संस्कृति का प्रकार्यवाद सिद्धांत - Functionalism Theory of Culture

 संस्कृति का प्रकार्यवाद सिद्धांत - Functionalism Theory of Culture


प्रकार्यवादी मैलीनोवस्की का विचार था कि मनुष्य की आवश्यकताएं अनेक प्रकार की हैं, जैसे सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, जैविक, भौतिक तथा मानसिक आदि। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव ने भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति तत्वों का विकास किया। भाषा, साहित्य, कला, शिल्पविज्ञान आदि का आविष्कार मानव ने अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए किया। मानव की सभी आवश्यकताएं एक दूसरे से अंतर संबंधित हैं, क्योंकि ये मानव की समग्रता से संबंधित हैं। संस्कृति के एक पहलू में परिवर्तन से संपूर्ण संस्कृति में परिवर्तन हो जाता है। मैलीनोवस्की ने प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक प्रकार की आवश्यकताओं का वर्णन किया है। प्राथमिक या मौलिकता का अर्थ जैविक आवश्यकता, जैसे भूख, , योनि इत्यादि संतुष्टि से है। द्वितीय या सहायक या व्युत्पन्न आवश्यकता का संबंध उन संस्थाओं से है, सुरक्षा, जो मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होती हैं,

जैसे आर्थिक तथा कानून संबंधी तृतीयक आवश्यकता अथवा समाकलनात्मक आवश्यकता का संबंध उन संस्थाओं से है, जो समाज को एकजुट बनाए रखने हेतु जरुरी होती हैं, जैसे- जादू, धर्म, खेल, कला, इत्यादि। सन 1931 ई. में संस्कृति को परिभाषित करते हुए मैलीनोवस्की ने कहा कि संस्कृति मानव आवश्यकता पूर्ति का एक साधन है, जिसे सांस्कृतिक यंत्रावली कहते हैं। अपनी पुस्तक साइंटिफिक थ्योरी ऑफ कल्चर' (1944) में संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहा है कि संस्कृति संपूर्ण समग्रता है, जिसका संबंध उपकरण, उपभोक्ता, विभिन्न समूहों के संविधानिक प्राधिकार, मानव विचार, शिल्पशास्त्र, स्पष्ट विश्वास एवं रीति-रिवाज से है। हम चाहे अत्यंत सरल या आदिम संस्कृति की चर्चा करें या अधिक जटिल संस्कृति की, लेकिन हमारे सम्मुख विशाल भौतिक, मानव धार्मिक सामग्री रहती है, जिसके आधार पर मानव प्रत्यक्ष के साथ संबंध स्थापित करता है। यह समस्या इसलिए खड़ी होती है, क्योंकि मानव के पास एक शरीर है जिसके लिए जैविक आवश्यकता की पूर्ति करनी पड़ती है।

दूसरी बात यह है कि मानव जिस पर्यावरण में रहता है, उसका मित्र बन जाता है। इस पारिस्थितिकी में पर्यावरण मानव को दस्तकारी के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करती है। इस आधार पर मैलीनोवस्की ने संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहा है कि संस्कृति आवश्यकता पूर्ति का एक साधन है। इस प्रकार संस्कृति का विश्लेषण प्रकार्यात्मक एवं संस्थात्मक अध्ययन द्वारा अधिक स्पष्ट तथा विस्तृत रूप से किया जा सकता है। मैलीनोवस्की ने जादू, धर्म, विज्ञान, कला तथा मिथक के अध्ययन के लिए प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उनका मानना था कि संस्कृति मानव को जीवित रहने के लिए आवश्यक साधन देता है। मैलीनोवस्की ने संकलनात्मक आवश्यकता के अंतर्गत उस संस्थाओं की चर्चा की है जिसका कार्य समाज के सभी लोगों को एक जुट रखना था। इसके साथ ही साथ उनका कार्य समाज का अस्तित्व एवं पहचान बनाए रखना था, जिसके अंतर्गत परंपरा, मूल्य, धर्म, मिथक, कला, उत्सव, खेल, संकेत, भाषा इत्यादि आते हैं। मैलीनोवस्की ने ट्रोब्रियंड द्वीपवासियों की संपूर्ण संस्कृति का अध्ययन किया, जिसमें द्वीपवासियों की कला संस्कृति का अध्ययन महत्वपूर्ण था।