लिंग भेद और पितृसत्ता - gender discrimination and patriarchy

लिंग भेद और पितृसत्ता - gender discrimination and patriarchy


पितृसत्ता और लिंग भेद के बीच प्राचीनकाल से ही एक समानता दिखाई देती है। पितृसत्ता में लैंगिकता के आधार पर स्त्री और पुरुष के बीच जो मानदंड बनाए गए हैं वे सभी समाजों में एक जैसे हैं। लैंगिक असमानता पर पितृसत्ता के प्रभाव सब जगह देखे जाते हैं। स्त्रीवादियों ने इसे कई तरह से व्याख्यायित किया है, जिनकी आगे क्रमशः चर्चा की जाएगी


1) जातिगत पेशा तथा लैंगिक असमानता- प्रत्येक जाति में स्त्रियों के लिए कार्य निर्धारित हैं। वे अपने परंपरागत कार्य को छोड़कर जीविकोपार्जन के लिए अन्य किसी कार्य या व्यवसाय को नहीं अपना सकती हैं। स्त्रियाँ वही कार्य या व्यवसाय अपने लिए निश्चित कर सकती हैं जो उनकी जाति के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस स्थिति में स्त्रियों की हालत दयनीय हो जाती है। व्यवसाय की रूपरेखा, उसका ढाँचा तैयार करना, कार्य का समय सुनिश्चित करना तथा समय पर कार्य की पूर्ति इत्यादि का बोझ स्त्रियों पर आ जाता है। अनिच्छा के बावज़ूद वे अपने कार्य में संलग्न रहती हैं।

कर्मकर जातियों, जैसे- कुम्हार, लोहार, बढ़ई, बुनकर, धोबी आदि के कार्य मौसम आधारित होते हैं। समय पर कार्य की आपूर्ति न होने पर उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। पुरुष अपनी सारी ज़िम्मेदारियाँ घर के बाहर निभाता है, परंतु उत्पादन संबंधी कार्य का बोझ स्त्रियों पर आ जाता है। इसलिए स्त्रियों को शिक्षा से वंचित कर पारंपरिक पेशे में लगा दिया जाता है, ताकि उनमें जातिगत पेशे संबंधी कार्य कुशलता बनी रहे। उनके विवाह में भी यह बंधन रहता है कि वह अपने पेशे से जुड़ी हुई जाति या उपजाति में ही ब्याही जाए। इस तरह जातीयता के आधार पर निर्धारित व्यवसाय लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है।


2) सांस्कृतिक मान्यताएँ : भारत में सभी जातियों के अपने-अपने रीति-रिवाज और त्यौहार हैं। उनको मनाने के तरीके, विवाह संबंधी नियम भी अलग-अलग हैं। इसका सीधा प्रभाव लैंगिक संबंधों पर पड़ता है। खाना बनाने का तरीका, उसको परोसने और खाने का तरीका आदि अनेक व्यवहार स्त्रियों की कार्य कुशलता एवं सामाजिक स्थिति को दर्शाते हैं।

यह उसे जाति विशेष से चिह्नित भी करते हैं। स्त्रिया अपने सांस्कृतिक परिवेश में इस तरह बंधी होती हैं कि उनके कार्य का विवरण संस्कृति संबंधी क्रियाकलापों से जुड़ा होता है, यद्यपि पुरुष इस तरह की स्थितियों से पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। स्त्रियों पर संस्कृति के संरक्षण का दायित्व होता है। वे घर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी पेशे के संरक्षण का कार्य करती हैं। उन पर यह ज़िम्मेदारी होती है कि जातीय संस्कारों का क्षरण न होने पाए। वयस्क पुरुष स्त्रियों को पारंपरिक पेशे के प्रति सचेत करता रहता है और स्त्रियाँ जी जान से उसके संरक्षण में लगी रहती हैं। यहाँ उन्हें पारंपरिक पेशे से इतर स्वतंत्र पेशा चुनने की इजाज़त नहीं होती है। यद्यपि उन्हें पितृसत्ता संस्कृति के संरक्षण के प्रति प्रोत्साहित करती रहती है। कार्य से होने वाली आमदनी में पुरुष पूरी हिस्सेदारी करता है और स्त्रियाँ शोषण का शिकार हो अभाव की ज़िंदगी जीने पर मजबूर होती हैं। 


3) गृहस्थ संरचना और लैंगिक संबंध : भारत में लैंगिक संबंध का जातीयता से गहरा जुड़ाव है। उच्च जातियों की स्त्रियों में स्वच्छता एवं पवित्रता का भाव बोध होता है। यद्यपि निम्न जाति की स्त्री को अपवित्र माना जाता है। स्त्रियों को उनके रंग के आधार पर स्वच्छ एवं आकर्षक माना जाता है।

विधवा स्त्री की स्थिति तो और भी दयनीय होती है। किसी भी जाति की विधवा को अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है, जबकि पुरुषों के लिए इस तरह के नियम नहीं हैं। विवाह में स्त्रियों के रंग, उनकी शारीरिक बनावट, आकर्षण आदि का विशेष ध्यान रखा जाता है। यह धारणा है कि सुंदर स्त्री से सुंदर बालक पैदा होगा जो श्रेष्ठ, सुयोग्य व सुंदर पुरुषों की वंश परंपरा को आगे बढ़ाएगा। यद्यपि पुरुषों में इस तरह का भेदभाव नहीं रखा गई है। वहाँ आर्थिक हैसियत को ही विशेष महत्त्व दिया गई है। उच्च जाति और निम्न जाति के स्त्री पुरुषों के बीच मेल-मिलाप को अपराध माना गई है। स्त्रियों के लिए नियम कठोर बनाए गए हैं, जिसका पालन न करने पर उन्हें दंड का भागीदार होना पड़ता है।


4) लैंगिकता और संस्कृति के अंतःसंबंध - स्त्री और पुरुष के बीच जैविक भिन्नताओं के कारण उनके क्रिया-कलाप बचपन से ही भिन्न-भिन्न दिखाई देने लगते हैं और यह भिन्नता उनके लैंगिक निर्धारण का कारण बनती है। समाज में स्त्री और पुरुष की भूमिकाएँ भी इसी लैंगिक भिन्नता के आधार पर बनी हुई हैं।

यह भूमिका पुरुष में पुरुषत्व और स्त्री में स्त्रीत्व के गुणों को निर्धारित करती है। यहाँ पितृसत्तात्मक मानसिकता काम करती है। स्त्रीवादी चिंतक इस वर्चस्व की भावना को पुरुष के एकाधिकार से जोड़कर देखती हैं। स्त्रीवादी चिंतक 'एनन ऑकले' ने लैंगिक भेद को संस्कृति से जोड़कर देखा है। उनके अनुसार विभिन्न संस्कृतियों में 'ज्ञान, आस्था, विश्वास, कला, आचरण और रीति-रिवाज के व्यावहारिक प्रयोग स्त्रियों और पुरुषों में अलग-अलग होते हैं। चूँकि संस्कृति का संबंध परंपरा में प्रचलित रीतियों को सीखने से जुड़ा हुआ है और बच्चे इन्हें सीखते हुए अपने समाज का विकास करते हैं। उनके सीखने की प्रक्रिया उनके लैंगिक भेद के कारण अलग-अलग तरीके से होती है। यह उनके व्यवहार, हाव-भाव में दिखाई देती है।" इस तरह ऑकले' जेंडर को संस्कृति के साथ जोड़कर देखती हैं। समाजीकरण की प्रक्रिया में संस्कृति जेंडर के विशिष्ट लक्षणों का निर्माण करती है। जैसे - बालक में पुरुषत्व, क्रोध, आक्रोश, वर्चस्व की भावना का विकसित होना तथा लड़की में शर्मीलापन, अकेलापन, दूरी बनाकर रहना, खेल और पहनावे में स्त्रियोचित गुणों को प्रदर्शित करना इत्यादि। इस तरह बचपन से ही लैंगिक भेद निर्धारित कर दिए जाते हैं।


4) धर्म : स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधों पर नियंत्रण धर्म द्वारा होता है।

हिंदू धर्म-शास्त्र पितृसत्तात्मक स्थितियों को दर्शाते हैं। मनुस्मृति में पति-पत्नी के संबंधों को भूमि और बीज के रूप में व्याख्यायित किया गई है। अर्थात संपति का विकास समाज की उर्वरा भूमि पर ही संभव है। मनु ने स्त्रियों को उपनयन संस्कार में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाया है। उन्होंने उपनयन संस्कार को ज्ञान प्राप्ति का प्रारंभिक बिंदू कहा है। स्त्रियाँ ज्ञान प्राप्ति से विद्रोह कर सकती हैं तथा पुरुष के समकक्ष अधिकारों की माँग कर सकती हैं। इसलिए उन्हें वे ज्ञान दिए जाएँ जो पितृसत्ता द्वारा निर्धारित हों। अतः स्त्रियों को विवाह संस्था में ही शामिल होने का अधिकार दिया गई और कहा गई है कि - "यह उपनयन संस्कार के समकक्ष है।" इस तरह से घरेलू काम को लिंग भेद के आधार पर मनु ने स्त्रियों के लिए अलग कर दिया। पुरुष-प्रधान समाज में धर्म ने स्त्री का दर्जा पुरुष से नीचे रखा और कहा कि स्त्री पुरुष के लिंग भेद जैविक और सांस्कृतिक दोनों हैं। यद्यपि स्त्रीवादी चिंतकों ने श्रम के आधार पर लिंग भेद की स्थितियों को समाज में देखा। उनके अनुसार संतान जनने के अतिरिक्त वे सभी कार्य पुरुष कर सकते हैं जो स्त्रियाँ करती हैं। लेकिन इन कार्यों को स्त्रियों का काम कहकर लैंगिक आधार पर श्रम विभाजन कर दिया गई। संतानोत्पत्ति के कार्य में स्त्रियों की योग्यता के कारण पुरुष ने स्त्रियों को नियंत्रित करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक स्तर पर नैतिक नियमों का सहारा लेना शुरू किया। यद्यपि धर्म ग्रंथ स्त्रियों और पुरुषों के लिंग भेद में पितृसत्तात्मक मानसिकता का एक तरफा प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं। पौराणिक अख्यानों में स्त्रियों को सहनशील, सुकुमार, सेवाभाव से ओत-प्रोत एवं समर्पण की भावना में दिखाया गई है। स्त्रीवादियों ने सीता का उदाहरण दिया। वन गमन में सीता राम के साथ सभी तरह की समस्याएँ सहती है।


लंका विजय के बाद अपनी पवित्रता की प्रामाणिकता के लिए अग्नि परीक्षा देती हैं। उलाहना देकर निकाल दिए जाने पर जंगल में चली जाती हैं। इसी तरह से महाभारत में द्रौपदी पाँच पुरुषों को उपहार में दे दी जाती है। वह पुरुषों की गलती की सजा स्वयं भुगतती है। उसको संपत्ति की तरह प्रयोग किया जाता है और जुए में दाँव पर लगा दिया जाता है। अर्थात स्त्री का वज़ूद वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं है। स्त्रियां पुरुषों द्वारा जीत ली जाती थी और उपहार में सगे संबंधियों को सौंप दी जाती थीं। महाभारत में अंबा, अंबिका और अंबालिका का प्रसंग इसी तथ्य को दर्शाता है। स्त्रियाँ पुरुषों की प्राप्ति के लिए तपस्या करती थीं और पुरुष उनका अपहरण करते थे। पौराणिक अख्यान में पुरुषों की वर्चस्ववादी मानसिकता और एकाधिकार की भावना ने लिंग भेद की स्थिति पैदा की। पुरुष नियम स्वयं बनाते थे और उसे स्त्रियों पर थोप देते थे। श्वेतकेतु और उद्दालक का ऋग्वेद में आख्यान महत्त्वपूर्ण है। ये दोनों वैदिक ऋषि हैं। प्रसंग में एक व्यक्ति श्वेतकेतु की माता का पीछा करता हुआ, उसकी कुटिया में घुस गई और उसके साथ बलात् संबंध बनाकर चला गई, अपनी माँ की चित्कार को सुनकर श्वेतकेतु ने कुटिया के द्वार पर बैठे पिता उद्दालक से कहा- 'आप की पत्नी के साथ बलात संबंध बनाया गई और आप कुछ नहीं बोले ।' तब उद्दालक ने कहा- "एषः धर्म सनातनः''। तत्पश्चात् श्वेतकेतु ने विवाह संस्था का नियम बनाया। रामायण में गौतम ऋषि और अहिल्या का उपाख्यान आता है। अहिल्या को पाषाण होने का श्राप दे दिया गई, जबकि इंद्र द्वारा बलात् अनुचित संबंध बनाने पर इंद्र को कहीं भी दंडित नहीं किया गई। दंड की भागीदार अहिल्या बनी।

इस तरह के लैंगिक भेद दर्शाने वाले आख्यान सभी धर्म ग्रंथों में पाए जाते हैं। आदम और हौआ के प्रसंग में हौआ को ही शांति भंग का दोषी बताया गई। यह सिर्फ इसलिए था की स्त्रियाँ शारीरिक स्तर पर पुरुषों से कमज़ोर होती थीं और असुरक्षा के कारण पुरुषों पर निर्भर रहती थीं। जैविक भेद के कारण उन्हें पवित्रता की परीक्षा देने के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता था।


5) समाजीकरण- समाजीकरण की प्रक्रिया में मनुष्य अपने समाज की संस्कृति, आचार-विचार और व्यवहार सीखने की कोशिश करता है। ग्रीन के अनुसार “बालक द्वारा सांस्कृतिक विशेषताएँ अपनाना, व्यक्तित्व का विकास एक विशिष्ट समाज में करना समाजीकरण है।" 'निमकॉफ ने व्यक्ति के चाल-चलन और व्यवहार सीखने की क्रिया को समाजीकरण कहा है। मनुष्य में लिंग भेद का प्रारंभिक ज्ञान समाजीकरण की प्रक्रिया में ही होता है। परिवार समाज की प्राथमिक इकाई है। 'काम्टे' ने तो परिवार को सामाजिक जीवन की प्रथम पाठशाला' कहा है। यह सत्य है कि बालक परिवार में ही प्रेम, सहयोग, भाषा, व्यवहार, रहन-सहन और पहनावे का ज्ञान प्राप्त करता है और यहीं से उसमें लैंगिक भेद की स्थिति उत्पन्न होती जाती है। बचपन से ही उसके सीखने की क्रिया लैंगिकता की पहचान दर्शाती है।

'ग्लीटमैन रेजबर्ग ने एक प्रयोग के द्वारा इस क्रिया को समझाने की कोशिश की है। उन्होंने एक शिशु को, बिना जेंडर बताए उसे दो परिवारों को अलग अलग समय पर सौंपा। एक परिवार ने उसे लड़का शिशु समझकर झुनझुना और डुगडुगी दिया। दूसरे परिवार ने उसे लड़की समझकर गुड़िया पकड़ा दिया। यही नहीं उस शिशु के साथ बर्ताव भी अलग-अलग तरह से किया गई। जिन्होंने उसे लड़का समझा वे उसे गोंद में उछाल-उछाल कर खेलते रहे और जिन्होंने उसे लड़की समझा वे उसे हल्के और आराम से पुचकारते और सहलाते रहे। इससे जाहिर है कि परिवार में व्यवहार द्वारा लैंगिक प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिलता है। आगे चलकर यही जैविक पुरुष और जैविक स्त्री में तब्दील हो जाते हैं। 'रुथ हर्टले' नामक समाजशास्त्री ने समाजीकरण को चार प्रक्रिया से गुजरने की स्थिति में समझाया है-


1) प्रभावित करते हुए


2) किसी एक भावधारा में समाहित होकर


(3) प्रदर्शन के द्वारा


4) वाचिक आकर्षण पैदा करके।


पहली स्थिति में बच्चों की देखभाल की प्रक्रिया होती है लड़के की शारीरिक क्षमता बढ़ाई जाती है। लड़की में स्त्रियोचित गुणों और खूबसूरती को बढ़ावा दिया जाता है। दूसरे चरण में लड़के का दृष्टिकोण शक्ति प्रदर्शन और लड़की का दृष्टिकोण सौंदर्य प्रदर्शन की ओर बढ़ाया जाता है। तीसरे चरण में बालक अपनी लैंगिक पहचान निर्धारित करने लगता है। वह सचेत होकर अपने लैंगिक गुणों को प्रदर्शित करता है और लड़की स्त्रियोचित भावों को प्रदर्शित करती है। चैथी स्थिति में लड़का पिता के व्यवसाय अपने लिए कारोबार एवं नौकरी में संलग्न हो जाता है। लड़की माँ के साथ घर के कार्य में जुट जाती है और भावी जीवन के प्रति स्त्रियोचित चिंतन करती है, जिसमें पत्नी और माँ की भूमिका होती है। इस तरह समाज में स्त्री-पुरुष के बीच जैविक भिन्नता आकार लेती चली जाती है।


6) मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण- फ्रायड ने जेंडर संबंधी प्रक्रिया को मनोविश्लेषणात्मक ढंग से समझाने का प्रयास किया है। उसके अनुसार जन्म से ही शिशु का आकर्षण विपरीत लिंग के प्रति होता है।

माँ नैसर्गिक रूप से लड़के को प्यार करती है और बालक भी पिता की अपेक्षा माँ के करीब रहता है, जबकि लड़की का आकर्षण अपने पिता के प्रति होता है। इस भावनात्मक लगाव को फ्रायड ने प्रकृति प्रदत्त बताया है। वह जैविक स्थितियों की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि- 'मनुष्य में हमेशा विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है। यह उसकी शारीरिक बनावट और प्रकृति प्रदत्त कामेच्छाओं के कारण संभव होता है। इसलिए लैंगिक भेद एक मनोविश्लेषणात्मक प्रक्रिया है जो नैसर्गिक रूप से लड़के और लड़की में विकसित होती चली जाती है। इसे रोका नहीं जा सकता और इस तरह से लैंगिक भेद स्त्री-पुरुषों में एक दूसरे के विपरीत गुणों को विकसित करते चले जाते हैं।


7) परिवार एवं जेंडर- स्त्रियों का शोषण सर्वप्रथम परिवार से ही शुरू होता है। किसी समय स्त्री को घर की लक्ष्मी कहने का विचार समय के साथ साथ बदलता गई और कन्या का जन्म दुःस्वप्न की तरह कई समस्याओं को दर्शाता दिखाई देने लगता है।

विशेषकर सुरक्षा का भावबोध, शिक्षा की समस्या, विवाह एवं दहेज की समस्या इत्यादि। इसीलिए लड़की का जन्म हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है। इसे पराया धन कह कर उपेक्षा की जाने लगी है। कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन समाज की इन्हीं समस्याओं को लेकर विकसित हुआ है। इसके विपरीत पुत्र को वंश परंपरा चलाने वाला पूर्वजों को वैतरणी पार कराने वाला तथा परिवार का बोझ उठाने वाले के रूप में समझा गई। धर्म ग्रंथों में उल्लिखित किया गई कि पुत्र ही वंश का उद्धारक है'। यही कारण है कि लड़कियों को भारतीय समाज में लड़कों की तुलना में कम महत्त्व दिया जाता है। इनके लालन पालन में भी लड़कों की तुलना में कम खर्च किया जाता है। लड़कों को जितनी सुख सुविधाएँ पौष्टिक आहार प्रदान किए जाते हैं, लड़कियों को उतना नहीं। शिक्षा में भी लड़की को बालिग होने तक पढ़ाया जाता है, उसके बाद उसकी शादी कर दी जाती है। समाज में एक तरह से लड़कियों को कई जीवन जीना पड़ता है


1) पिता के घर में शादी होने से पहले


2) पति के घर में शादी होने के बाद


3) बच्चों की शिक्षा दीक्षा और घर गृहस्थी में सम्मिलित होने पर


4) उसके जीवन का अंतिम पड़ाव वृद्धावस्था होती है। जहाँ उसे मृत्यु तक अपनों द्वारा उपेक्षित होकर जीवन जीना पड़ता है।


पितृसत्तात्मक समाज में अनेक संस्थाओं की घेरा बंदी है। स्त्री किसी-न-किसी रूप में इस घेरे में प्रताड़ित होती रहती है। बेटी, बहू, सास सभी अवस्थाओं में उसे पुरुष के एकाधिकार में ही अपनी भूमिका निभानी होती है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री किसी भी कार्य के लिए तब तक अयोग्य समझी जाती है जब तक कि वह पुरुष के निर्देश में कार्य न करे। समुचित शिक्षा न मिलने से उसे रोज़गार की उपलब्धता नहीं हो पाती है। परिणामतः वे स्वावलंबी जीवन जीने से वंचित रह जाती हैं। घर के अंदर बंद रहने से उसकी दुनियाँ अपने घर और परिवार तक ही सिमट कर रह जाती है।


8) ऐतिहासिक अवधारणा और जेंडर इतिहास :   स्त्रियों की स्थितियों को लेकर अधिक सचेत नहीं रहा है। एक तरह से इतिहास स्त्रियों संबंधी ऐतिहासिक घटनाओं पर मौन रहा है। सीमन द बोउवार' ने बताया है कि किस तरह से नीग्रो और अफ्रीकी देशों के जनजातियों की तरह स्त्रियों को भी उपेक्षित कर दिया गई है।

इतिहास में स्त्रियों को माँ, पत्नी, बहन, बेटी के अतिरिक्त किसी और नज़रिए से नहीं पहचाना गई है। उसके प्रति दोयम दर्जे की मानसिकता रखी गई है। स्त्रियों की ऐतिहासिक उपेक्षा को मार्क्सवादी स्त्रीवादी चिंतकों ने बेहतर ढंग से समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने स्त्री को इतिहास में दास की स्थिति में देखा है। एंगेल्स ने लिखा है कि प्रारंभिक समाज में स्त्रियां घरों के भीतर उत्पादन के साधनों में लगी रहती थीं और पुरुष घर के बाहर श्रम के कार्यों में अवैजारों तथा अन्य उपकरणों का प्रयोग करते थे। घर के बाहर उत्पादन से अधिक संपत्ति अर्जित करने के कारण पुरुष अतिरिक्त पूँजी हस्तगत करने लगे। जो स्त्रियों की आमदनी की तुलना में कहीं अधिक थी। पुरुषों की आर्थिक स्थिति मज़बूत होने से मातृ प्रधान समाज पितृसत्तात्मक व्यवस्था में रूपांतरित हो गई। ऐतिहासिक विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गई कि जब तक स्त्रियां घर के बाहर निकलकर उत्पादन के साधनों में समान भागीदारी नहीं करतीं, तब तक उनकी मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए स्त्रियों को अपनी आर्थिक स्थिति मज़बूत करने के लिए घर की चार दीवारी से बाहर निकालना। ज़रूरी है। इतिहास ने स्त्रियों को घर से बाहर की स्थितियों से कभी भी अवगत नहीं कराया। इतिहास ने गृहस्थ जीवन में भी झाँकने का प्रयास नहीं किया। अतः स्त्रियों संबंधी व्याख्याएँ इतिहास में कहीं दिखाई नहीं देती हैं।


स्त्रीवादी चिंतकों ने पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के प्रति उपेक्षा के भाव को कई तरह से व्याख्यायित किया है। 'एलीसन जैगर' का मानना है कि 'लिंग भेद तथा जातीयता का पितृसत्तात्मक समाज से अविभाज्य संबंध है। समकालीन पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को तभी तक सम्मान दिया जाता है जब तक कि वह मातृत्व के धर्म को पूरा करने के लिए गर्भधरण नहीं कर लेती। इस कार्य में जो स्त्रियां अक्षम होती हैं, वे दया की पात्र बन जाती हैं और जो स्त्रियां संतान पैदा नहीं करना चाहती उन्हें अपरिपक्व, स्वार्थी अस्त्रियोचित की संज्ञा दी जाती है। मातृत्व को जिस तरह से पितृसत्ता के अंतर्गत स्थापित किया गई है, वहीं से स्त्री का उत्पीड़न भी शुरू हुआ है। जेंडर के इतिहास में पुरुषत्व एवं स्त्रीत्व के सामाजिक प्रारूपों को कई आयाम देने का प्रयास किया गई है। इतिहास के पन्नों से स्त्रियों की भूमिका गायब कर देने जैसी हरकतों ने पुरुष प्रधान समाज के वर्चस्ववादी दृष्टिकोण को दर्शाया है। इतिहास संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और संस्कृतियों के निर्माण में स्त्री की भागीदारी पुरुष के समान ही रही है। इसके बावज़ूद स्त्री को इतिहास के पन्नों में कोई स्थान नहीं दिया गई है। धार्मिक आस्थाएँ, परंपराएँ लैंगिक विचारधारा को प्रभावित करती रही हैं। इतिहास में किसी भी आंदोलन को प्रारंभ करने में स्त्रियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। पर्यावरण से संबंधित आंदोलन हो या शिक्षा से संबंधित आंदोलन हो अथवा श्रम के उचित मूल्य को लेकर किए गए आंदोलन हों सभी जगह की भूमिका प्रथम रही है। इसके बावज़ूद उनके कर्तव्यों की उपेक्षा कर इतिहास पुरुषवादी मानसिकता को ही दर्शाता रहा है।