गर्दा लर्नर - Garda Lerner
गर्दा लर्नर - Garda Lerner
स्त्रीवादी इतिहासकार गर्दा लर्नर का हमने पहले भी कई बार जिक्र किया है। पितृसत्ता की शुरुआत और उसकी निरंतरता से जुड़े सवालों पर उन्होंने अपनी किताब द क्रिएशन ऑफ पैट्रियार्की (1986) में बड़े विस्तृत तरीके से विचार किया है। यहाँ हम उनके विचारों को बिंदुवार प्रस्तुत कर रहे हैं
→ गर्दा लर्नर ने भी पितृसत्ता को ऐतिहासिक संरचना माना है। पर वे इसके पीछे किसी एक कारण का हाथ होने अथवा इसके इतिहास के किसी पड़ाव पर उत्पन्न होने की धारणा को यथार्थपरक नहीं मानतीं।
उनका कहना है कि पितृसत्ता को घटना के रूप में नहीं, बल्कि प्रक्रिया के रूप में देखने की जरूरत है। यही वजह है कि उन्होंने अपनी किताब का नाम क्रिएशन ऑफ पैट्रियाक रखना उचित समझा न कि ऑरिजिन ऑफ पैट्रियाक क्रिएशन यानि निर्माण, रचना या बनना। लर्नर लिखती हैं
कि पितृसत्ता के निर्माण में लगभग 2500 वर्ष लगे होंगे और इसमें किसी एक की नहीं, बल्कि कई कारकों की मिली जुली भूमिका रही होगी।
→ लर्नर की सबसे महत्वपूर्ण स्थापना यह है पितृसत्ता को पुरुषों की सोची-समझी रणनीति का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। चीजें कुछ खास रास्ते विकसित होती हैं। कुछ खास नतीजे सामने आते हैं, जिनके बारे में पहले किसी को तनिक भी अंदाजा नहीं रहता और जब यह सामने आते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उनका कहना है कि जिस तरह आधुनिक मनुष्य को औद्योगीकरण का रास्ता पकड़ते वक्त प्रदूषण और पर्यावरण क्षति जैसे विनाशकारी नतीजों का अंदाजा नहीं था उसी तरह आरंभ में स्त्रियों और पुरुषों के बीच विद्यमान अनायास श्रम विभाजन बाद में सायास ही नहीं, बल्कि ज़बरन लागू किया जाएगा और उनकी अधीनता की स्थिति में आने का कारण बनेगा, इसका तनिक भी आभास स्त्रियों को नहीं रहा होगा।
→ लेवीस्ट्रास और मेलेसा की तरह लर्नर का भी यही मत है कि निजी संपत्ति और वर्ग-व्यवस्था का निर्माण न केवल स्त्री की यौन प्रजनक क्षमता के पण्यीकरण (कोमोडिफिकेशन) के बाद, बल्कि उसी की बुनियाद पर हुआ।
→ आरंभिक राज्य पितृसत्ता के रूप में गठित हुए और इसी कारण वे शुरू से पितृसत्तात्मक परिवारों को संरक्षण प्रदान करने में ही रुचि लेते रहे।
→ अपने समूह की स्त्रियों के नियंत्रण से प्राप्त अनुभव से ही पुरुषों ने दूसरों पर अधिकार जताना सीखा। इसकी अभिव्यक्ति सर्वप्रथम पराजित समूह की स्त्रियों को दास बनाने और अंतत: दास प्रथा की स्थापना के रूप में हुई।
→ प्राचीन क़ानून संहिताओं में स्त्रियों के यौन-नियंत्रण के उद्देश्य से नियम बनाए गए और उन्हें राज्य ने कठोरतापूर्वक लागू किया।
→ स्त्रियों से उनकी अपनी ही अधीनता में सहयोग के लिए बल-प्रयोग के अलावा कई तरीके ईजाद किए गए।
उदाहरण के लिए, आर्थिक तौर पर उन्हें घर के पुरुष मुखिया पर निर्भर कर दिया जाना; स्त्रियों को अच्छी/बुरी, पतिव्रता/पतिता आदि जैसी श्रेणियों में वर्गीकृत करना; नियम-कायदों का पालन करने वाली स्त्रियों को जाति और वर्ग आधारित विशेषाधिकार प्रदान करना इत्यादि ।
→ पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में स्त्रियों की स्थिति के लिए शोषण शब्द के प्रयोग को लर्नर उपयुक्त नहीं मानती । शोषण बल प्रयोग को इंगित करता है। जबरन सत्ता की स्थिति हो तो इसका प्रयोग होना चाहिए। पितृसत्ता पितृसंरक्षणमूलक (पैटर्नलिस्टिक) है। पितृसंरक्षणता में शोषण का अंश तो रहता है, लेकिन कर्तव्य, दायित्व और अधिकार के लबादे में यह ओझल रहता है। इसके अलावा, हमारा समाज इस तरह संरचित है कि स्त्रियाँ केवल और केवल पीड़ित की ही स्थिति में नहीं हैं। बहुत सी ऐसी स्त्रियाँ हैं जो एक ओर पिता या पति के नियंत्रण में होती हैं तो दूसरी ओर कई स्त्रियों और पुरुषों पर सत्ता का सुख भी उठती हैं। इसलिए लर्नर स्त्री की स्थिति की यथार्थपरक अभिव्यक्ति के लिए शोषण की जगह पराधीनता शब्द के प्रयोग को उचित बताती हैं।
→ लर्नर की एक और महत्वपूर्ण स्थापना यह है कि यदि घटनाएँ एक साथ घट रही हों तो ज़रूरी नहीं कि उनके बीच कार्य-कारण संबंध ही हो। वे एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। यह जुड़ा होना अन्योन्याश्रय भी हो सकता है। इस सूत्र के जरिए उन्होंने यह दिखलाने की कोशिश की है कि कैसे आरंभ से ही स्त्री अधीनता और वर्ग आधारित सत्ता संरचना नाभिनालबद्ध रहे हैं।
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