प्रकार्यवाद - functionalism

प्रकार्यवाद - functionalism


प्रकार्यवाद (Functionalism) या संरचनात्मक प्रकार्यवाद (Structural Functionalism) या प्रकार्यवादी सिद्धांत (Functional Theory) वह विचार या सिद्धांत है, जो संरचना (Structure ) और प्रकार्य (Function) के प्रत्ययों के अंतसंबंधों की कुछ आधारभूत मान्यताओं पर आधारित है। प्रकार्यवादी विचार या सिद्धांत यह है कि समाज एक प्राणीशास्त्रीय सावयव के समान एक पूर्णता (Whole) है और सावयन के समान उसके विभिन्न अंग होते हैं। हर अंग का पूर्णता के प्रति कुद प्रकार्य होता है। अंग एक-दूसरे से परस्पर संबंधित हैं। किसी एक अंग या भाग की पूर्णता तथा अन्य अंगों के साथ पारस्परिक संबंधों के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। संपूर्ण सिद्धांत या विचार सामाजिक संरचना और उनके प्रकार्यों के अध्ययन पर केंद्रित है। प्रकार्य इसका केंद्रीय प्रत्यय है। इसी मुख्य विचार के आधार पर प्रकार्यवाद की कुछ प्रमुख प्रचलित मान्यताएँ (Prevailing Postulates ) हैं-


(1) समाज की प्रकार्यात्मक एकता,


(2) सावभौमिक प्रकार्यवाद, और


(3) अपरिहार्यता।


मर्टन ने इनका इस प्रकार उल्लेख किया है


(1) सामाजिक क्रियाएँ या सांस्कृतिक तथ्य संपूर्ण सामाजिक या सांस्कृतिक व्यवस्था के लिए, प्रकार्यात्मक होते हैं (समाज की प्रकार्यात्मक एकता) 


( 2 ) ऐसे सब सामाजिक या सांस्कृतिक तथ्य समाजशास्त्रीय प्रकार्यों को पूरा करते हैं (सार्वभौमिक प्रकार्यवाद) । 


(3) ये तथ्य परिणामतः अनिवार्य और अपरिहार्य हैं (अपरिहार्य)। उपरोक्त मान्यताओं के आधार पर ही प्रकार्यात्मक सिद्धांत आधारित है और प्रकार्यात्मक विश्लेषण एवं अध्ययन किए जाते हैं।


यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित है कि उपरोक्त मान्यताएं मैलिनोवस्की और रेडक्लिफ ब्राउन के विचारों पर आधारित हैं। आधुनिक प्रकार्यवाद इन मान्यताओं की मूल भावना कि समाज एक संपूर्णता है और उसके अंग परस्पर संबंधित हैं और वे उसकी निरंतरता को बनाए रखने के लिए प्रकार्य करते हैं, पर अनिवार्य रूप से नहीं, तथ संरचना और प्रकार्यों के संदर्भ में समाज का अध्ययन किया जा सकता है, को ही मानता है। प्रचलित मान्यताओं को सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है। मर्टन ने विशेष रूप से पूर्ववर्ती प्रचलित मान्यताओं में अनेक संशोधन किए हैं और नए प्रत्यय विकसित किए हैं। अब समाज की प्रकार्यात्मक एकता को एक उपकल्पना के में ही स्वीकार किया जाता है. सिद्धांत के रूप में नहीं। प्रकार्यात्मक एकता को प्रत्यक्षात्मक तथ्य (Empirical) होने के कारण समझा जा सकता है। अब यह भी स्वीकार नहीं किया जाता कि हर सांस्कृतिक तथ्य या क्रिया प्रकार्यात्मक ही होती है। क्रिया का बहुपरिणाम (Multiple Consequences) और नकार्य (Non-Function) के प्रत्ययों को निर्मित किया है जो कि आधुनिक समकालीन समाजशास्त्र में प्रस्थापित हो गए हैं। तथ्यों को अपरिहार्य (Indispensable) भी माना नहीं जाता है। एक तथ्य के स्थान पर उस प्रकार्य को अन्य प्रकार्यात्मक विकल्प (Functional Alternates) भी पूरा कर सकते हैं। इस दृष्टि से प्रकार्यात्मक विकल्प का प्रत्यय भी विकसित हो गया है। साथ ही ये प्रकार्यात्मक विकल्प तभी स्वीकार किए जा सकते हैं जब वे संरचनात्मक संदर्भ (Structural Context) के अनुकूल हों। तयों का स्वीकार किया जाना या न किया जाना संरचनात्मक संदर्भ पर निर्भर करता है। संरचनात्मक दबाव (Structural Constraint) भी प्रकार्यात्मक विकल्पों के चयन में सक्रिय भाग लेता है। इस प्रकार, आधुनिक प्रकार्यवाद ने संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण को अत्यधिक वैज्ञानिक बना दिया है। संक्षेप में, प्रकार्यवाद समाज की पूर्णता स्वीकार करता है। और उसके अंगों के प्रकार्यों के आधार पर सामाजिक संरचना की व्याख्या करता है।