जेंडर और जाति - gender and race

जेंडर और जाति - gender and race


हिंदुओं में जेंडर के निर्माण में अथवा बच्चों के समाजीकरण में जिस सामाजिक संरचना की अनिवार्य संलग्नता है वह है जाति। इसके प्रभाव का अंदाज इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि शास्त्रीय स्तर पर स्त्रियों के मामले अपेक्षाकृत उदार माने जाने वाले इस्लाम का भी जब भारतीय महद्वीप पर आगमन हुआ तो वह इसके प्रभाव से बच न सका। ज़रीना भट्टी लिखती हैं, 'काफी हद तक खुद पितृसत्तात्मक मिजाज लिए इस्लाम को उत्तर भारत में अनुकूल परिवेश मिला। यहाँ हिंदुओं की सामाजिक संरचना प्रबल रूप से पितृवंशीय, पितृकेंद्रित और मूलत: अन्यायपूर्ण थी। मुसलमानों के आगमन से यहाँ एक खास तरह की श्रेणीबद्ध समाज-व्यवस्था अस्तित्व में आई जो एक तरफ हिंदू समाज की जाति आधारित असमानताओं पर टिकी थी तो दूसरी तरफ हिंदू और मुसलमानों की साझी जेंडरीय असमानताओं पर। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें इस्लाम के शुद्धतावादी आदेशों के साथ समझौता किया गया था। उदाहरण के लिए, कुछ मुसलमान समुदायों ने भारतीय विधि को मानते हुए इस्लामी व्यक्तिगत कानून की जगह हिंदुओं के पारंपरिक कानून को अपना लिया था। इस्लाम में औरतें माता-पिता की संपत्ति में आधे की हकदार मानी जाती थीं, जबकि हिंदू कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। इस मिश्रित व्यवस्था में मुसलमान महिलाओं को संपत्ति के परंपरागत अधिकार से वंचित कर दिया गया।"


जाति की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा दलित लेखिका कुमुद पावड़े के इस कथन से लगाया जा सकता है कि मैं चाहकर भी अपनी जाति नहीं भुला सकती। किसी ने सच ही कहा था कि हमें जो चीज जन्म के साथ ही मिल जाती है और जिससे हम मरकर भी छुटकारा नहीं पा सकते वह हैं जाति।'


गौरतलब है कि जाति पर मुख्यधारा के समाजशास्त्रियों ने जो अध्ययन किए हैं उनमें जाति के इस पहलू को प्राय: नज़रअंदाज़ करने की प्रवृत्ति रही। इस प्रवृत्ति के उत्स हमें 19वीं सदी में ही देखने को मिल जाते हैं, जब स्त्री- प्रश्न और जाति-प्रश्न दो बड़े प्रश्नों के रूप में उभर कर सामने आए। ऊँची जातियों के सुधारक इन प्रश्नों को पृथक मानकर चल रहे थे। इतना ही नहीं, उनके स्त्री प्रश्न का दायरा अत्यंत सीमित था। वे जिन समस्याओं को उठा रहे थे वे ऊँची जातियों की स्त्रियों की समस्याएँ थीं। मुख्यधारा के समाजशास्त्र में कमोबेश उनकी चिंतन प्रणाली की निरंतरता बनी रही। इसका कारण यह है कि 19वीं सदी के ही दरम्यान और उसके बाद भी, जाति की दलित चिंतकों और लेखकों द्वारा की गई व्याख्याओं को समाजशास्त्र ने गंभीरता से नहीं लिया।

जबकि ये चिंतक जाति और जेंडर के परस्पर आबद्ध होने की बात कर रहे थे। जाति और जेंडर के परस्पर जुड़े होने की ओर सबसे पहले जोतिराव फुले ने ध्यान दिलाया। जोतिराव फुले ने शूद्रों, अतिशूद्रों और सभी जातियों की स्त्रियों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शोषण का शिकार माना। उनके मुताबिक ऊँची जातियों की विधवा स्त्रियों की दारुण अवस्था और निम्न जातियों के शोषण के लिए ब्राह्मणों द्वारा खड़ी की गई व्यवस्था ज़िम्मेदार है। पेरियार ने भी इसी तरह के उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि जिस तरह ब्राह्मणवाद ने श्रम करने वालों की बड़ी संख्या को शूद्रता की स्थिति में डाल रखा है उसी तरह उसने विवाह के जरिए स्त्रियों को दासता की डोर में बांध रखा है।


अंबेडकर ने (जातियों के) शुद्ध/अशुद्ध तथा श्रेष्ठ/हीन के आधार पर जातियों के सीढ़ीनुमा अंदाज में स्थित होने की बात की। इस संरचना की निरंतरता के लिए यह ज़रूरी है कि हरेक जाति अपनी सीमाओं के साथ अपने लिए तयशुदा जगह पर पुनरुत्पादित होती रहे।

अंबेडकर के मुताबिक इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विवाह-संबंधी कठोर नियम-कायदे बनाए गए। उनके शब्दों में जाति-व्यवस्था के लिए सजातीय विवाह और स्त्रियों की यौनिकता के नियंत्रण के लिहाज से ऊँची जातियों खासकर, ब्राहमणों में सती. बलात विधवापन, बाल-विवाह जैसे अस्त्र ईजाद किए गए। जो जाति ब्राह्मणों के नज़दीक हैं उन्होंने स्त्री पर ये तीनों ही कायदे लाद रखे हैं जो उनसे तनिक दूर हैं उन्होंने विधवापन और बाल विवाह अपना रखा है जो और भी दूर हैं उन्होंने बाल-विवाह अपना रखा है और जो सबसे दूर हैं वे जाति के नियमों में आस्था बनाए रखकर जाति-व्यवस्था के परिचालन में सहयोग करते रहे हैं।


जाति और जेंडर के जुड़ाव पर जो अंतर्दृष्टि फुले और अंबेडकर ने विकसित की उसके प्रति उन विद्वानों ने उपेक्षा का भाव अपनाया, जिन्हें जाति का आधिकारिक विशेषज्ञ माना जाता है। जाति-अध्ययन के पाठ्यक्रम में लंबी अवधि तक इन विद्वानों की किताबें और स्थापनाएँ ही छाई रही हैं। लेकिन सूत्रीवादी विद्वानों और दलित स्त्रियों ने फुले-अंबेडकर को न केवल विस्मृत होने से बचा लिया, बल्कि उनके द्वारा विकसित अंतर्दृष्टि को अपने शोध और विश्लेषण से और भी पुख्ता किया है।