणात्मक श्रेणियों अथवा प्रतिरूपों की सहायता से किया जाए। ये अवधारणात्मक श्रेणियाँ जिन्हें पारसन्स ने सामाजिक परिवर्तन के विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण माना है. वे है अभिप्रेरणात्मक और मूल्यपरक उन्मुखता तथा सामाजिक प्रणाली की प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाएँ पारसन्स के अनुसार दूसरा पहल यह है कि सामाजिक परिवर्तन का अध्ययन सामान्य स्तर पर नहीं किया जाना चाहिए, जो सभी समाजों पर समान रूप से लागू हो, बल्कि विशिष्ट ऐतिहासिक स्तर पर किया जाना चाहिए। इसलिए पारसन्स का यह मत है कि समाजशास्त्रियों के लिए समग्र सामाजिक प्रणाली के परिवर्तन की प्रक्रियाओं की तुलना में सामाजिक प्रणाली के भीतर के परिवर्तन का अध्ययन करना सरल है।


पारसन्स का मुख्य योगदान विभिन्न स्थितियों में सामाजिक प्रणाली के भीतर होने वाले परिवर्तन का अध्ययन है, किंतु उसने समग्र सामाजिक प्रणालियों के भीतर का विश्लेषण करने का, विशेषकर (विकासात्मक सार्विकीय तत्वों) की अपनी अवधारणा के माध्यम से प्रयास भी किया है, जिसका विकास उसने अपने जीवन के बाद के वर्षों में किया। 


सामाजिक प्रणालियों के भीतर होने वाले सामाजिक परिवर्तनों की पारसन्स की व्याख्या में प्रकार्यवाद के तत्व सुस्पष्ट दृष्टिगत है। उसने जैविक जीवन चक्र में होने वाले परिवर्तनों से सामाजिक प्रणालियों के भीतर होने वाले परिवर्तनों की तुलना की है, किंतु इस तुलना में एक अंतर बताते हुए पारसन्स ने कहा है कि सामाजिक प्रणालियाँ सांस्कृतिक पहलुओं से संचालित होती है, जो जीव विज्ञान से पर्याप्त भिन्न है फिर भी, विकास, विभेदीकरण और आत्म-अनुरक्षण की जो प्रवृत्ति हमें जैविक प्रणालियों के भीतर परिवर्तन की प्रक्रियाओं में दिखाई देती है, वही काफी हद तक सामाजिक प्रणाली के भीतर चलती है। इसके अतिरिक्त अन्य संस्कृतियों के संपर्क, प्रणाली के भीतर नई सांस्कृतिक नवीनताओं तथा नए मूल्यों एवं जीवन-शैलियों में विसरण के कारण प्रणाली के भीतर भी परिवर्तन होते हैं।


सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन की प्रक्रिया से जुड़ा एक प्रमुख कारण है जनसंख्या में वृद्धि. उसका घनत्व एवं एकत्रीकरण। मनुष्य के माध्यम से खाद्य संसाधनों तथा उत्पादन प्रौद्योगिकी पर दबाव बढ़ता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अतीत मे बृहद सामाजिक प्रणालियों जैसे कि बढ़े समुदायों, नगरों तथा राजनीतिक के संगठित रूपों का विकास नदी की घाटियों के समीप और उपजाऊ जमीनों पर हुआ है.

जहाँ पर्याप्त मात्रा में अनाज पैदा हो सकता था। इस वृद्धि से जनसंख्या में वृद्धि हुई तथा सामाजिक प्रणाली के भीतर श्रम विभाजन, शहरों का विकास तथा भारत में जाति व्यवस्था एवं यूरोप में गिल्ड आदि सामाजिक संगठन जैसे बड़े-बड़े सामाजिक परिवर्तन हुए। पारसन्स के अनुसार ये परिवर्तन सरलता से नहीं होते. बल्कि विरोध पर विजय द्वारा रूपांतरण है। विरोध पर विजय पाने से पारसन्स का अभ्रिपाय है सामाजिक प्रणाली में तनाव अथवा द्वंद्व का समाधान करना।”


पारसन्स के अनुसार प्रत्येक सामाजिक प्रणाली में कुछ समय बाद विभिन्न प्रकार के निहित स्वार्थ की जड़े जमा होते हैं। क्योंकि वह प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाओं (अनुकूलन, लक्ष्य प्राप्ति, एकीकरण एवं विन्यास अनुरक्षण) के अनुरूप स्वयं को संयोजित कर लेती है। प्रणाली के भीतर से नए विचारों की माँगों प्रौद्योगिकी में परिवर्तन की आवश्यकता अथवा प्रणाली पर जलवायु या पारिस्थितिकी में परिवर्तन अथवा महामारी जैसे बाहरी तत्वों के दबाव के कारण सामाजिक प्रणालियों को अपने निहित स्वार्थों को छोड़कर नए चिंतन, विचारों, प्रौद्योगिकी, कार्य-पद्धति, श्रम विभाजन आदि को अपनाना पड़ता है। इसके फलस्वरूप सामाजिक प्रणाली का पुराना संतुलन बिगड़ जाता है

और उसके स्थान पर नया संतुलन लाया जाता है। इस दो छोरों के बीच सामाजिक प्रणालियों के भीतर अनुकूलन की लंबी प्रक्रियाएँ चलती है, जिनके द्वारा नए विचार, नई कार्यपद्धतियाँ लोगों के लिए स्वीकार्य बनाई जाती है। पारसन्स ने इस प्रक्रिया को संस्थागत होना कहा है। नई भूमिकाओं, संगठनों के नए प्रकारों, विज्ञान का विकास और धार्मिक विचार जैसे नए सांस्कृतिक संरूपों से सामाजिक प्रणाली में संतुलन की मौजूदा विधियों पर दबाव पड़ता है और अतिक्रमण होता है। सामाजिक संगठन के पुराने तत्वों पर नए तत्वों के अतिक्रमण के फलस्वरूप स्थापित निहित स्वार्थ के साथ संघर्ष एवं तनाव उत्पन्न होता है। पारसन्स के अनुसार किसी एक कारण से ही सामाजिक तनाव पैदा नहीं होते और न ही सामाजिक परिवर्तन का कोई एक मुख्य कारक होता है, किंतु सामाजिक तनाव सामाजिक विकास के उस बिंदु का प्रतीक है, जहाँ पर सक्रिय संपर्क प्रणालियों और प्रणाली की संस्थाओं तथा संरचनाओं (भूमिकाओं, प्रस्थितियों, व्यवसायों आदि) का पुराना संतुलन बिगड़ जाता है और नए संतुलन की दिशा में बढ़ने की प्रवृत्ति का सूत्रपात होता है। सामाजिक प्रणालियों के भीतर होने वाले सामाजिक परिवर्तनों की पारसन्स की व्याख्या में प्रकार्यवाद के तत्व सुस्पष्ट दृष्टिगत है।

उसने जैविक जीवन चक्र में होने वाले परिवर्तनों से सामाजिक प्रणालियों के भीतर होने वाले परिवर्तनों की तुलना की है, किंतु इस तुलना में एक अंतर बताते हुए पारसन्स ने कहा है कि सामाजिक प्रणालियाँ सांस्कृतिक पहलुओं से संचालित होती है, जो जीव विज्ञान से पर्याप्त भिन्न है फिर भी, विकास, विभेदीकरण और आत्म-अनुरक्षण की जो प्रवृत्ति हमें जैविक प्रणालियों के भीतर परिवर्तन की प्रक्रियाओं में दिखाई देती है, वही काफी हद तक सामाजिक प्रणाली के भीतर चलती है। इसके अतिरिक्त अन्य संस्कृतियों के संपर्क. प्रणाली के भीतर नई सांस्कृतिक नवीनताओं तथा नए मूल्यों एवं जीवन-शैलियों में विसरण के कारण प्रणाली के भीतर भी परिवर्तन होते हैं।


सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन की प्रक्रिया से जुड़ा एक प्रमुख कारण है जनसंख्या में वृद्धि, उसका घनत्व एवं एकत्रीकरण मनुष्य के माध्यम से खाद्य संसाधनों तथा उत्पादन प्रौद्योगिकी पर दबाव बढ़ता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अतीत मे बृहद सामाजिक प्रणालियों जैसे कि बढ़े समुदायों, नगरों तथा राजनीतिक के संगठित रूपों का विकास नदी की घाटियों के समीप और उपजाऊ जमीनों पर हुआ है,

जहाँ पर्याप्त मात्रा में अनाज पैदा हो सकता था। इस वृद्धि से जनसंख्या में वृद्धि हुई तथा सामाजिक प्रणाली के भीतर श्रम विभाजन, शहरों का विकास तथा भारत में जाति व्यवस्था एवं यूरोप में गिल्ड आदि सामाजिक संगठन जैसे बड़े-बड़े सामाजिक परिवर्तन हुए। पारसन्स के अनुसार ये परिवर्तन सरलता से नहीं होते. बल्कि विरोध पर विजय द्वारा रूपांतरण है। विरोध पर विजय पाने से पारसन्स का अभिप्राय है सामाजिक प्रणाली में तनाव अथवा द्वंद्व का समाधान करना।"


पारसन्स के अनुसार प्रत्येक सामाजिक प्रणाली में कुछ समय बाद विभिन्न प्रकार के निहित स्वार्थ की जड़े जमा होते हैं। क्योंकि वह प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाओं (अनुकूलन, लक्ष्य प्राप्ति. एकीकरण एवं विन्यास अनुरक्षण) के अनुरूप स्वयं को संयोजित कर लेती है। प्रणाली के भीतर से नए विचारों की माँगों प्रौद्योगिकी में परिवर्तन की आवश्यकता अथवा प्रणाली पर जलवायु या पारिस्थितिकी में परिवर्तन अथवा महामारी जैसे बाहरी तत्वों के दबाव के कारण सामाजिक प्रणालियों को अपने निहित स्वार्थों को छोड़कर नए चिंतन, विचारों,

प्रौद्योगिकी, कार्य-पद्धति, श्रम विभाजन आदि को अपनाना पड़ता है। इसके फलस्वरूप सामाजिक प्रणाली का पुराना संतुलन बिगड़ जाता है और उसके स्थान पर नया संतुलन लाया जाता है। इस दो छोरों के बीच सामाजिक प्रणालियों के भीतर अनुकूलन की लंबी प्रक्रियाएँ चलती है, जिनके द्वारा नए विचार, नई कार्यपद्धतियाँ लोगों के लिए स्वीकार्य बनाई जाती है। पारसन्स ने इस प्रक्रिया को संस्थागत होना कहा है। नई भूमिकाओं, संगठनों के नए प्रकारों, विज्ञान का विकास और धार्मिक विचार जैसे नए सांस्कृतिक संरूपों से सामाजिक प्रणाली में संतुलन की मौजूदा विधियों पर दबाव पड़ता है और अतिक्रमण होता है। सामाजिक संगठन के पुराने तत्वों पर नए तत्वों के अतिक्रमण के फलस्वरूप स्थापित निहित स्वार्थ के साथ संघर्ष एवं तनाव उत्पन्न होता है। पारसन्स के अनुसार किसी एक कारण से ही सामाजिक तनाव पैदा नहीं होते और न ही सामाजिक परिवर्तन का कोई एक मुख्य कारक होता है, किंतु सामाजिक तनाव सामाजिक विकास के उस बिंदु का प्रतीक है, जहाँ पर सक्रिय संपर्क प्रणालियों और प्रणाली की संस्थाओं तथा संरचनाओं (भूमिकाओं, प्रस्थितियों, व्यवसायों आदि) का पुराना संतुलन बिगड़ जाता है और नए संतुलन की दिशा में बढ़ने की प्रवृत्ति का सूत्रपात होता है।